पुराने ताजमहल को गौरव दिलाने के नये प्रयास


                       अब कुछ लोगों ने देश में ताजमहल को विश्व के अजूबों में शामिल कराने के लिए एक अभियान शुरू किया है , अपने आप में यह आश्चर्यजनक बात लगती है-क्योंकि ताजमहल एक एतिहासिक, सुन्दर और मनभावन इमारत है और उसके लिए किसी अन्य के प्रमाण-पत्र कि आवश्यकता नहीं है । कहने को इसे देशप्रेम से जोडा जा रहा है पर इसका उद्देश्य व्यवसायिक अधिक है, क्योंकि इसके लिए एस .ऍम.एस. करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है और उस पर फायदा किसे होना है सब जानते है -एस.एम्.एस. कोई मुफ़्त में तो होता नहीं है ।
                        जो कर रहे हैं उन्हें रोकना हमारा उद्देश्य नहीं है ,पर इसमें लोगों के देशप्रेम की भावना का दोहन करना ठीक नहीं लगता । जब आप देश में लोकतंत्र और खुले व्यापार के समर्थक हैं तो इस तरह के अभियानों का विरोध भी करने का हक नहीं रखते पर अपनी अभिव्यक्ति के कर्तव्य और दायित्व के तहत अपने विचार भी रखना चाहिए ।
                    शायद एकदम नई पीढी को नहीं मालुम कि ताज महल विश्व के सात आश्चर्य में शामिल नहीं है पर सामान्य ज्ञान रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह बात जानता है-इस मामले में हमारे अन्दर एक धारणा और स्थापित की गयी कि चूंकि पश्चिमी देश भारत के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं इसीलिये ताजमहल को सात आश्चर्यों की सूची में शामिल नहीं किया, और यह भी कि भारत एक गरीब देश है इसीलिये उसको कोई सम्मान नहीं देना चाहता। अब अचानक उसे जिस तरह विश्व से सात अजूबों में शामिल करने की मुहिम चल रही है उससे साफ लगता है कि इसके पीछे केवल प्रचार और उसका लाभ उठाने के अलावा और कुछ नहीं है। अब भारत की अर्थव्यस्था से प्रभावित होकर पश्चिमी देश अगर ताजमहल को विश्व से सात आश्चर्यों में शामिल करना चाहते हैं तो उसमें हमारे खुश होने की कोई जरूरत नहीं है । जहाँ तक इससे देश का मान बढने का प्रश्न है तो केवल एक भ्रम है, जब पश्चिमी देश भारत के प्रति सम्मानजनक भाव नहीं रखते थे तब भी भारत की संस्कृति, सभ्यता और और आध्यात्म वहां अपने प्रभाव से देश के सम्मान बनाए हुए थे ।

             विश्व में भारत की अध्यात्म गुरू की छबि बनी हुई थी ।
विश्व के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में कहा था कि”आज से कुछ सदियों बाद कौन इस बात पर यकीन करेगा कि हाड-मांस से बना कोई ऐसा इन्सान इस धरती पर हुआ होगा।”
                   जब भारत के स्वामी विवेकानंद अमेरिका गये और अपने पहले ही उद्बोधन में उन्होने कहा -भाईयों और और बहिनों तो पूरा हाल तालियों से बज उठा था -श्रीमान और श्रीमती जैसे ओपचारिक शब्द सुनने की आदी अमेरिकनों को उनके आत्मीयता से भरे वचनों ने जो प्रभावित किया उसके प्रभाव आज तक परिलक्षित होते हैं ।

                 कहने का मतलब यह है कि हमारे देश का गौरव हमारे देश के महापुरुषों के तेज, तपस्या और प्रयासों से विश्व में पहले ही स्थापित है और हमारे प्राचीनतम योगासन, प्राणायाम और ध्यान की विधाये एक बार फिर विश्व में अपना नाम रौशन किये दे रही हैं ,और श्रीमदभागवत गीता के ज्ञान पर तमाम तरह के शोध हो रहे हैं , और एक बार फिर पूरी दुनिया भारत और उसके  ज्ञान को नये संदर्भों में देख रही है-मतलब कुल मिलाकर गौरव करने लायक बहुत कुछ है हमारे पास ।

