लिखते हुए कभी नहीं डरना


तुम अपने हृदय में 
घूमते  हुए विचारों और 
मस्तिष्क में चिन्त्तन और मनन से 
उपजे शब्दों को लिखना
कोई कहता  या लिखता है 
तुम्हारे बारे में  अपशब्द उसे
सुनकर भी अनसुना करते दिखना
 
 
जिनको गुरु नहीं मिला 
उनको कहाँ से मिलता ज्ञान
 शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों का 
कहाँ होता उनको भान
हर इंसान की  देह में 
विचारों का क्रम तो चलना है
वाणी है तो शब्दों केकी 
 धारा को अनवरत बहना है
ज्ञानी तो बोले तोलकर
निर्बुद्धि बोले बिना किसी अनुमान 
तुम अपने शब्दो को ज्ञान के जल में
नहलाते  हुए लिखना 
 
अपशब्द होते हैं अर्थ रहित 
कभी आकर्षक तो 
कभी भयावह दिखते 
पर होते भाव रहित 
तुम उनसे परे दिखना 
 
तीरों और  तलवारों  से
तो खून बहाया जाता है
पर इतिहास  तो सदैव 
स्याही  से ही  लिखा जाता है
हथियारों से अधिक गंभीर वार 
करते हैं ज्ञान से सुसज्जित शब्द 
इसलिये अज्ञानी  और क्रूर  लोग
उनसे लड़ने के लिये
जुटा लेते हैं  पत्थरों के अंबार 
तुम अपने शब्द लिखते हुए 
कभी नहीं डरना 
पत्थर फेंकने   वाले डरपोक होते हैं
तुम कभी उनसे  विचलित
 होते नहीं  दिखना
———————– 
     

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