इस दुनियां में कुछ भी संभव है-आलेख


विश्व में बहुत सारे अपराध होते हैं जिनमे हत्या, बलात्कार, डकैती तथा तस्करी आदि। यह संभव तो हो ही नहीं सकता कि पूरा विश्व अपराध मुक्त हो-हालांकि यह प्रयास हो सकता है कि उनकी संख्या कम हो। ऐसे में कई अपराध चर्चा का विषय बनते हैं और फिर लोग उनको भूल जाते है। होता है जब चर्चा होती है तो लोग सुनी सुनाई बातों पर निष्कर्ष निकालते हैं पर अधिकृत जांचकर्ता सबूतों के आधार पर अपना निष्कर्ष निकालते हैं।

टीवी चैनलों पर में एक 14 वर्षीय लड़की और उसके घर के नौकर की हत्या से तमाम लोगों के मस्तिष्क में हलचल बची हुई है। उसको लेकर जांचकर्ता हत्यारे को पकड़ने के लिये निरंतर प्रयास कर रहे हैं और अपने पास प्राप्त सबूतों की कडि़यां जोड़ने में लगे हुए हैं।

कहानी इस प्रकार की है कि कहीं एक डाक्टर दंपति की 14 वर्षीय बेटी पहले मृत पायी गयी। शक एक नौकर पर जताया गया। अगले दिन उसकी लाश भी छत पर मिली। अब फिर पुराने नौकरों की तरफ गया। उनमें से तीन को धरा गया तो पता चला कि उनके दो के नये मालिकों ने हत्या के समय उनकी अपने यहां उपस्थिति प्रमाणित की। तीसरा भी संदेह की परिधि के बाहर निकल गया। शुरूआत में लोगों ने भी यही समझा कि इसमें नौकरों का हाथ ही होगा।

यह हत्या शायद सब लोग कुछ दिनों में भूल जाते अगर शक की सुई मृतक लड़की के खून के रिश्तों की तरफ नहीं जाती। ऐसे कई दृश्य जो मुझे अचंभित कर देते हैं। यह तो होता है कि जिसकी इकलौती संतान इस तरह मारी जाये उसके माता पिता अपना बौद्धिक संतुलन खो बैठते हैं और उसके साथ सभी को सहानुभूति होना चाहिए।

इस मामले में कुछ लोगों को इस बात पर बहुत बड़ा विस्मय हो रहा है कि आखिर माता पिता जब अपनी तरफ कोई उंगली उठ रही है तो उस पर आक्रामक होकर प्रतिवाद के लिए क्यों नहीं उतरते।

एक पत्रकार ने उसके पिता से पूछा-‘आप बता सकते हैं यह कैसे हुआ?’
उसने चलते चलते ही जवाब दिया-‘मुझे नहीं पता। पता होता तो बताता।’
वह पिता जिसने अपनी इकलौती संतान खोई है उसकी मनस्थिति समझी जा सकती है पर इस सवाल पर उसे उग्र होकर सामने मूंह करते हुए पत्रकार को कहना चाहिए था‘मैं स्वयं ही जानना चाहता हूं। आखिर मै भी अपनी बेटी के कातिल को सजा दिलाना चाहता हूं।’ या उसे अपने गुस्से का भाव कहीं न कहीं व्यक्त करना चाहिए। साथ में यह भी एक सच्चाई है कि दुःख अगर अंदर तक हो तो आदमी बाहर एक शब्द भी नहीं कर पाता। कुल मिलाकर किसी तर्क पर हमेशा टिका नहीं जा सकता है।

नौकरानी ने बताया कि ‘मैं जब आई तो मालकिन रो रही थी’। मालकिन कहती है कि उसने ही लड़की के कमरे का दरवाजा खोला और उसे मृत देखा। बेटी की मौत पर मां को रोना आयेगा पर उसे चीख-चीख कर आसमान सिर पर उठा लेना चाहिए था। इस कदर कि पूरा मोहल्ला थर्रा जाता। हालांकि वाकई जिसके कलेजे के टुकडे+ की हत्या हो जाये और वह रो भी न सके ऐसा भी हो सकता है। हो सकता है कि वह अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पा रहे हों। कुछ दुर्घटनाओं की पीड़ा बाद में होती है।
जिन माता पिता को अपनी बेटी की मौत पर आसमान उठाना चाहिए उनको ही अब तमाम ऐसे प्रश्नों का जवाब देना पड़ रहा है जो संदिग्धों को देना चाहिए। टीवी चैनलों की रिपोर्ट देखकर हैरानी हो रही है। इस दुनियां में कुछ भी संभव है। अपनी बेटी की मौत पर माता पिता को चीखना चाहिए पर कभी कभी दुःख इतना होता है कि सिसकना भी नहीं हो पाता। 14 वर्ष की उस मासूम मौत ने देश के लोगों का हृदय का विदीर्ण कर दिया तो उसके माता पिता का क्या हाल होगा? यह वही बता सकते हैं जो इसकी पीड़ा भोग चुके होते हैं।

