राम मिथक हैं तो सत्य कौन है- चिंतन


राम अगर मिथक हैं तो यहाँ सत्य कौन है? शायद इस बात का उत्तर वह लोग भी नहीं दे सकते जो राम को मिथक मानते हुए भी उन्हें मानने को तैयार हैं। एक तरफ वह लोग हैं जो कहते हैं कि राम एक कल्पना हैं दूसरी तरफ वह हैं जो उनके आस्तित्त्व को सत्य मानते हैं। इन दोनों के बीच वह लोग भी जो कहते हैं कि अगर वह मिथक भी हैं तो हम उन्हें मानेंगे-क्योंकि उन्हें लगता है कि भगवान श्री राम के अस्तित्व का कोई वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना तो कठिन है पर राम को काल्पनिक बताने वालों का सामना कराने के लिए यही एक तर्क है।

मैं प्रतिदिन इस विषय पर चल रही बहस को देख रहा हूँ, और तब मुझे आश्चर्य होता है कि राम को हृदय नायक मानने वाले इस देश में राम के विषय में सही ढंग से तर्क प्रस्तुत नहीं किये जा रहे है और जो मैंने या प्रश्न किया है कि राम अगर मिथक है तो सत्य कौन हैं तो इसके पीछे मेरा ध्येय केवल यही है कि मैं जिस धर्म को मानता हूँ और जिस तरह समझ पाया हूँ उसे लेकर अपनी बात कह सकूं। प्रश्न का जवाब भी मैं देता हूँ कि हम राम के अस्तित्त्व का प्रमाण किसे दें? जो माँग रहे हैं पहले वह यह तो साबित करें कि वह स्वयं मिथक या कल्पना नहीं हैं? चक्कर में डाल देने वाली इस बात में कोई चुनौती नहीं है बल्कि सीधा विज्ञान हैं जो हमारे धर्म ग्रंथों में मौजूद हैं। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं सही हूँ और मुझे अपनी गलती मानने में कोई झिझक भी नहीं है।

पहले तो यह जानना जरूरी हैं कि हम क्या हैं? इस शरीर को लेकर हम यह कहते हैं ‘हम हैं’। पर आंखों का काम है देखना वह देखती हैं, कानों का काम सुनना है वह सुनते और नाक का काम हैं सांस लेना और सूंघना वह भी करती है। मुख से भोजन को ग्रहण करने से लेकर उसके कचडे में परिवर्तित होकर देह से निष्कासन तक सारा काम शरीर में मौजूद इन्द्रियां करती हैं, अत: एक बात तो रही कि हम यह इन्द्रियां नहीं हैं। पांच तत्वों से बने इस शरीर में ‘मन, बुद्धि और अहंकार’ यह तीन प्रकार की प्रकृतियां होती हैं जिनके सहारे इस धरती पर समस्त देहधारी जीव अपने साथ मौजूद इन्द्रियों के समूह को लेकर विचरण करते हैं। मतलब एक चक्र है जो घूम रहा है और कहते हैं कि इसे हम घुमा रहे हैं। पंच तत्वों के समूह में स्थापित होने के बाद तीनों प्रकृतियां उस पर शासन करती हैं। मैं तो नहीं ढूँढ पाया कि हम कौन हैं पर रामजी के अस्तित्व पर सवाल उठाने वाला पहले इन सब से अलग होकर देख ले तो अपने आप जवाब मिल जाएगा कि राम मिथक थे या सत्य ।

इस धरती पर कुछ भी स्थिर नहीं है, सारा जगत चलायमान है इसलिये इसे मिथ्या और माया के स्वरूप भी कहा जाता है क्योंकि जो हम अपने को समझ रहे हैं वह हैं नहीं और जो हैं उसे जानते नहीं। चलते। फिरते और उठते-बैठते बस यही अहसास कि हम कर रहे हैं पर कर तो रहे हैं पर कर रही है यह देह अपने अन्दर मौजूद इन्द्रियों और प्रकृतियों की सहायता से वह भी उनके वशीभूत होकर। अब पलट कर हम सवाल करेंगे कि पूछ कौन रहा है और जवाब कौन दे?

अब रहा भौतिक प्रमाणों का सवाल। यह धरती कई करोड़ वर्ष से अस्तित्त्व में हैं इसके स्वरूप में परिवर्तन आते रहे हैं। हम ज्यादा दूर क्यों जाएँ अपने ही देश में देख ले ऐसे ढ़ेर सारे महल आज भी दिख जाते हैं जिनमें बैठे राजाओं ने अपने राज्य पर शासन किया और आज वह खँडहर हो गए। जिस समय वहाँ राजा रहते थे और वहाँ परिंदा भी नहीं आ सकता था वहां आज श्वान, गाय और भैसों का भी विचरण आसान हो गया है-और ऐसे महल पचास से पांच सो वर्ष से ज्यादा पुराने भी नहीं होंगे। आशय यह है कि इस धरती के स्वरूप में परिवर्तन आते हैं और मोहन-जोडदो और हडप्पा सभ्यता के अवशेषों से पता चलता है कि विकसित सभ्यता तब भी थी। अब कोई लोग अगर रामजी के होने के अस्तित्व के लिए भौतिक प्रमाण मांग रहे हैं तो उसे अज्ञानता के अलावा और क्या कहा जा सकता है? इस तरह देश के लोगों की भावानाओं को ठेस पहुंचाना भी किसी ज्ञान का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

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