दिल से सम्मान करे वही है सच्चा वीर-हास्य कविता


फटे हुए कपडे पहने
चक्षुओं से अश्रु प्रवाहित करता हुआ
फंदेबाज आ पहुंचा और  बोला
”दीपक बापू आज हमारी बात मान लो
हम पत्नी पीडितों का दर्द भी जान लो
लिखो  महिला दिवस पर हास्य कविता
करो हमारे दर्द का हरण
नहीं तो हम मर  जायेंगे”

घर के बाहर पहुंचे थे उसी समय
धूप में सायकल चलाकर
पोंछ रहे थे पसीना बीडी जलाकर 
और धुआं छोड़ते  हुए बोले दीपक बापू
”अभी तो घर में घुसे और तुम आ गए
कहते हो हास्य कविता लिखो
भूल गए कितने उस पर व्यंग्यबाण चला गए
फिर भी बताओ माजरा क्या है
लिखने की सोचेंगे अगर समझ जायेंगे”

बोला फंदेबाज
”दीपक बापू
आज है महिला दिवस
हमने रास्ते  में दी अपनी
एक पढी-लिखी  पडोसन को उसकी बधाई
बीबी तो कम पढी लिखी है
क्या जानती है इस बारे में
इसलिए हमने इस बारे में
कोई बात नहीं बताई
पडोसन ने जाकर  बता दिया घर पर
सास भी थी वहीं
हुआ घमासान
हमारी हो गयी  पिटाई
आज है तुम्हारी हास्य कविता का सहारा
तुम लिखो तभी हम घर जायेंगे
नहीं तो कही भाग जायेंगे”

पहले ही थे पसीना और निकलने लगा
अपनी धोती कसते  और टोपी संभालते
और हँसते हुए बोले-
”तुम भी हो नालायक
भला क्या जरूरत थी जो दी बधाई
शैतान भी दस घर छोड़  देता है
मूर्ख ही है वह जो  पड़ोस में पंगा लेता है   
वैसे तुम्हारी पत्नी कम पढी-लिखी है
पर समझदार है
मेरी तरफ से उनको देना बधाई
हम उनको मानते हैं
तुम्हारी  नालायकी को भी हम जानते हैं
इसलिए पुरुष दिवस की बात तुमको नहीं बताई 
तुम्हें पडी  मार भी असरदार है
 जिन हास्य कविताओं पर हँसते थे
उसी की शरण में आये हो
मगर गलत समय पर आये हो
हम हास्य कविता नहीं लिख पायेंगे
समझदार महिलाओं पर हम क्या लिख पायेंगे

सुना है कहीं
पत्नी पीड़ित अपना दर्द सुनाने के लिए
महिलाओं को बाँट रहे हैं फूल
हम नहीं बरसा सकते शब्द रूपी शूल
वैसे भी क्या गम जमाने में
जो बैठे बिठाए मुसीबत बुलाएं
महिला दिवस पर कविता आजमाने में
हमारे घर पर ऐसे लफड़े नहीं होते
कि  तुम्हारी तरह रोते
इधर-उधर मुहँ से कहने की बजाय
लिखकर ही कविता में सजाते हैं बधाई
यही है हमारी कमाई
अब तुम निकल लो यहाँ से 
घर पर सुन लिया कि  तुम
हास्य कविता लिखवाने आये हो
तुम्हारे साथ हम भी फंस जायेंगे 
 यहाँ से भी कट जायेगा तुम्हारा  पता
फिर हम तुम्हें चाय भी नहीं पिला पायेंगे
वैसे ही है महिलाओं के अधिकार का प्रश्न गंभीर
महिलाओं का स्वभाव होता है कोमल और  धीर
कह गए हैं बडे-बडे विद्वान
महिला का  दिल से सम्मान करे
वही  है सच्चा  वीर
जो अब तक संसार  नहीं समझ पाया  
तुम और हम क्या समझ पायेंगे
हम इस पर हास्य  कविता नहीं लिख पायेंगे
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 नोट-यह हास्य कविता एक काल्पनिक रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है.

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