सच्चे भक्त किसी के कहने पर भड़कते नहीं है


                  कोई भी धर्म अपने अनुयायियों के विश्वास के बिना नहीं चल सकता , और उसके मुखिया अपना प्रभुत्व जमाने के लिए ऐसा दिन, तारीख और पर्व चुनते हैं जिस दिन उससे जुडे लोगों कि संख्या उन्हें अधिक से अधिक संख्या में उपलब्ध हो सके-मैं इन्टरनेट पर किसी एक धर्म,पंथ या मजहब का नाम नहीं लेता क्योंकि एक तो इससे विषय में भटकाव आता है -दुसरा यह कि जिस तरह कहा जाता है कि दुनिया का कोई धर्म बैर करना नहीं बल्कि प्रेम करना सिखाता है तो इसका एक दूसरा पक्ष भी है कि हर धर्म में ईश्वर और भक्त के बीच में एक ज्ञानवान मध्यस्थ होता है जो मृत्योपरांत स्वर्ग का टिकट कटवाने की गारंटी देता है -जो कालांतर में उस धर्म के मुखिया भी बन जाते हैं।
                    हर धर्म के अनुयायियों का अपने इष्ट को स्मरण करने का एक कोई खास दिन होता है और उनका वह मुखिया उस दिन अपने धर्म को लेकर चर्चा करते हैं और यदि कोई बात या मुद्दा मिल जाये जिससे उन्हें उत्तेजित करने और विवाद बढाने का अवसर मिल जाये तो धर्म के तथाकथित मुखिया उसका भरपूर लाभ उठाते हैं । सामान्य दिनों में तो ऐसे उधेड़बुन में रहते हैं कि किस खास दिन पर किस तरह अपने लोगों को प्रभावित कर सकें । इन लोगों का मायाजाल इस तरह का है कि सामान्य शिक्षित या अशिक्षित की तो छोड़ें उच्च और तकनीकी शिक्षा प्राप्त लोग भी इनके प्रभाव से नहीं बच पाते-क्योंकि इन लोगों ने आध्यात्म और धार्मिक कर्मकांडों को इस तरह जोड़ रखा है उसे अलग करना कठिन है ।
                    हर व्यक्ति के मन में उसके इष्ट का वास होता है, यह अलग बात है कि कोई उसे जानता है और कोई नही । जब आदमी बच्चा होता है तब उसके माता पिता जिस इष्ट की आराधना करते हैं, धीरे धीरे वह उसके मन में दाखिल होकर उसका स्वामी हो जाता है। हां, अपने कामकाज और अन्य कारणों से आदमी उसके प्रति उदासीन हो जाता है पर जब उसकी कोई उसकी चर्चा करता है तो उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है-और अगर कोई उसकी निंदा करे तो उसे गुस्सा आ जाता है। चूंकि अधिकांश लोग गृहस्थ होते है और इस संसार में ही ज्यादा मन लगाते हैं तो अपने इष्ट की तरफ से ध्यान हटा लेते हैं और उनकी मन स्थिति कमजोर हो जाती है और अगर उसे कोई यह कहे कि अमुक आदमी ने तुम्हारे इष्ट का अपमान किया है तू वह उत्तेजित हो जाते है । अब कुछ नाराज होकर तथाकथित रुप से शाब्दिक रुप से अपने क्रोध का प्रदर्शन कर रह जाते हैं तो कुछ अपनी शार्रीरिक शक्ति का उपयोग करने लग जाते हैं।

                हम भारत के लोग धर्म के बारे में बहुत संवेदनशील होते है और यहां इसी वजह से धर्म के ठेकेदार ज्यादा ही है जो गाहे-बगाहे अपने स्वार्थों के लिए ऐसे फसाद कराते रहते हैं जिससे उनका प्रभाव न केवल अपने समाज में बल्कि दुसरे समाजों में भी बना रहे । यही कारण है कि विश्व में आध्यात्मिक गुरू कहलाने के बावजूद हमारे देश के लोगों की छबि रूढ़वादी और अंधविश्वास के कारण अच्छी नहीं बनी है।

                जो मेरा इष्ट है वही तुम्हारा भी इष्ट है यह हम सब मानते हैं, फिर आख़िर यह झगडा क्यों होता है? केवल इसीलिये ही न कि उसके स्वरूप हम अलग देखते हैं। हम दावा करते हैं कि हम अपने इष्ट को मानते है पर हम उस इष्ट को अपने हृदय में धारण कितना करते हैं यह कभी सोचा ही नहीं । नाम लेकर नामा बटोरने चल पड़ते है और सोचते हैं कि हो गया हमारा जीवन धन्य !

