अपनी मूल भाषा में लिखने से पाठ में आती है स्वाभाविक मौलिकता-आलेख


मेरे विचार से अब हमें यह तय करना चाहिए कि हम अपनी भाषा के साथ अपना मौलिक जीवन जीना चाहते है या अंग्रेजी के साथ बनावटी रूप रखकर अपने आपको धोखा देना चाहते हैं। मैं हिंदी में कई बरसों से लिखता आया हूं । बीच बीच में मेरे मस्तिष्क में यह विचार आता था कि अंग्रेजी में लिखूं। मैंने शैक्षणिक जीवन मेंे तीन माह तक अंग्रेजी की शिक्षा निजी रूप से एक शिक्षक से प्राप्त की थी। इस कारण अंग्रेजी के व्याकरण का ज्ञान है इसलिये अगर कठिन शब्द न हों तो मैं अंग्रेजी भी पढ़ लेता हूं। सीखने के बाद ऐसे हालात नहीं मिले कि मैं अंग्रेजी का अभ्यास करता और फिर हिंदी में ही पढ़ने को बहुत था तो अंग्रेजी के अभ्यास के लिये उससे परे रहने का विचार तक नहीं किया। हां, अंग्रेजी के कई मशहूर उपन्यास हिंदी में अनुवाद होकर छपते थे तो उनको पढ़ लेता था। हिंदी के साथ अंग्रेजी टाइप का ज्ञान मेरे काम आया और मुझे एक अखबार में तब फोटो कंपोजिंग के रूप में कार्य करने का अवसर मिला।
जी हां, जो कंप्यूटर घर घर में पहुंच रहा है उसे मैंने आत्म निर्भरता के लिये उठाये कदम के रूप में 1982 में कार्य किया था। उस समय विंडो नहीं था। अगर इस पाठ को पढ़ने वाला कोई व्यक्ति इससे पुराना इस पर काम करने वाला हो तो इस पाठ पर टिप्पणी जरूर लिखे।

उस समय अक्सर लोग कहते थे कि सारा तकनीकी ज्ञान अंग्रेजी में है इसलिये उसका ज्ञान जरूरी है। उस समय जब कंप्यूटर की किताब हमें पढ़ने के लिऐ दी गयी वह मेरी समझ में नहीं आयी फिर भी मैं कंप्यूटर सीखा। उस समय मैं कंप्यूटर पर काम करने वाली लड़कियो या लड़कों के पास बैठा रहता। मेरे साथ तीन अन्य लोग भी थे और वह भी वहां ऐसे ही प्रशिक्षण ले रहे थे। मैं उनको की बोर्ड पर अक्षरों के अलावा अन्य बटन दबाकर देखता था कि वह उसका क्या उपयोग कर रहे हैं। अक्षरों के साइज, बनावट और अन्य विशेष काम एफ-1 से एफ-300 तक होता था। मतलब सारा काम कीबोर्ड से होता था। हम चारों दूसरों का कम देख नोट बनाते और फिर रात को कमरे पर उसे आपस में बांटते। मात्र एक माह में हम वहां कार्य करने योग्य हो गये थे। मतलब किसी ज्ञान के लिये भाषा नहीं बल्कि आदमी में लगन होना बहुत आवश्यक है।

उसके बाद जब दोबारा कंप्यूटर पर आया तो हिंदी में एक किताब खरीद लाया। मतलब आज तक मुझे अंग्रेजी का पूरा ज्ञान न होने के बावजूद कंप्यूटर पर काम करते देख कोई भी कह सकता है कि अंग्रेजी का महत्व है पर उतना नहीं कि आप आदमी उसके बिना विकास न कर सके। मुझे याद है जब मैं हिंदी टाईप सीख रहा था तब लोग मुझ पर हंसते थे कि देखो सारी दुनियां अंग्रेजी की तरफ जा रही है और यह हिंदी की तरफ जा रहा है। मैंने पहले हिंदी में टाईप मध्यप्रदेश बोर्ड से पास की और फिर अंग्रेजी टाईप सीखी। बेरोजगारी के दिनों में मुझे यह लगता था कि इसका ज्ञान भी होना चाहिए। हालांकि उसमें अधिक प्रवीणता कभी नहीं रही पर कई बार उसकी अभ्यास कर लेता। जब मैंने अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तो मुझे आज भी वह दिन याद आते हैं जब मैंने अपने आपको उन दिनों हिंदी और अंग्रेजी को लेकर अपने को मानसिक अंतद्वंद्व में अनुभव किया था। उस समय कई बार लगता था कि बेकार ही हिंदी में उपन्यास आदि पढ़ने में नष्ट किया इससे अंग्रेजी ही पढ़ लेता। समय के साथ धीरे-धीरे यह भी लगने लगा कि मुख्य बात है अपनी लगन और परिश्रम। हिंदी में लिखने पर जब लोगों से प्रशंसा मिलने लगी तो भी मुझे यही लगता था कि भला इससे क्या होने वाला है?

