प्यार और नफरत, दोनों पर यकीन नहीं-हिन्दी शायरी


आज एक फोरम पर घूमते घामते अपने मित्र समीरलाल ‘उड़न तश्तरी” के ब्लाग पर पहुंच गया। उनका ब्लाग मेरे ब्लाग पर लिंक है पर मैं उनको इन्हीं फोरमों पर पढ़ता हूं। आज कुछ मायूस लगे। हां, कल मैं कुछ ब्लाग देखकर सोच रहा था कि अगर वह उनके दृष्टि में आये तो उनको बहुत कष्ट होगा। यह अच्छा ही हुआ कि मेरे एक पाठ उनकी दृष्टि पथ में नहीं आया जो इन्हीं विषयों पर था। कल फोरमों पर उस पर एक व्यूज भी नहीं था। मैने उस शीर्षक लगाते हुए ब्लाग का उल्लेख नहीं किया क्योंकि मैंने देखा है कि आम पाठक ब्लाग शब्द देखकर ही मेरी पोस्ट से मूंह फेर लेते है। वैसे भी ब्लाग लेखकों को उसमें अधिक मजा नहीं आता। समीरलाल को जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार ऐसे विवाद उनको तकलीफ देते हैं। मगर इसका कोई उपाय नहीं है। समीरलाल जी मित्र हैं और उनके शब्दों से मेरे पर प्रभाव हो यह संभव नहीं है। ऐसे में मेरा कवि मन कुछ चिंतन करने लगा। जैसा मन में आया अपनी टिप्पणी लिख दी और अपनी पोस्ट बना ली। दुःखी मैं भी होता हूं पर अपने को संभाल भी लेता हूं। मुझे नहीं लगता कि इसके अलावा किसी के पास कोई रास्ता है। पहली कविता के बाद दूसरी कविता भी इसलिये लिखी ताकि लोग यह न कहें कि ‘अपनी मेहनत बचाता है टिप्पणी को ही पोस्ट बनाता है, दूसरों के दर्द को अपनी दवा बनाता है।’

जिन रास्तो पर बस्ती है नफरत
वहां से कभी गुजरना नहीं
पर जरूरी हो तो नजरें
फेर कर निकल जाना
कानों से किसी की बात सुनना नहीं
चीखते लोगों के साथ जंग लड़ने के लिए
मौन से बेहतर हथियार और कोई होता नहीं
फिर भी नजर का खेल है
जहां होती है नफरत की बस्ती
वहां भी किसी शख्स में होती है शांति की हस्ती
तुम उन्हें ढूंढ सकते हो
अगर तुम्हारे दिल में है प्यार कहीं
नहीं कर सकते अपने अंदर
दर्द को झेलने का जज्बा
तो रास्ता बदल कर चले जाना
पर अगर मन में बैचेनी है तो
तो कोई भी जगह तंग लगेगी
कितनी भी रंगीन हो चादर
नींद नहीं आने पर बेरंग लगेगी
आंखें बंद कर लो
खो जाओ अपनी दुनियां में
बदलती है जो पल-पर अपना रंग
कहीं होते झगड़े, होती शांति कहीं
उस पर मत सोचो कभी
जो तुम्हारे बस में नहीं
………………………
उसने मुझसे पूछा
‘तुमने किसी से प्यार करते हो?’
मैंने कहा-‘नहीं’
उसने पूछा-‘तुम कभी किसी से नफरत करते हो ?’
मैंने कहा-‘नहीं’
उसने मुझे घूर कर देखा
तुम फरिश्ते तो दिखते नहीं
इंसान से तुम्हारा वास्ता कैसे हो सकता है
तुम कहीं शैतान तो नहीं’
मैंने कहा
‘प्यार और नफरत
दोनो में मैंने धोखा खाया है
जिनका प्यार दिया
उनसे पाई नफरत और
जिनको दी नफरत उनसे प्यार पाया
यकीन अब किसी पर इसलिए रहा नहीं
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