लिखते हैं संजीदा पर नाम बताते अफलातून-समीक्षा


ब्लोग जगत में कुछ ऐसे ब्लोगर हैं जो बहुत संजीदगी के साथ लिखते हैं और उनमें मैं बिना झिझक अफलातून जी का नाम लेता हूँ। मैं वर्डप्रेस पर उनके ब्लोग जरूर देखता हूँ और इसका कारण यह है कि उनके ब्लोग से ही मुझे कुछ ऐसे विषय मिलते हैं जिन पर मुझे भी लिखने में मजा आता हैं। अपने विषय से दूसरे को प्रेरित कर सके ऐसा तभी लिखा जा सकता है जब लेखक संजीदगी से लिखे और यह गुण उनके लेखन में साफ दिखाई देता है।

मुझे याद नहीं आता कितने आलेख और कवितायेँ मैंने उनकी पोस्ट से प्रेरित हो कर लिखीं हैं। अभी उन्होने बौद्धिक साम्राज्यवाद पर अपने लेख लिखे हैं और मैं उन पर लिखने वाला हूँ। देश में स्वतंत्रता के बाद विभिन्न विचारधाराओं के आधार पर समाज चला तो लेखन भी उसी रास्ते पर चला-आखिर साहित्य तो समाज का ही दर्पण होता है। अफलातून जी के एक ब्लोग का नाम ही इस बात का प्रमाण है कि वह प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित हैं। अपनी पोस्टों में वह आम आदमी की पीडा को जिस तरह प्रभावी ढंग से रखते हैं वह रुचिकर एवं प्रेरणादायक होता है। मूलत: लेखकों में कोई मतभेद नहीं होता पर चिंतन और अभिव्यक्ति की शैलियों में विभिन्नता से ऐसा प्रतीत होता है कि वह अलग-अलग हैं। कई बार मैंने उनके विषय के प्रतिवाद में अपनी बात रखी है पर इसका कारण यह नहीं कि वह विरोध का प्रतीक है। होता यह है कि कई बार आदमी अपने विचारों के अनुसार किसी विषय का एक पक्ष रखता है और दूसरे को अनदेखा कर देता है कोई दूसरा लेखक प्रतिवाद स्वरूप अपना विषय रखता है तो वह विरोध नहीं बल्कि पूर्णता का प्रतीक है। अफलातून ने अभी बौद्धिक साम्राज्यवाद के आलेख पश्चिमी विचारधाराओं की पोल खोली थी। उस लेख से बहुत अच्छी जानकारी थी पर कुछ लोग पश्चिम के साथ अन्य दिशाओं से देश में आयी विचारधारा पर भी सवाल उठाते हैं और आज तो सभी विचारधाराओं से प्रतिबद्ध लेखक आजकल निराशा के दौर में हैं क्योंकि हम भारतीयों का चाल चलन और रहन सहन ही इस तरह का किसी लीक पर न चलकर स्वतन्त्र रूप से विचरण करने की आदत है और इसलिए अपने लिखे से समाज में बदलाब की आशा करने वालों को निराशा ही हाथ लगती हैं। आज के संदर्भों में अगर देखें तो देश का हिन्दी लेखक भले ही पुरानी विचारधाराओं के खंडहर संभाले बैठें पर आप जानते हैं बाजार के बहाव ने सबके किले ध्वस्त किये हैं। इसके बावजूद कुछ लेखक उनके साथ जुडे हैं तो केवल इसलिए कि विचारधाराओं के रथ को आगे ले जाने वाले लोगों की कथनी और करनी में अपने स्वार्थों के चलते अंतर रख सकते हैं पर लेखक अपनी प्रतिबद्धताओं के कारण ऐसा नहीं कर पाते। अफलातून जी अपने लेखों में जिस तरह अपनी स्वतन्त्र सोच रखते हैं वह प्रभावित करती है.

