लिखने वाले हिट्स की परवाह नहीं करते-आलेख


मैं सोचता हूँ कि ब्लोगरों के विषय पर कम लिखूं पर रोज कोई न कोई ऐसी बात होती है कि मुझे अपनी पुरानी लिखी बातें दोहरानी पड़ती हैं और कई बार तो ऐसा होता है कि मैं शाम को घर लौटते समय कोई विषय सोचता हूँ पर यहाँ ब्लोग पर कुछ ऐसा देखता हूँ तो फिर इसी विषय पर लिखने बैठ जाता हूँ।

आज श्री सुरेश चिपलूनकर जी ने भी ब्लोग जगत से तौबा(अच्छा यह है कि उन्होने शायद शब्द जोडा है) करने का फैसला सुना दिया। मैं तो हतप्रभ रह गया क्योंकि वह अकेले ब्लोगर हैं जिनसे मैं ग्वालियर में मिल चुका हूँ। पहले मैं उनको इतना नहीं पढता था पर उनसे मुलाक़ात के बाद उनकी पुरानी और नई पोस्ट पढता रहा। उनके लिखे को देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावी लगा और अगर कोई नया ब्लोगर होगा तो उसे सुरेश चिपलूनकर जी को आदर्श मानने के लिए कहूंगा। किसी भी फोरम पर हिट न मिलने का दुख उनको भी है। इस मामले में उनसे मुझे कोई हमदर्दी नहीं है और क्योंकि जैसा वह लिखते हैं उसकी उनको जरूरत नहीं है बल्कि उनमें इतना सामर्थ्य है कि वह मुझ जैसे फ्लॉप ब्लोगरों से हमदर्दी जाता सकें। हम दोनों मिले पर किसी ने ब्लोगर मीट की रिपोर्ट नहीं छापी यह इस बात का प्रमाण है कि हम कितने सहज भाव के लोग हैं। कहते हैं कि संयोग तो संयोग को ढूढ़ लेता है।

राजीव तनेजा, परमजीत बाली, रविन्द्र प्रभात, ममता श्रीवास्तव, घुघूती बासूती और उड़न तश्तरी मेरे ब्लोग पर निरंतर संपर्क में रहते हैं और उससे ऐसा लगता है कि सहज भाव से लेखन करने वालों की रचना में धार रहती है। दरअसल उछलकूद करने वाले कम संख्या में रहते हैं पर दिखते अधिक हैं जबकि सहज भाव के लोग अधिक होते हैं पर दिखते कम हैं।

पहले सुरेश चिपलूनकरजी के बारे में थोडी बात और कर लें।
1.वह अपने ब्लोग अपने मित्रों को भेजते हैं और उनको वह वहीं पढ़ते हैं और उनकी संख्या चारों फोरमों की सफलतम पोस्टों की हिट से अधिक होती है।
2.वह व्यापक विषयों पर लिखते हैं और ब्लोग और ब्लोगरों पर कम ही लिखते हैं। विवादास्पद नहीं लिखते। जैसे-जैसे प्रसिद्धि मिलेगी आम पाठकों में उनको बहुत पढा जायेगा। यह भी आज संयोग है कि मैं अपने मित्रों को अपने जिन ब्लोगों के पते दिए हैं उन पर उनको लिंक करने वाला था और उन सबको कह भी दिया है।
3.गहन अध्ययन कर लिखते हैं और उसके पाठक वैसे भी कम होते हैं। उन जैसा लेखन इन ब्लोगों पर मैंने नहीं देखा है पर वह अपने मित्रों के अलावा फोरमों पर नये संपर्क समयाभाव के नहीं बना पाए। फोरमों पर तो अगर शीर्षक में ब्लोग लिखा हो तो वह हिट हो जाता है। सुरेश चिपलूनकर जी को तो मित्र लोग ईमेल पर ही पढ़ लेते है तो फिर उनको वहाँ हिट ब्लोग विषय पर लिखने से भी मिलेंगे इसमें संदेह है। फिर हम लोगों के मन में हिट है तो किसकी परवाह करते हैं।
४.ब्लागस्पाट पर होने के कारण वर्डप्रेस के ब्लोग उनके संपर्क में अधिक नहीं आ पाते। वर्डप्रेस के ब्लोगर अगर चौपालों पर जिसे नही देख पाते उसे अपने डेशबोर्ड पर भी देख लेते हैं पर अगर ब्लोगस्पॉट के ब्लोग चूक गए तो फिर उसे नहीं देख पाते।

यह फोरम तो केवल आपस में मेल मिलाप की भूमिका तक ही ठीक हैं पर आपकी पोस्ट तो आगे भी जाती है। केवल ब्लोगर ही देखते हैं यह बात नहीं है अन्य लोग भी देखते हैं। कमेन्ट देने वाले ब्लोगर आपके मित्र की तरह हैं और आप जिन की पोस्टें हिट देखते हैं वह उनके मित्रों का परिणाम है और पहले अपने को तो हिट बना लें फिर किसी को बनाएं। इस हिट-फ्लॉप के चक्कर में पढना बेकार है। कौन कैसा लिख रहा है सब देख रहे हैं।

जहाँ तक लिख का समाज और लोगों को बदलने की बात तो यह एक भ्रम है कि हम अपने लिखे से कुछ बदल सकते हैं। अरे, इस समाज को भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम और संत शिरोमणी कबीरदास और महान विचारक चाणक्य अपने अनुभव और ज्ञान की अनमोल संपदा सौंप गए तब उसके यह हाल हैं तो वह किसके लिखने से बदलेगा। हाँ एक लेखक के रूप में उस ज्ञान की धारा को आगे बढाने का नैतिक कर्तव्य पूरा करना ही एक धर्म हैं।

लोगों पर प्रभाव पड़ता है और मैं कई पोस्टों से इतना प्रभावित होता हूँ कि कमेन्ट लिखते समय अगर वह लिखूं तो ब्लोगर कहेंगे कि मजाक उड़ा रहा है।
कल भी लिखा था और आज भी लिख रहा हूँ सौ से अधिक हिट भी हिन्दी में क्या मायने रखते हैं? जबकि यह करोडों लोगों की भाषा है। मजे के लिए लिखो तो खूब मजा आयेगा। लिखने का व्यसन तो मेरा पुराना है और यहाँ अपनी एक तरह से डायरी लिख रहा हूँ। ऐसे में मित्रों का मिलना तो एक बोनस है और सुरेश चिपलूनकर जी से हुई भेंट और राजीव तनेजा से फोन पर हुई बातचीत इसी लिखे का परिणाम है।

बस इतना इस विषय पर आज इतना ही। इस विषय पर इसी ब्लोग पर मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि चौपालों के हिट या फ्लॉप एक भ्रम है। मैं उम्मीद करता हूँ कि सुरेश चिपलूनकर जी आगे भी लिखना जारी रखेंगे।

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