                      भारत के डाक्टर ,वैज्ञानिक, और तकनीशियन अपनी मेहनत,कार्यकुशलता और बुध्दिमता से पूरे विश्व में न केवल अपनी धाक बनाए हुए हैं बल्कि देश का भी गौरव भी बढ़ाये हुए हैं तब केवल ताजमहल के गौरव के साथ देश के गौरव को जोड़ना गलत होगा-हाँ यह एक कारण हो सकता है पर इकलौता नहीं । इसका मतलब यह नहीं है कि ताज को लेकर चलाये जा रहे अभियान में हम कुछ गलत देख रहे हैं हाँ इसके साथ अगर भारत के गौरव बढाने वाले अन्य विषयों का भी कुछ उल्लेख हो तो बेहतर रहेगा ।
                इसके साथ ही ताजमहल जो इस समय पर्यावरण प्रदूषण और अन्य कारणों से धीर-धीरे जो अपना सौंदर्य को खो रहा है उसके लिए भी अभियान शुरू करना चाहिऐ , क्योंकि यह उसका कोई मामूली संकट नहीं है-और उसको विश्व से सातवें आश्चर्य के रुप में शामिल करने से अगर गौरव बढेगा तो उस पर लगा कोई दाग उसे कम भी करेगा। उसके पास हुए तथाकथित औधोगिक विकास और पेड-पोधों की कटाई ने उसकी सफेदी में जो कमी की है उस पर भी ध्यान दिया जान चाहिए । हम अपने गौरव बढाने के लिए बहुत फिक्र करते हैं पर उनकी रक्षा करने के लिए कोई प्रयास नहीं करते। ताजमहल को हम विश्व में गौरव दिलाने के साथ ही उसके रक्षा के प्रयास भी साथ-साथ शुरू होना चाहिए । साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिऐ कि ताजमहल को विश्व में आधिकारिक रुप से आर्श्चय का दर्जा नहीं प्राप्त पर लोग के दिल में उसकी जगह एक आर्श्चय के रुप में ही है ।उसमें कोई न कमी होनी है न वह बढ़ने वाली है

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टिप्पणियाँ

  • मुझे लगता है कि में अपनी बात पूरी तरह से समझा नहीं पाया हूँ, मैं केवल यही कहना चाहता हूँ कि ताजमहल और उसके इतिहास में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला और नही इसे देखने वालों के नजरिये में कोई बदलाव होना है ।
    दीपक भारतदीप

  • बिला शक ये एक नेक्सस है..मोबाइल कंपनियों की नौटंकी भी कह लीजिये.इस कुचक्र को ख़त्म होना होगा दीपक बाबू.बुरा मन मानियेगा हमारा मीडिया भी आए दिन नये नये बांसड़े खडे़ कर देता है.आप यकी़न जान लें कि अख़बारों की मार्केटिंग टीमें घूम रहीं हैं बाज़ार में कि हुज़ूर एक इश्तेहार आपकी ओर से हो जाए फ़्रंट पेज पर.दो लाख लगते हैं वैसे लेकिन ताज का मामला हैं न तो हम स्पेशल आफ़र लेकर आएं हैं आपके पास. न होगा विश्व के आठ आश्वर्यों में शामिल तो न हो…हमारे दिल मे ताजमहल की जो बसाहट है उसे किसी वैश्विक एजेंसी की पावती की क्या ज़रूरत है.कल से ये कहेंगे कि विवेकानंद भारत में पैदा हुए थे ये साबित करने के लिये वोट कीजिये…ओशो का कर्म क्षेत्र भारत था वोट कीजिये,सुभाष चन्द्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज के संस्थापक थे वोट कीजिये….दीपक बाबू वो दिन दूर नहीं कि ये मोबाइल कंपनिया हमसे कहें कि ये बच्चा आपका है…इसके मित्रों से 300 sms करवाइये तब साबित होगा. टेक्नालाजी को धंधों में तब्दील करने के चोचले हैं सब…खै़र ये भी एक रोज़ पर्दे के बाहर आ जाएगा.शाहजहां आप भी एक sms भेजिये न…मुमताज़ आप ही की थी.

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