रेल के सफ़र में चिंतन के दो घूँट


रेल में जनरल बोगी में घुसकर बैठने के लिये जगह बनाना कोई आसान काम नहीं है। अगर सफ़र छोटा हो तो समस्या बहुत गंभीर हो जाती है। आरक्षण करवा नहीं सकते और बस का सफ़र भी मुशिकल लगता है क्योंकि उसमें दुगुनी देर लगती है। अब यही तरीका बचता है कि किसी भी तरह रेल में चला जाये-क्योंकि जहाँ रेल की सुविधा उपलब्ध हो वहाँ वैसे भी बस में सफ़र कम पसंद करते हैं।

उस दिन हम भी वृंदावन जाने के लिये ग्वालियर से मथुरा तक का सफ़र तय करने के लिये रेल में बैठे। क्योंकि हम कई बार जा चुके हैं इसलिये यह घर से ही तय कर लेते हैं कि आगरा तक तो बैठ्ने की सीट मिलेगी ही नहीं। हमारी पत्नी भी उस दिन इसी इरादे के साथ घर से निकलती है कि आगरा तक तो ही तो सफ़र करना है-मतलब आगे तो बैठ्कर ही चलेंगे।

सो हमेशा की तरह ही हम जनरल बोगी में सवार हो गये। लोगों को उतरने और चढने में जल्दी होती है उसका धीरज से सामना करते हुए जब हम अंदर पहुंचे तो आराम से खडे होने की जगह मिल ही गयी-यह हमारे लिये संतोष का विषय था। गाडी चली तो हमारे शरीर का पसीना सूखना शुरु हुआ। धीरे-धीरे हमारा दिमाग संतुलित होने लगा। उसी समय चाय वाला भी निकला। हालांकि वहां इतनी भीड थी कि निकलने के लिये जगह नहीं थी, पर वह चूंकि गाडी के स्टाफ़ का ही हिस्सा था इसलिये जगह बनाता और चाय के बेचने के लिये आवाज देता हुआ हमारे पास से निकला। हमने उससे पूछा-कितने की है चाय्?”
उसने कहा-“पांच रुपये।

इससे पहले हम कुछ कहते श्रीमती जी बोल पडीं-‘पांच रुपये? एक कप के दो कप के ?”
चाय वाला अकड कर-“एक कप”
हमारी श्रीमती बोली-“मैं नही पीउंगी, आपको पीना है तो पी लो।”

बात यहीं नहीं खत्म हुई थी, हमारे पास खडे ऐक यात्री मे उससे कहा-‘हम कोई उधार के रेट नहीं पूछ रहे हैं, नकद पैसे देंगे।”

-‘हम यहां नकद ही चाय बेचते हैं उधार का काम ही नहीं है।’ चाय वाला बोला

ऐसे संक्रमण काल में चिंतन करने की जो हमारी आदत है वही हमें शक्ति प्रदान करती है। कई बार यह बुरी भी लगती है पर जब एसा समय हो तो अपना मन लगाने के लिये हम चिंतन में तल्लीन हो जाते हैं, और चाय ऐसे में टोनिक का काम करती है। हमने उससे कहा-‘अच्छा एक कप चाय दे दो।’

उसे मैंने पांच क सिक्का दिया। उसने प्लास्टिक के कप में चाय भर कर हमें दी तो देखा के वह आधा था। हमारी श्रीमतीजी बोली-‘पांच रुपये में आधा कप चाय भी नहीं है। वैसे ही तुम्हारा कप भी छोटा है और वह भी आधा, कम से कम उसे पूरा तो भरो।’

“इतनी ही मिलती है। हमें इतनी ही चाय देने के आर्डर है।”

वह ऐसा कहकर चला गया। हमारी पत्नी ने अपनी घरेलू भाषा में (क्योंकि वह हिंदी नहीं है और यह हम तब बोलते हैं जब चाहते हैं कि कोई अन्य व्यक्ति हमारी बात न समझ पाये) कहा-‘क्या जरूरी थी चाय लेना। इन दो चार्-बूंदों से क्या आपका पेट भर जायेगा?”

हमने कहा-‘वैसे भी पेट भरने के लिये पी जाती है। इसे तो थोडी दिमाग को ताजगी मिलती है।”

हमने उन्हें यह नहीं बताया कि हम अब चिंत्तन की प्रक्रिया शुरू करने वाले हैं। चाय का कप हम हाथ में लेकर सोचने लगे कि आखिर इस भयानक सडियल गर्मी में किस विषय पर चिंत्तन किया जा सकता है। इतने में अंदर दो लोगों के बीच चल रही बहस पर हमारा ध्यान गया। ऐक व्यक्ति कह रहा था कि जब तक’ सभी कामों का निजीकरण नहीं होगा तब तक देश का विकास नहीं हो सकता।”
दूसरे ने कहा-“पूंजिपत्तियों के हाथ में देश को सौंपना खतरनाक होगा। वह अपने लाभ के लिये मजदूरों और उपभोक्ताओं का शौषण करेंगे।”
हमने चाय का पहला घूंट पिया। चिंतन के लिये इतनी जल्दी हमको विषय मिल जायेगा यह हमने सोचा भी नहीं था। पहला घूंट पीते ही हमने चाय के कप को देखा। उस कप का साइज ही कहा जाये तो अपने आप में आधा था।