मैं पिछले दो वर्ष से अंतर्जाल पर लिख रहा हूं। ब्लाग बनाने में मुझे परेशानी आयी पर इसका कारण अंग्रेजी के अज्ञान का अभाव नहीं बल्कि उतावलापन था। जब मैं ब्लाग बना रहा था तब भी यह आत्मविश्वास था कि जब मैं इस पर लिखना शूरू करूंगा तो अपने लिये मित्रों और पाठकों की संख्या बहुत अंिधक संख्या में जुटा लूंगा। जिस दिन गूगल पर हिंदी में शीर्षक के रूप में टंकित शब्द मुझे हिंदी में कुछ दूसरा नजर आया और फिर उसके हिंदी टूल पर पहला अक्षर टाईप किया तो मैंने अनुभव किया कि हिंदी पूरे विश्व पर भी छा सकती है। आज रोमन से हिंदी में शब्द कर रहा है कल हिंदी को भी अंग्रेजी अनुवाद करने वाला टूल भी आ सकता है। तब हो सकता है कि मेरा हिंदी में लिखा अंग्रेजी में पढ़ा भी जा सके।

उस समय यह केवल एक विचार था पर आज उसे इतनी जल्दी साकार होते देख मुझे आश्चर्य होता है। एक लेखक के रूप में मेरी सफलता या असफलता का मूल्यांकन करने का कोई आधार मेरे पास नहीं है पर इतना तय है कि मुझे अपने हिंदी लेखक होने को लेकर कोई ग्लानि नहीं है। मेरे सारी अंतर्जाल पर हिंदी को लेकर लगाये अनुमार एक के बाद एक साकार होते गये। मेरे से पुराने ब्लाग लेखक यह बता सकते हैं कि मेरा कृतिदेव या देव में लिखे गये हिंदी लेख उनको समझ में न आने पर मुझे किस तरह रोमन लिपि में यूनिकोड टूल से हिंदी लिखने का प्रेरित किया। इन्हीं ब्लाग लेखक मित्रों से ही फिर वापस अपने रास्ते पर आ गया।

अगर मेरे ब्लाग की कुल पोस्टें देखें तो अभी भी नब्बे प्रतिशत के आसपास रोमन लिपि से टूल के द्वारा हिंदी में परिवर्तित हैं। अभी शायद एक या डेढ़ महीने से ही देव और कृतिदेव का उपयोग कर रहा हूं। यह कथा तो मैं कई बार लिख चुका हूं पर अपनी यह बात बताने के लिये लोगो को यह समझाना जरूरी है कि दोनों के बीच में अंतर क्या है?
सीधे यूनिकोड में लिखने वाले लेखक मेरे बात को अन्यथा न लें और अगर उनको हिंदी टाईप नहीं आती तो वह रास्त भी न बदलें पर यह वास्तविकता है कि कृतिदेव में लिखते हुए जितनी सहयता लगती है उतनी यूनिकोड मेंे नहीं होती। भाषा का भाव से गहरा संबंध हैं। अगर मुझे क लिखना है तो मेरे दिमाग में शूरू से क होना चाहिए। यूनिकोड में पाठ लिखते हुए मस्तिष्क से निकलने वाले विचार में कहीं न कहीं अवरोध अनुभव होता है। मैंने कई बार कई सुधार इसलिये नहीं किये क्योंकि मुझे लगता कि दोबारा मेहनत हो जायेगी। कई बार विचारों का क्रम टूटकर कहीं अन्यत्र जाता दिखा। आज जब कृतिदेव से लिखता हूं तो इतना सहज होकर लिखता हूं कि लगता है कि ब्लाग पर लिखना अभी कुछ दिनों से ही शूरु किया है।

