आशा ही नहीं रखते तो निराशा भी नहीं होती-आलेख


ब्लागस्पाट के ब्लाग एक आकर्षक कूड़ेदान की तरह लगते है। उस दिन मैं अपने टेलिफोन और इंटरनेट कनेक्शन का बिल भरने  गया तो वहां पानी पीने के लिये प्लास्टिक का ग्लास उठाया और पीने के बाद  वहीं पड़े फाइबर प्लास्टिक के कूड़ेदान में डाल दिया। वह दिखने में बहुत अच्छा लग रहा था तब मुझे ब्लागस्पाट के ब्लाग की याद आयी।
इसके ब्लागों पर मैंने भी बहुत लिखा है पर लगता है कि गई भैंस पानी में। जब मैंने शुरू में इस पर ब्लाग बनाये तब विज्ञापन वर्गैरह का विचार नहीं था। फिर जब दूसरे ब्लागरोंं के ब्लाग पर विज्ञापन देखें तो हमने भी लगा लिये। उस समय अधिक जानकारी नहीं  थी, सो  थोड़ी जगह पर ही विज्ञापन लगाये। फिर हमने एक वरिष्ठ ब्लागर की पोस्ट पर पढ़ा कि गूगल का हिंदी में आर्थिक योगदान नगण्य है। तब हमने इसके विज्ञापन हटा दिये। फिर एक ब्लाग पर पढ़ा कि अगर गूगल के विज्ञापनों को अधिक जगह दी जायें तो उससे आय हो सकती हैं। वह किया तो एक ब्लागर के ब्लाग पर पढ़ा कि यह अंग्रेजी ब्लाग के मुकाबले कमीशन कम देता है। मतलब वह भी हिंदी के प्रकाशकों की तरह है।

अब हमने जब अपने गूगल एकाउंट को चेक किया तो इसमें तो 100 डालर में दस से पाचं वर्ष से क्या कम समय लगेगा-यह अनुमान मेरा अपने ब्लाग के बारे में दूसरों का मुझे पता नहीं है। मतलब साफ है कि गूगल के एडस एकाउंट का प्रदर्शन हिंदी में अत्यंत खराब है और इसलिये ही गूगल को भारत में अधिक लोकप्रियता भी नहीं मिली। मैंने देखा है जो हमारे निजी जानकार मित्र हैं अधिकतर लोग याहू पर अपना ईमेल बनाते है। सच तो यह है कि हिंदी के ब्लागर अगर ब्लागस्पाट के ब्लाग नहीं बनाते तो शायद उसके जीमेल को कोई भी नहीं पूछता। मैने भी शुरूआत मंे याहू पर ही ईमेल बनाया और वर्डप्रेस के दो ब्लाग मैंने उसी पर ही बनाये। वहां समझ में नही आया (उसकी वजह यह थी कि मैं यूनिकोड में नही लिख रहा था) तब ब्लागस्पाट पर ब्लाग बनाने के लिये जीमेल बनाया। 

मैने वर्डप्रेस और ब्लागस्पाट पर बराबर लिखा है। हां पहले सोचा था कि देखें
ब्लागस्पाट के ब्लाग से शायद कोई आय हो जाये पर अब तो लगता है कि सारी मेहनत पानी में गयी। असल में इसके पीछे एक कारण और भी है। वर्डप्रेस पर हम चाहें अपनी पोस्ट पर जितनी श्रेणी रख दें वह लेता है जबकि ब्लागस्पाट पर अंग्रेजी के 200 वर्ण से अधिक नहीं लेता। यही श्रेणियां पाठक तक हमारे ब्लाग को ले जातीं है। इसलिये वर्डपेस के ब्लाग अधिक पाठक जुटा लेते हैं और चहलकदमी करते हैं और वहां के ब्लागर उनको देखकर अपना दिल भी बहलाते हैं। उसका डेशबोर्ड ब्लागरों के आपस में मिलाने का काम भी करता है। जबकि ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये पूरी तरह हिंदी के एग्रीगेटरों पर ही निर्भर रहता पड़ता है। ब्लागस्पाट पर अपनी पोस्टें रखने का मतलब है कि साठ फीसदी पाठकों से अपनी पोस्ट दूर रखना। आज दोपहर तक ब्लागस्पाट के सात   ब्लाग पर केवल आठ व्यूज हैं जबकि  वर्डप्रेस के पांच ब्लाग पर  पचास व्यूज हैं। शाम तक वर्डप्रेस के ब्लाग करीब डेढ़ सौ के आसपास व्यूज जुटा लेंगे और  ब्लागस्पाट पर अगर कोई नई पोस्ट नहीं लिखी तो वहां अधिक से अधिक दस और व्यूज आएंगे।

मुझे हमेशा वर्डप्रेस पर  अपनी सक्रियता देखकर खुशी होती है जबकि ब्लागस्पाट के ब्लाग बोर कर देते हैं। न इसमें नाम है और न नामा। गूगल का एड एकाउंट जितनी आय दिखा रहा है उससे कई गुना तो वह जगह घेर रहा है हालांकि यह भी सही है कि उस पर एग्रीगेटर के बाहर पाठक नगण्य हैं। अन्य ब्लाग पर  भी जब गूगल के विज्ञापन देखता हूं तो मुझे अपने पर हंसी आती है। यह सोचकर कि देखो हम  दूसरों पर  भ्रम में पड़ जाने वाली बात कहते है और हम  भी इसमें पड़ गये। बहरहाल उनकी चमक की वजह से ही लोग उस पर अधिक आकर्षित हैं पर जैसा कि नाचने के बाद मोर रोता है वैसे ही वहां से ब्लागर जब उकता जाते हैं तो निराशा की बातें भी करते हैं जबकि वर्डप्रेस वाले क्योंकि कोई आशा ही नहीं रखते तो निराश भी नहीं होते।

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