भ्रष्टाचार शिरोमणि


बिना लिये किसी फ़ाइल को हाथ
तक कभी नही लगाते थे
अपने दफ़्तर के शिरोमणि कहलाते थे
उनहें भ्रष्टाचार शिरोमणि की उपाधि का
सम्मान देने  का प्रस्ताव दिया गया
तो उनहोने बडी मासूमियत से पूछा
‘यह किस उपलबिध पर दिया पर दिया जाता
और मुझमें ऐसा कौनसा गुण नजर आता है
जो मुझे इस लायक समझा गया’

जवाब में उनहें बताया गया कि
‘यह उपरी कमाई में सिद्धहस्त  लोगों को
दिया जाता है’
जहां नहीं हो सकती
वहां भी जो आदमी अपने करतब दिखाता है
उसे ही इसके लिये चुना जाता है
इस वर्ष आपको इसके लायक समझा गया’

वह खुश हो गये और बोले
‘ठीक है, मुझे इसके लिये
कितने पैसे देने होंगे
क्योंकि मेरा नियम हैं अपने काम के
बारे में कोई समझौता पसंद नही करता
वहां सम्मान लेकर यहां बिना लिये
काम कर दूंगा तो गलत सोचा गया’

उनसे कहा गया कि
‘इसके लिये आपसे कुछ नहीं लिया जायेगा
आपके इसी सिद्धांत की वजह से आपको चुना गया’

तो वह अप्रसनन होते बोले
‘क्या आपने धर्मादा खाता खोल रखा है
या मुझे ऐसा-वैस समझा गया
जो एसे ही पुरुस्कार दिया जाता है
यह तो आज की मर्यादा का सीधा
उल्लंघन किया जाता है
मैं आपके कार्यक्रम में नहीं आउंगा
अपने पद को नहीं शरमाउंगा
मेरा नियम है लेकर काम करो
देकर काम कराओ
इस परंपरा में बदलाब आये ऐसा
कोई भी काम नहीं कर पाउंगा
बिना लिये-दिये काम करने का
दौर शुरू हो गया तो में कहां जाउंगा
तीन पीढियों के लिये तो दौलत जमा की है
सात पीढियों के लिये जोड कर जाउंगा
मेरी पुश्तें भी याद करेंगी कि
कोई उनके लिये सारे इंतजम कर गया’

और उनसे प्रस्ताव वापस ले लिया गया
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