हिंदी टूल आते रहेंगे तुम लिखते रहो


हिंदी के नए और मेरे जैसे फ्लॉप ब्लॉगरों के के पास यूनीकोड के रास्ते पर चलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. इधर फिर सादा हिंदी फॉण्ट के यूनीकोड मे परिवर्तन के टूलों की चर्चा जो चलती दिख रही है उसमें कोई दम नहीं है-मैने उसके इस्तेमाल करने का प्रयास किया पर वह सफल नहीं हुआ. अगर देखा जाये तो मैं अंतर्जाल पर आने से पहले यूनीकोड के बारे में नहीं जानता और सादा हिंदी फॉण्ट में ही लिख रहा था और सच तो यह है कि जितना अपने अनुभय से जो बात मेरी समझ में आयी है कि अब इस पर बहस नहीं होना चाहिए कि हम किसमें लिखे रहे हैं, बल्कि यह देखना चाहिए कि हम लिख क्या रहे हैं.

कभी-कभी सादा हिंदी फॉण्ट की चर्चा होती है तो मेरा मन डोळ जाता है और सोचता हूँ कि आगे ऐसा टूल मिल जाये जिससे मैं अपने कृति देव फॉण्ट को अंतर्जाल पर स्थापित कर सकूं पर जब टूलों को आजमाता हूँ तो एक तो वह सफल नहीं होते और दूसरे उनके सफल होने या न होने से हिंदी के अंतर्जाल पर स्थापित करने में कोई मदद मिलेगी ऎसी मैं आशा नहीं करता-क्योंकि जब तक लोगों में लिखने का उत्साह नहीं होगा तब तक यह काम नहीं हो सकता . हिंदी के यूनीकोड से मुझे कोई परायापन नहीं लगता क्योंकि यह बनाया तो भारत के लोगों ने ही है. कृति देव क्योंकि हिंदी का शब्द है पर केवल इसलिये तो हिंदी टूल का समर्थन नहीं किया जा सकता. टूल को लेकर भाषाप्रेम जैसी बात सोचना भी गलत है क्योंकि मुख्य सवाल तो लिपि का है और वह देवनागरी में ही हम लिख और पढ़ रहे हैं. अगर हम इस बात पर अड़ंगा लगाएंगे कि नहीं यूनीकोड के विदेशी होने की अनुभूति है तो फिर कंप्यूटर और अंतरजाल भी तो विदेशी लोगों की ईजाद किये हुए है और हम इस्तेमाल कर ही रहे हैं और फिर यूनीकोड एक टूल है कोई भाषा नहीं है. अब रहा सवाल कि जो लोग केवल कृति देव में टाइप करते हैं वह कैसे ब्लोगिन्ग करें, तो सीधा सा जवाब है कि वर्ड में लिखकर उसे पिक्चर में पेस्ट कर उसे जे पी जी फ़ाइल में स्केन कर उसे ब्लोग पर लायें. हाँ उसका शीर्षक और शुरू की चार लाइनें यूनीकोड में टाइप करें ताकि उससे अंतर्जाल पर देखा जा सके और चौपाल वालों को भी समस्या न आये. वर्डप्रैस में मैने यह प्रयोग किया है और वह सफल भी रहे हैं और इसी कारण सादा हिंदी फॉण्ट के परिवर्तित टूल में में दिलचस्पी कम ही रह गयी है-ब्लागस्पाट के ब्लोग पर साइज बड़ा रखना पड़ता है और इस कारण मेहनत बहुत हो जाती है. हो सकता है कि कंप्यूटर का ज्ञान कम होने से मुझे ढंग से स्केन न करना आता हो.

मैं लगातार चिट्ठा चर्चा देखता हूँ और एसा लगता है कि अभी भी रेमिंगटन के कीबोर्ड पर टाइप करने वाले लोग बहुत हैं जबकि मैने बहुत समय से गोदरेज के कीबोर्ड को ही प्रचलन में देखा है. इन सबके बावजूद मैं मानता हूँ कि हमें यूनीकोड का इस्तेमाल करते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए क्यों कि हमारे पास जो भी साधन हैं प्रयाप्त हैं . अभी गूगल का ट्रांसलेटर टूल मुझे बहुत अच्छा लगा-इस टूल की जानकारी मेरे एक एसे ब्लोगर मित्र ने दीं जिसकी कोई सलाह मेरे काम नहीं आयी. इस टूल के लिए मैं उसका आभारी हूँ . जिस तरह गूगल के हिंदी टूलों की किस्म देखी है उससे तो यही लगता है कि सादा हिंदी फॉण्ट को अंतर्जाल पर लाने वाला कोई फॉण्ट उनके पास कभी न कभी जरूर आयेगा. फिलहाल तो मैं स्वयं ही गूगल के ब्लोग के टूल पर निर्भर था पर यह नया टूल मुझे बहुत अच्छा लगा. मैने कई टूल देखें और उन्हें लोड करने का प्रयास किया पर कोई काम नहीं आया. इस चक्कर में दो बार कंप्यूटर ख़राब हो गया. इसलिये मैने तय किया है कि अब इसी टूल से काम चलाऊंगा. अपने साथियों के साथ अपने पाठकों को भी मेरी सलाह है अभी यूनीकोड टूल या स्कैन कर काम चलाएँ. मैं खुद कृति देव और देव में लिखने का आदी हूँ पर फिर भी बेधड़क इस यूनीकोड में लिख रहा हूँ और हो सकता है कि सादा हिंदी फॉण्ट को यूनीकोड में परिवर्तित करने वाला टूल आ जाये तब भी मैं इसे अपनाए रहूँ. आखरी बात यह ब्लोग (जिसे मैं अपनी पत्रिका कहता हूँ) भी अपने मन को खुश रखने का तरीका है. बस एक ही बात मेरे समझ में नहीं आती कि जब मैं कृति देव में लिखने वाला आदमी यूनीकोड में लिख सकता हूँ तो मेरे जैसे अन्य लोग इतने व्याकुल क्यों हैं और अपने रचना कर्म में और जोश खरोश से जुट जाते?

जब हिंदी के सादे फॉण्ट को यूनीकोड में परिवर्तन के लिए कोई वैज्ञानिक और प्रमाणित टूल आ जाये तभी सादा हिंदी फॉण्ट में रचना लिखकर पोस्ट करने का मन हो सकता है. मेरे विचार से अभी एसा कोई टूल अभी दिख नहीं रहा.

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