बेनजीर की हत्या:पाकिस्तान का भविष्य भी दाव पर


आखिर आतंकवादियों ने बेनजीर को मौत की नींद सुला दिया। एक मासूम औरत जो अपने देश के लोगों के लिए लोकतंत्र की रौशनी जलाना चाहती थी उसे मार डाला। आखिर एक मासूम औरत को मारकर क्या पाया? एक शिक्षित और सुन्दर जिस्म की मालिक औरत को मारकर चंद दिनों के लिए सुर्खियों में रहेंगे और अपने आकाओं से कुछ तोहफे पाकर फिर और हत्याओं में जुट जायेंगे।

क्या बात इतनी है? नहीं! वह एक ऐसी औरत है जो मर्दों के चंगुल में फंसी इस दुनिया में उनकी राजनीति का शिकार बनी। वह अगर देश की प्रधानमंत्री बनतीं तो उससे किसको ख़तरा था- और जिसे था वही उनका दुश्मन है। कुछ तत्काल विचार ख्याल आते हैं।

क्या पश्चिमी देश वाकई पाकिस्तान में लोकतंत्र चाहते हैं?

उत्तर-नहीं! पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं जिसे वहाँ के लोकतांत्रिक नेता संभाल पायेंगे इसका उन देशों को यकीन नहीं है। मुशर्रफ अभी भी उनकी जरूरत है। और बेनजीर प्रधानमंत्री बनतीं तो अधिकारों को लेकर उनसे संघर्ष होता। विश्व का तमाम तरह से दबाव था और इसलिए पश्चिमी देशों ने वहाँ लोकतंत्र की बहाली के नाटक के लिए बेनजीर को वहाँ भेजा तो मुस्लिम राष्ट्र भी पीछे नहीं रहे उन्होने अपने समर्थक नवाज शरीफ को वहाँ भेजा-बेनजीर एक महिला थी और उसका पाकिस्तान का प्रधानमंत्री इतनी आसानी से बनना स्वीकार्य नहीं था और चाहते थे कोई उनका बड़ा समर्थक भी वहाँ की राजनीति में बना रहे।

पश्चिमी राष्ट्रों की हमदर्दी केवल अपने हितों से होती है और एशिया में तो महिला और या पुरुष उनको किसी से कोई सहानुभूति नहीं होती। बेनजीर अब नहीं रही तो हो सकता है कि चुनाव ही न हों और हों तो परिणाम ऐसे आयें कि मुशर्रफ की ताकत जस की तस ही रहे। यही पश्चिमी राष्ट्र चाहते हैं। अगर बेनजीर बाहर रहतीं और चुनाव होते तो उनको विश्व में इतनी मान्यता नहीं मिल पाती जितना उनके पाकिस्तान में रहते मिलती और अब तो नहीं रहीं तो फिर भी मान्यता तो रहेगी। बेनजीर के बाहर जीवित रहते हुए चुनाव केवल नाटक माने जाते पर पाकिस्तान आयीं तो लोकतंत्र की वापसी होती लगी। उनका काम बस यहीं तक ही था। अब फिर वही होने वाला है। पाकिस्तान में सरकार का सुप्रीमो अब वही होगा जो मुशर्रफ का रबड़ स्टांप होगा। अगर बेनजीर नहीं है तो नवाज शरीफ की भी स्थिति कोई अच्छी नहीं रहने वाली है। इस तरह सब के हित पूरे हो गए। मुशर्रफ का खेल अभी और चलेगा। पश्चिमी राष्ट्रों की मुख्य चिंता पाकिस्तान के परमाणु अस्त्र हैं। भारत के सामने एक ताकतवर शत्रु रहे अपनी इसे नीयत के चलते वह उसका परमाणु भण्डार नष्ट भी नहीं करवा सकते।

मगर पश्चिमी देशों की गलतफहमी है कि पाकिस्तान अभी भी भारत को रोकने के लिए उनका हथियार है। ऐसा लगता है कि उसका सही आंकलन नहीं कर रहा। जिस तरह वहाँ आत्मघाती हमलावरों की बाढ़ आयी हुई है उससे नहीं लगता कि पाकिस्तान बच पाएगा। रावलपिंडी में पाकिस्तान का मुख्यालय है और कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि सबसे अधिक आतंकवादी ताक़तवर वहीं है। बाहर के लोग नहीं पाकिस्तान के लोग ही आतंकवादियों और प्रशासन में मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं। पाकिस्तान एक देश है यह गलतफहमी भी नहीं पालना चाहिए क्योंकि पंजाब के अलावा और बाकी सूबों में उसके लिए कोई सदभावना नहीं है। वह भारत नहीं है जिसके हर प्रांत में देशभक्ति की भावना है, बल्कि भाषा और अन्य आधारों पर वहाँ जितने विभाजन हैं उनको पाटने की वहाँ के नेताओं ने कभी कोशिश नहीं की। बेनजीर की हत्या के परिणाम क्या होंगे यह तो वक्त बताएगा पर अब एक बात तय हो गई है कि पाकिस्तान में मुशर्रफ के बाद उसका कोई भविष्य नहीं है। अब तो पाकिस्तान और आतंकवाद सहअस्तित्व के सिद्धांत पा टिके हुए हैं. एक नहीं दोनों साथ जायेंगे. अब पश्चिमी राष्ट्र को अपनी रणनीति पर फिर विचार करना होगा, नहीं तो यह मुसीबत उन पर ही आने वाली है.

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