अंतर्जाल पर पाठ के शीर्षक की अधिक महत्वपर्ण भूमिका है-आलेख


मैंने एक बार एक ब्लाग देखा था जिसके लेखक ंने चार ब्लाग लेखकों के
नाम शीर्षक में लिखकर अपना पाठ पूरा छोड़ दिया और नीचे लिखी संक्षिप्त विषय सामग्री में उसने यह बताया कि किस तरह सभी ब्लाग लेखक केवल शीर्षक देखकर ही पढ़ते हैं। उस पर कुछ ब्लाग लेखकों ने बहुत नाराजगी भरी टिप्पणियां रखीं तो कुछ ने अपने साथियों की इस कमी पर हंसते हुए समर्थन में विचार व्यक्त कर रहे थे। मुझे यह देखकर ताज्जुब होता है कि लोग दूसरे के मन और विचारों पर टिप्पणियां तो लिख लेते हैं कि पर अगर वह आत्म अवलोकन करें तो शायद अपनी इस गलती से बच सकत है।

उस समय मैंने इस पर अपना विचार भी लिखा था पर यूनिकोड में लिख रहा था इसलिये मुझे लगता है कि अपनी बात पूरी तरह नहीं कह पाया, फिर उसके बाद कुछ अनुभव ऐसे भी हुए जिससे लगता है कि उनके बारे में लिख कर अंतर्जाल पर वेबसाईटों या पेजों पर लिखने वाले मित्रों के साथ बांटा जाये।
अगर कोई आदमी शीर्षक देखकर रचना या पाठ पढ़ने का आदी है तो उसमें मुझे कुछ अस्वाभाविक नहीं लगता। शीर्षक तो रचना या पाठ का शीर्ष होता है। हम आदमी और पशु को उसके शीर्ष से पहचान पाते हैं। शीर्ष के बिना अन्य देह का महत्व नहीं होता। पुरुष और महिला के चेहरों में भी अंतर परिलक्षित होता है जो पृथक-पृथक पहचान है? प्रकृति ने शायद इसलिये ही यह अंतर रखा ताकि अधिक बखेड़े खड़े न हों। आशय यह है कि शीर्ष और शीर्षक पहचान है और किसी रचना या पाठ की पहचान उसके शीर्षक से ही होती है। अगर किसी पाठ में दवा का नुस्खा है तो उस पर हास्य व्यंग्य नहीं लिख सकते। ऐसा करना मूर्खता होगी। हम अपने सामने से गुजरने वाला हर विषय नहीं पढ़ सकते-शीर्षक से उसके विषय का अनुमान कर ही उसे पढ़ते है। ऐसे में शीर्षक स्पष्ट होना चाहिए। इसलिये शीर्षक देखकर पढ़ने की आदत का किसी पर भी आरोप लगाना गलत है। जिस ब्लाग का मैंने ऊपर चर्चा की थी उउसका शीर्षक देखकर ही उसकी विषय सामग्री पढ़ने के लिए खोला था उससे मुझे भी निराशा हुई थी। साथ ही मुझे हैरानी इस बात पर हो रही थी कि अपने साथियों पर ही हंसने वाले लोग अपना आत्म मंथन करते नहीं लग रहे थे-मेरा दावा है कि वह भी शीर्षक देखकर ही पढ़ते होंगे।

अब अंतर्जाल पर शीर्षक का महत्व भी जान लें। हम यहां जिसे पाठ जो भी शीर्षक लिखते हैं उसका हर शब्द प्राणवान होता है। जैसे मैंने लिखा था ‘ब्लागर चला क्रिकेट मैच खेलने’। यह पाठ पांचों शब्द ही अलग-अलग सर्च इंजिन में रखकर कर कई बार पढा जा चुका है। हमारी रचनाओं और पाठों के शीर्षक का हर शब्द अंतर्जाल पर एक स्वतंत्र इकाई है। उसमें से शीर्षक को कोई भी एक शब्द आपके पूरे पाठ को पाठक के सामने ले जाता है। यहां शीर्षक केवल मूर्त रूप में अपनी देह यानि पाठ से नहीं जुड़ा कि वह उसकी पहचान ही करायेगा बल्कि वह उस जगह समूचे स्वरूप में पहुंच सकता है जहां उसको ढूंढा जायेगा। ऐसे में शीर्षक उतना ही महत्व रखते हैं जितने पाठ के शब्द। मैं अपने पाठों के शीर्षकों के मामलें में अधिकतर सतर्कता बरतता हूं। पाठ के अंदर की सामग्री का परिचय अपने शीर्षक में दे देता हूं। हास्य कविता, हास्य व्यंग्य, कविता, लघु कथा, कहानी या आलेख को स्पष्टीकरण इसलिये देता हूं कि जिसे अगर वह नापसंद हो तो वह मूंह फेर ले। कुछ लोगों को कविताओं से परहेज होती है और उन्हें मेरे पाठों से परे जाने में असुविधा न हो इसलिये ही करता हूं। हालांकि यह काम श्रेणियों और टेगों से भी किया जाता है तो वह भी बहुत लाभदायक रहता है क्योंकि ऊपर तो एक ही कोई श्रेणी दी जा सकती है।

अंत में यही कहना चाहूंगा कि शीर्षक ही पाठ का महत्वपूर्ण भाग है और अगर हम सोचते हैं कि कोई उसे पढ़े तो वह आकर्षक तो होना ही चाहिए अपने पाठ की विषय सामग्री का मूल मंत्र भी उसमें होना चाहिए। यह मानकर चलें कि लोग इसके आधार पर ही आपके लिखे पाठ की ओर आकर्षित होते हैं और उन पर आपत्ति उठाने की बजाय हमें यह भी देखना चाहिए कि क्या हम स्वयं ऐसा नहीं करते? अंतर्जाल पर शीर्षक की भूमिका बाहर से कहीं अधिक प्रतीत होती है।

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