अफलातून जी और मैंने लगभग एक ही साथ ब्लोग जगत में कदम रखा और शुरूआती दौर में ही मुझे लगा कि वह एक विचारधारा से प्रभावित हैं और उनकी रचनाओं के प्रति मेरा दृष्टिकोण भी अधिक संजीदा नहीं था। नारद पर चले विवाद के दौरान उनके लेखों को पढ़कर मुझे लगता था कि वह एक सुलझे हुए बुद्धिजीवी हैं पर शायद ब्लोग जगत को अधिक नहीं समझ पाए इसलिए अपने असली स्वरूप में नहीं लिख पा रहे थे। धीरे-धीरे अब वह उस प्रबुद्ध लेखन की तरफ वह बढ़ गए जिसकी उनसे अपेक्षा थी। मैं उनके आलेखों में बहुत दिलचस्पी लेता हूँ। हालांकि अन्य विषयों में हमारे दृष्टिकोण में भिन्नता हो सकती है पर क्रिकेट के बारे में हमारे विचार एक जैसे हैं। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी में भारत की विश्व कप की जीत के बाद जब आस्ट्रेलिया की टीम भारत आ रही थी तो मैंने उस पर लेख लिखा था तो उन्होने कमेन्ट दी कि जिस तरह १९८३ में विश्व कप जीतने के बाद भारत को अपने ही देश में वेस्ट इंडीज ने बुरी तरह हराया था उसी तरह आस्ट्रेलिया भी करेगा. यह लाइन मैंने अपने लेख में लिखने की सोची थी फिर विचार बदल दिया और जब उनकी कमेन्ट आयी तो लगा जैसे अब मेरा लेख पूरा हो गया. उनको भी मेरी तरह दुष्यंत की गजलें पसंद हैं. मतलब यह कि हम वैचारिक धरातल पर एक समान ही सोचते हैं.
लेखन के प्रति उनकी संजीदगी की उनकी भाषा शैली और विषय चयन भी हमेशा उनकी बौद्धिक क्षमता के अनुसार रहता है. एक बात में हमेशा कहता हूँ कि बिना अध्ययन, चिंतन और मनन के दूसरों को प्रभावित करने वाला लिख ही नहीं सकते और अफलातून जी का लेखन प्रभावित करता है-यह अलग बात कि कुछ विषयों में राय भिन्न हो पर मूल विचार एक ही होता है..आम आदमी की चिंताएं के साथ जुडे रहकर उन पर लिखने के लिए अफलातून की सराहना करता हूँ. मैं उनसे आगे भी ऐसी ही आशा करता हूँ कि वह अपने लिखना को इसी तरह जारी रखेंगे. हाँ जैसा कि हर समीक्षा के बाद मैं लिखता हूँ और अब भी लिख रहा हूँ कि अगर मैंने अगर अफलातून जी के बारे में कम या गलत लिख दिया तो उनके प्रशंसकों से और अधिक लिख दिया हो तो उनके आलोचकों से क्षमाप्रार्थी हूँ. अफलातून जी के उज्जवल जीवन की शुभकामनाओं सहित यह आलेख उन्हीं को समर्पित इस सूचना के साथ आगे मेरे व्यंग्यों में कभी अफलातून पात्र भी आ सकता है उसे उनका प्रतीक न समझा जाये.
उनके ब्लोग हैं-समाजवादी परिषद, शैशव और यही है वह जगह

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टिप्पणियाँ

  • अफ़लातून  On मार्च 14, 2008 at 19:16

    समीक्षा के लिए आभार। यह नाम पिताजी का दिया हुआ है और इसके अलावा अन्य नाम नही है।२२ फरवरी से १० मार्च अस्पताल में था इसलिए यह पोस्ट देरी से देखी।

  • अफलातून जी,

    आपके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हो उठा हूँ और मेरा सुझाव यह है कि अपने चिकित्सक से परामर्श कर प्राणायाम शुरू कर दें. आपने मुझे देखा होगा और मैं अब कुछ नहीं लिख रहा. योगासन और प्राणायाम करने के बाद सब सहजता से लिख जाता हूँ. मुझे वह १७ दिन जो अस्पताल में बिठाये और पीडा झेली उससे चिंता हुई इसलिए मित्रवश लिख रहा हूँ. प्राणायाम से आप खुश रहेंगे यह मैं गारंटी से कह रहा हूँ और कोई चिकित्सक इस बात की गारंटी नहीं ले सकता. अगर कंप्यूटर पर सतत काम करना चाहते हैं तो उसमे आपको सहायता मिलेगी
    दीपक भारतदीप

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