देश में जनचेतना लाना जरूरी


आज एक चैनल पर विभिन्न मनोरंजक चैनलों पर संगीत कार्यक्रमों में नृत्य और संगीत की प्रतियोगिताओं में किये जा रहे निर्णयों के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए उन पर संशय व्यक्त किया गया. कुछ प्रतियोगी निर्णयों से सन्तुष्ट थे तो कुछ असंतुष्ट. कुछ हारे प्रतियोगियों ने मांग की प्रतियोगियों के जजों को पूर्ण अधिकार दिए जाने चाहिए तो कुछ ने कहा पचास प्रतिशत जजों को तथा पचास प्रतिशत एसएमएस को दिया जाना चाहिए तो कुछ ने अपने अन्य संशय भी जाहिर किये.

अभी तक इन प्रतियोगिताओं के कार्यक्रम पर लोगों को संशय था पर प्रचार माध्यम एकदम खामोश थे, इस संबध में कई अपने हिंदी के ब्लोग लेखक लिख चुके हैं. मैने भी कुछ हास्य कवितायेँ और आलेख इस बारे में लिखे. मैं यह दावा नहीं करता के इन ब्लोग लेखकों की वजह से समाचार माध्यम चेते हैं पर जब कहीं किसी सार्वजानिक विषय पर चर्चा शुरू होती है तो उस जगह तक जरूर जाती है जहाँ से उसका स्त्रोत मौजूद होता है.

लोगों में इस बार में पहले से ही संशय था और भारत के समाचार चैनलों से यह आशा की जा रही थी कि वह इस पर रोशनी डालें, आज एक चैनल ने इस पर अपना दूसरा पक्ष दिखाया है कल को दूसरा चैनल भी कर सकता है. अंतर्जाल पर हो रही चर्चाओं पर लोगों की नजर नही जाती यह कभी नहीं सोचना चाहिए. हो सकता है कि हमें कम पाठक देखते हैं पर कई लोग और संस्थाएं ऎसी हैं जो इस पर नजर रखती होंगी. हिंदी में अन्तर्जाल पर ब्लोग है यह सभी जानते हैं और जिनका काम ही जनसंपर्क का है वह लोग इस पर नजर रखेंगें ही. अत: ब्लोग लेखक यह मानकर चलें कि वह जो लिख रहे हैं और उसका प्रभाव होगा. बढ़ते बाजारी करण में लोगों को भ्रम में डालने के लिए नए नए तरीके आएंगे और उन पर अपने विचार व्यक्त कर जहां ब्लोग लेखक अपनी बात रखकर मन हल्का करेंगे और समाज में चेतना भी ला सकते हैं. इतना ही नहीं प्रचार मध्यम भी आगे चलकर इन पर नजर रखेंगें क्योंकि उन्हें यहाँ से अपने कार्यक्रमों के बारे में रूचि और अरुचि की जानकारी मिलेगी.

भारतीय प्रचार माध्यमों से जुडे लोगों को भी सतत ऎसी व्यवसायिक चालों पर नजर रखनी होगी, क्योंकि अब उन पर भी नजर रखी जा रही है. आजकल लोग बहुत जागरूक हैं और इन प्रतियोगिताओं पर उनके मन में संशय शुरू से ही है कि इनमें शायद ही विजेताओं का चयन उस तरह होता हो जैसा कि दावा किया जाता है. चैनलों द्वारा इस तरह की रिपोर्ट देने से उन लोगों को भी वास्तविक धरातल पर विचार करने का अवसर मिलेगा जो इससे अवगत नहीं थे. व्यवसायिक बाध्यताओं के चलते ऎसी प्रतियोगिताओं के विज्ञापन देने में कोई बुराई नहीं है पर जनचेतना उत्पन्न करने की जिम्मेदारी के तहत उन्हें इनकी वास्तविकताओं पर प्रकाश डालना भी उनका दायित्व है और यह उन्होने किया यह संतोष की बात है.

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