मैं यह नहीं कह रहा कि अंग्रेजी के दिन लद गये हैं बल्कि कहता हूं कि हिंदी के ऐसे दिन आ रहे है जब उसका लिखा बिना किसी मध्यस्थ के दूसरी भाषाओं को पाठकों द्वारा पढ़ा जायेगा और हिंदी का लेखक जिसे अपने ही लोग सस्ता समझते हैं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर सकता है। भाषा केवल भाव संप्रेक्षण के लिये होती है और उसका उपयोग अन्य व्यक्ति से संपर्क करने के लिए है। रोटी के लिए कोई भाषा सीखने का कोई अर्थ नहीं है रोटी अपने आप वह भाषा सिखा देती है जहां से वह आती है। ऐसे एक नहीं सैंकड़ों उदाहरण है जो इस देश से कम पढ़े लिखे लोग विदेश गये और आज फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहे हैं। देश के अंग्रेजी जानने वालों को गुस्सा आ सकता है और मैं भी अपने सौ प्रतिशत सही होने का दावा नहीं करता पर मुझे अपने देश और विदेश के अंग्रेजी लेखकों में कुछ गड़बड़ लगती है। मैंने अंग्रेजी के ब्लाग लेखकों के पाठ अनुवाद टूल से हिंदी में किये तो उनको थोड़ी कम कठिनाई से पढ़ा जबकि भारत के अंग्रेजी ब्लाग लेखकों को पाठ पढ़ने और समझने में उससे कहीं अधिक कठिनाई आती है। इसका मतलब यह है कि कहीं न कहीं भारत के अंग्रेजी लेखकों की भाषा में अस्वाभाविकता है।
यह जरूरी नहीं कि सब मेरी बात मानें पर अब अंग्रेजी कोई रोटी दिलाने की गारंटी नहीं देती। अंग्रेजी ब्लाग किस हालत में यह तो उसके ब्लाग लेखक मेरे ब्लाग पर टिप्पणी बता गये हैं। हां, हो सकता है कि हिंदी से रोजी रोटी कमाने की सुविधा पहले से कहीं अधिक मिल सकती है। आजकल हिंदी शुद्ध लिखने और टाईप करने वालों की कमी है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रोजी रोटी कमाने की अनिवार्यता भी समाप्त हो रही है। दूरियां कम हो रहीं है ऐसे में हो सकता है कि विदेशों में लोग भारत के लोगों पर इस बात पर हंसें कि उनकी अंग्रेजी शुद्ध नहीं है। वैसे मैने अपने कुछ पाठ-जिनको सभी शब्द अंग्रेजी टूल से सही कर प्रस्तुत किया था-अंग्रेजी के जानकार मित्र को पढ़ाये उसने कहा कि‘ हां, इसे वैसे ही समझा जा सकता है जैसे तुम चाहते हो।’

मतलब यह कि मेरा हिंदी में लिखा अंग्रेजी का कोई पाठक पढ़ सकता है जबकि मैं अंग्रेजी में लिख नहीं पाता। भाषा की दीवारों के ढहने के साथ ही लोगों का यह बात समझ लेना चाहिए कि वह अपने पहले नयी पीढ़ी को अपनी भाषा में पारंगत करने पर जोर दें। वैसे अंग्रेजी तो सभी को सीखना चाहिए पर प्राथमिकता हिंदी और हिंदी टाईप को दें। मेरे विचार से अब लोगों के हिंदी टाईप भी सीखने पर जोर देना चाहिए। भाषा संप्रेषण का प्रभाव तभी संभव है जब अपनी मूल भाषा में व्यक्त करें। टंकण में हिंदी टाईप हो तो पाठ में स्वाभाविकता आयेगी। कितना भी दक्ष क्यों न हो क की बजाय के कल कल्पना से टंकित करना शूरू करेगा तो उसके विचार प्रवाह में व्यवधार आएगा ही। इतना ही अपनी भाषा के बिना विचारों में मौलिकता भी नहीं आतीं जिसकी आने वाले समय में सर्वाधिक महत्व रहने वाला है। इस विषय पर अपना शेष विचार फिर कभी।

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