संशय के दायरे में कई लोग हैं और जांचकर्ता उस लड़की के मित्रों से लेकर रिश्तेदारों तक अपनी पैनी नजरें गढ़ाये हुए हैं। वह दबे स्वर में इस तरह बात करते हैं जैसे कि वह परिवार के सदस्यों को भी इसके दायरे में रखे हुए हैं।
कहते हैं सब मर्जों की एक दवा है खामोशी। यह खामोशी कभी दुश्मन बन जाती है जब कोई आदमी अपना दर्द बयान नहीं कर पाता तब लोग उसे ही अपने परेशानी के लिए कसूरवार मानने लगते हैं। हो सकता है उस लड़की के माता पिता सदमे में हों और बाहर चल रही गतिविधियों और चर्चाओं पर उनका ध्यान नहीं जाता हो इसलिये ऐसी खामोशी धारण कर रखी हो कि पीड़ा कम हो जाये तो बोलें।

इस मामले में मीडिया अपनी तरह से आक्रामक होकर विचार व्यक्त कर रहा है। अधिकृत जांचकर्ता बिना प्रमाण के किसी को हत्या के लिये उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते पर मीडिया अपनी तरफ से विवेचना कर रहा है। आखिर सत्य क्या है? जांचकर्ताओं के अनुसार अभी इसमें समय लगेगा। मीडिया का मानना है कि सब कुछ साफ है, वह तुरंत परिणाम चाहता है। उसे लगता है कि असली कातिल वही है जिसे वह कह रहा है।
यह विश्व चालाकियों से भरा है और हो सकता है कि किसी ने चालाकी से यह कत्ल किया हो ताकि उसके परिवार के लोग ही संशय के दायरे में फंसे। मतलब साफ है कि इस काम को जितने अच्छे ढंग से पेशेवर जांचकर्ता कर सकते हैं उतना और कोई नहीं। जब कहीं वारदात होती है तो वहां मौजूद हर व्यक्ति पर जांचकर्ता शक की दृष्टि डालते हैं। वह संशय को सबूत नहीं बनाते बल्कि संशय के आधार पर सबूत जुंटाते हैं। अपराध विज्ञान के अनुसार कई बार वारदात इस तरह की जाती है कि दूसरा आदमी उसमें फंस जाये। एक बात तय है कि मीडिया के लोग कैमरा लेकर यह समझ लेते हैं कि उनको सभी विषयों में पारंगत होने को प्रमाण मिल गया तो गलत है। हालांकि उनको रिपोर्टिंग करना चाहिए पर निर्णय का अधिकर उसे अपने दर्शकों पर छोड़ना चाहिए। इतने सारे जांचकर्ता लगे हुए हैं तो आखिर कोई न कोई चीज ऐसी है जो उनके समझ में नहीं आ रही है। यह एक रहस्यमय हत्या है और जिस चालाकी से की गयी है उससे लगता है कि कुछ समय भी लग सकता है। अंततः अधिकृत जांचकर्ता किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे ही क्योंकि उनको सबूत जुटाकर अदालत में भी जाना पड़ता है। बहरहाल यह एक ऐसी हृदयविदारक घटना है जिसकी जांच के निष्कर्षों पर अनेक लोगों की निगाहे लगीं हुईं है।

मैं किसी घटना में किसी का नाम नही लिखता तो केवल इसलिये कि घटनाऐं तो कहीं भी हो सकती है बस पात्र बदल जाते हैं। बहरहाल ऐसी घटनाएं दिल को हिला देतीं हैं। पाठकों और ब्लाग लेखक मित्रों से आग्रह है कि यहां अपनी बात रखते समय किसी के नाम या शहर का उल्लेख न करें। हम लोग तो वही देख रहे हैं जो दिखाया जा रहा है और उस पर अपने विवेक से भी विचार करना चाहिए।

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टिप्पणियाँ

  • mehhekk  On जून 6, 2008 at 02:39

    nothing was more important that lil girls precious life,thats what i feel,ofcourse her killer must get his punishment,but jab jaan hi nahi to ye hangama kyun,all media just wanna increase their TRP thats all.poor lill soul.

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