मैं अपने कार्यस्थल से कुछ दूर अपने ऐक मित्र के साथ सोटाराम के यहां चाय पीने जाता हूं, उससे दो कट (कप नहीं) चाय लेते हैं और महीने भर बाद प्रति कट दो रुपये का भुगतान करते हैं। उसके कप के मुकाबले यह कप साइज में आधा ही होगा-और चाय का स्वाद तो सोटाराम के स्वाद को याद कर हम दुखी हो उठे। मेरा मित्र उसकी चाय ठीक-ठाक होने पर भी उसे ताने देता रहता है। ऐसा लग रहा था कि हम उसी की सजा भोग रहे थे।
सोटाराम कहने को अपना ठेला लगाता है पर वह पूंजीपति नहीं है, उसे ऐक तरह से मजदूरों के वर्ग में रखकर सोचा जा सकता है। फ़िर हमें ऐक एसे होटल की भी याद आयी जहां दस रुपये की चाय पी थी, पर वह इस चाय से ठीक थी। उसके कप का साइज तो सोटाराम के बराबर का था। मतलब जहां तक चाय का मामला है हमारे सोटाराम के आगे सब फ़ेल थे। मगर उसकी भी समस्या है। कभी-कभी उस रास्ते कोई वी०वी०आई०पी० निकलता है तो उसे वहां से हटा दिया जाता है। वह समाज की जरूरत है इसे कोई नहीं मानता, उसका अपना पेट पालने से न तो देश का फ़ायदा है न समाज का। उल्टे शहर में ऐक ऐसे रास्ते पर अपना ठेला लगाकर खडा है जहां से वी०वी०आई०पी०निकलते हैं और उसका पुराना ठेला शहर की रौनक खराब करता है। सामान्य आदमी आकर वहां चाय पीता है पर इससे क्या? आपको कई ऐसे होटल मिल जायेंगे जिनकी दूसरी मंजिलें सडक पर झांक रही हैं, और उन्होने अपने यहां आने वाले वाहनों के लिये ढलान सडक के दस फ़ुट् तक खींच रखा है, पर वह तो शहर की शान होते हैं। वहां वी०आई०पी० आते हैं, जो समाज को अच्छी व्यवस्था और सुरक्षा देते हैं,उन्हें वह होटल रहने के लिए मिलते हैं इसलिये उन्हें हर तरह से छूट है। फ़िर उनसे शहर का सौंदर्य बढ्ता है। हर शहर में ऐसे चाय वाले है और होटल वाले भी सबकी कहानी एक  जैसे है।

मैं चाय का दूसरा घूंट पीता हूं और सोचता हूं कि क्या यह चाय सोटाराम की चाय से महंगी नहीं है, और क्या उस होटल जितनी महंगी नहीं। उधर बहस चल रही है क्योंकि उन्हें आराम से बैठने के लिये जगह मिली हुई है। वहां देश के विकास और विनाश पर चर्चा चल रही है। मुझे वह उस समय बेमानी लगती है क्योंकि उस समय मैं चाह्ता हूं अपने लिये बैठने के लिये जगह ताकि आराम से सफ़र कर सकूं। क्या कभी ऐसा दिन आ सकता है कि सब लोग रेल में आराम से सफ़र कर सकें। मुझे नहीं लगता है कि कभी ऐसा होगा। जो तकलीफ़ में हैं उन्हें केवल अपनी समस्या के हल की तलाश है और जो आराम से हैं वह बह्सों में लगें है।

मैं तीसरे घूंट के लिये कप की तरफ़ देखता हूं तो वह खाली दिखता है। मैं हैरान रह जाता हूं कि सोटाराम की चाय पीते-पीते मैं इससे चार गुना चिंतन कर लेता हूं और मेरा मित्र बोलता रह्ता है और मैं केवल सुनने का अभिनय करता हूं। बीच-बीच में ऐक्-दो बार उसकी तरफ़ ध्यान भी जाता है। इस हिसाब से तो यह चाय महंगी है। इसके साथ ही मेरे चिंतन शक्ति भी काम करना बंद कर देती है और मैं ऐक जगह ढूंढ कर वहां रुमाल बिछा देता हूं और बैठकर आंखे बंद कर ध्यान लगाने लग जाता हूं। उस समय मुझे सबसे अच्छा यही लगता है कि सारी दुनिया की फिक्र छोड़ने की अलावा और कोई चारा नहीं है। मुझे इसी तरह ही तकलीफ में सफ़र करना है। ऐसे में दो घूँट से अधिक चिंत्तन करने से कोई लाभ होने वाला नहीं है।

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