मूर्ति पूजा से भी होता है ध्यान जैसा लाभ


इस देश में आध्यात्म को लेकर दो धाराएं सदैव रहीं हैं. एक तो निर्गुण और निराकार ईश्वर की आराधना की प्रवर्तक रही हैं दूसरी सगुण और साकार की उपासक. मतलब यह कि इतिहास इस विषय सा जुडे विवाद पर पहले भी बहुत बहस हो चुकी है पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल सका-और कभी निकलना भी नहीं है. सगुण और साकार भक्ति के उपासक भगवान की मूर्तियों बनाकर उसकी पूजा करते हैं और निर्गुण और निराकार ध्यान, ज्ञान और नाम की चर्चा कर भक्ति भाव का प्रदर्शन करते रहे हैं. देखा जाये तो भारतीय आध्यात्म की यही विशेषता रही हैं उसने दोनों धाराओं को अपने अन्दर समेटा है. श्रीगीता पढने वाले इसे तरह की बहस में नहीं पड़ते क्योंकि उसमें सब कुछ स्पष्ट कर दिया है और निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार की भक्ति को मान्यता देते हुए हृदय में शुद्ध भावना स्थापित करने का संदेश दिया गया है. विगत समय में दोनों विचारधाराओं के विद्वानों के मध्य तीव्र मतभेद रहे हैं पर समय के साथ इस देश के आध्यात्म ने दोनों को आत्मसात कर लिया. अब योग और ध्यान से निर्गुण और निराकार की उपासना करने वाले भी मंदिरों मे जाते हैं क्योंकि मूतियों के सामने जाकर प्रार्थना और ध्यान करने से भी मन को शांति मिलती है. मूर्तियों का स्वरूप हमारे अन्दर ऐसी तरंगें उत्पन्न करता है जिससे मन में सुख का अनुभव होता है.

कुछ विद्वानों का मत है कि मूर्तियों की पूजा भी एक तरह से ध्यान का ही रूप है क्योंकि उनको देखने से कुछ देर के लिए हमारा ध्यान सांसरिक वस्तुओं से हट जाता है और इससे मन को शांति मिलती है. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि अगर शुद्ध हृदय से पूजा की जाये तो प्रतिमा में भी भगवान् है. होता यह है कि कुछ लोग केवल मूर्ति की पूजा करते हैं पर ध्यान कहीं होता है और मूंह में मन्त्र और मन में दुनिया का तंत्र होता है और इसलिये वह अपने मन में शांति का अनुभव नहीं कर पाते. देखा जाये तो सभी देवी देवताओं की तस्वीरे इसलिये आकर्षक बनाईं जातीं हैं ताकि वह आदमी जिसे निरंकार का ध्यान लगाने में सहजता का अनुभव नहीं होता वह पहले साकार को अपने मन में धारण कर ध्यान लगाएं. हमारे देश में सहिष्णुता का भाव हमेशा रहा है इसलिये कभी मूर्तियों के स्वरूप को लेकर विवाद नहीं रहा है पर विश्व के जिन भागों में यह पहले हुआ करती थी वहां लोग अपने देवी-देवताओं की मूर्तियों को लेकर झगड़ते थे और इसी कारण उन जगहों पर मूर्ति पूजाओं को वर्जित करने वाली विचारधाराओं को बढावा मिला. भारत में कभी इस तरह भक्त आपस में नहीं लड़े कि हम अमुक भगवान् की मूर्ति को मानेंगे और अमुक को नहीं. सभी मूर्तियों की पूजा को साकार से निराकार की उपासना करने का एक जरिया माना गया. यही कारण है कि यहां कभी मूर्तियों को लेकर झगड़े नहीं हुए. हालांकि अब तमाम तरह के ढोंग और पाखंड हो गये हैं और कई लोगों ने मूर्ति पूजाओं की आड़ मे अपने व्यवसाय बना लिए हैं, और अपने देश के अधिकतर भक्तजन जो इन स्थानों पर जाते हैं और निष्काम भक्ति भाव से दर्शन कर लौट जाते हैं और इन पाखंडों में रूचि नहीं लेते पर जिनके स्वार्थ हैं और जिन्हें अपनी भक्ति का पाखण्ड करना है वही मूर्तियों को लेकर तमाम तरह के प्रचार करते हैं पर उनके लिए ज्यादा समर्थन नहीं होता.

जो लोग निरंकार ईश्वर की उपासना नहीं कर पाते उन्हें श्रद्धा भाव से भगवान् की मूर्तियों पर ही शुद्ध भाव से नमन करना चाहिए क्योंकि उससे भी मन को संतोष मिलता है उन्हें इस बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि वह मूर्ति किसी धातु या पत्थर की बनी है. उसके आकर्षण को अपने मन में धारण करना चाहिऐ, ऐसा करने से भी मन में प्रफुलता का भाव पैदा होता है. मूर्ति पूजा साकार से निराकार की तरफ जाने का मार्ग है और जो लोग निरंकार की उपासना करने में असहज अनुभव करते हैं और जीवन में तनाव अधिक महसूस करते हैं उन्हें किसी इष्ट की मूर्ति के समक्ष नमन करना चाहिए और हो सके तो आरती भी करना चाहिए. यह उपाय भी ध्यान जैसा लाभ प्रदान करता है अगर शुद्ध हृदय से किया जाये.

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