                हमारे देश में अनेक महापुरुष हुए हैं कुछ को अवतार कहा जाता है तो कुछ को संत । यहां बता दें के हमारे समाज में संत और अवतार का दर्जा समान माना जाता है। क्योंकि संतों को गुरुओं के रुप में मान्यता मिलती है और कहा जाता है कि गुरू ही गोविन्द के दर्शन कराते हैं इसीलिये वह बडे हैं। अवतारी पुरुष भी गुरू का सम्मान करना ही धर्म और भक्ती का एक हिस्सा मानते हैं-और यह बातें वही समझ पाता है जो अपने इष्ट और गुरू को धारण करे। हमारे देश में कई गुरूओं के कई चेले मिल जाएंगे और जब आपस में चर्चा करते हुए अपने गुरुओं और इष्ट का बखान इस तरह करेंगे जैसे आध्यात्म की बात न करके वाक्युध्दु कर रहे हौं ।

                अपनी भक्ती अपने मन में रखने की बात होती है लोग चिल्लाकर उसका बखान करते है और होता यह कि कई जगह तो इस बात पर बात-बात में सामुहिक झगडा हो जाता है किसका इष्ट बड़ा है। मैं अपने इष्ट और गुरू के बारे में मानता हूँ कि कोई उनके अपमान करने की ताकत ही नहीं रखता ! वजह साफ है कि मैं जानता हूँ कि मेरे इष्ट और गुरू मेरे मन में है कोई उन्हें देख ही नहीं सकता तो अपमान क्या खाक करेगा। अगर कोई व्यक्ति मुझसे आकर कहे कि अमुक व्यक्ति ने तुम्हारे गुरू और इष्ट का अपमान किया है तो मेरे अन्दर कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी -क्योंकि मैं समझता हूँ कि उस व्यक्ति के मन में कुछ ऐसा है जो वह अपना स्वार्थ सिध्द करना चाहता है-अगर सच्चा भक्त होता तो वहाँ से उठकर चल देता जहाँ निंदा हो रही थी-मुझे आकर क्यों सुना रहा है । वह मुझसे अगर यह कहेगा कि तुम्हारा और मेरा इष्ट और गुरू है एक है और चलकर उस निंदक से लड़ते हैं तो भी मैं उसकी बात पर ध्यान नही दूंगा क्योंकि जिस इष्ट को मैंने धारण किया है उसके चरित्र से सीखा है कि आदमी को सहज भाव का त्याग नहीं करना चाहिए और युध्द अस्त्र-शस्त्र से नहीं बल्कि कुशलता से जीते जाते है और कभी कभी तो एसी कुशलता दिखानी चाहिए कि बिना हिंसा के ही युध्द जीत लिया जाये।
                   मेरे गुरू ने मुझे सिखाया है कि दुष्ट लोग ही संतों और दुसरे के इष्ट पर आक्षेप करते हैं और वह लोग अपने पापों का बोझ इतना बड़ा लेते हैं कि एक दिन खुद उसके तले दबकर भारी तकलीफ में आ जाते हैं। कुल मिलाकर भक्ती बाहर दिखने की चीज नहीं है वह तो अपने मन में धारण करने के लिए है क्योंकि उससे हमारे विचार और भाव शुध्द रहते है। हमारे इष्ट और गुरू का कोई अपमान भी कर सकता है यह मानने का मतलब ही यही है कि हमारे भक्ति-भाव में कहीं कोई कमी है जो हम उत्तेजित हो जाते हैं। अपमान एक खराब शब्द है तो उससे हम सुने ही क्यों ?

             जितने भी गुरू हुए हैं वह यही कहते हैं कि बुरा मत कहों, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो -क्या हमें अपने इष्ट और गुरुओं की बात नहीं माननी चाहिए-और उनके बार में बुरी बात कहने वालों की बात कान नहीं देना चाहिऐ । मैं अपने जैसे भक्तों से मुखातिब हूँ जो बडे भावुक होते हैं और उम्मीद हैं वह मेरी बात समझ ही गये होंगें – भले ही उनके गुरू और इष्ट का स्वरूप अलग हो पर हैं तो भक्त ही न ! जो भक्ती के अलावा और किसी बात पर ध्यान नहीं देते और कुछ लोग उनकी इस तल्लीनता में भंग डालने के लिए ऐसे मसले लाते है जिससे उनकी भक्ती और समाज की शांति में खलल पडे। ऐसे भक्तो को मेरा प्रणाम इस सलाह के साथ कि वह अपने भक्ती में तल्लीन रहें किसी की बातों में न आयें । आजकल जो इस देश में माहौल बनाया जा रहा है उसमें भक्त की भावनाओं की बात केवल नाम के लिए है और कुछ नहीं । सच्चे भक्त को किसी के बहकावे में आकर भड़कने या भड़काने का काम नहीं करना चाहिऐ.

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