इसलिए आज हमने कोई व्यंग्य नहीं लिखा


कृतिदेव को यूनिकोड के बदलने वाला टूल आने पर मैंने सोचा था कि प्रतिदिन व्यंग्य लिखा करूंगा। जब यूनिकोड में लिखता था तो मुझे कुछ नहीं सूझता था और व्यंग्य कविता लिख कर काम चलाता था उससे जो नाम कमाया आज तक मेरे साथ चल रहा है। तब मन ही मन गुंस्सा भी होता था कि यार यह कहां फंस गये। लिखने का कुछ सोचते मगर लिख कुछ और जाते। अब तो कृतिदेव सीधे लिखने की सुविधा है तो लगता है कि बकवास अधिक लिख रहे हैं, व्यंग्य वगैरह तो गया तेल लेने। पहले फ्लाप थे और कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला टूल आया तो सोचा कि अब तो हिट होकर ही दम लेंगे। मगर आत्ममुग्धता की स्थिति बहुत खराब होती है और भले ही सबको सलाह खूब देते हैं पर स्वयं उसका शिकार जरूर होते है। यह तो गनीमत है कि यूनिकोड मेंं मजबूर होकर लिखने की वजह से कुछ ऐसे पाठ लिख गये जो आज तक हमारा नाम चला रहे हैं।

आज हमने सोचा चलो पाठ लिखने को विराम देते है। कुछ आत्ममंथन करें। दूसरों के ब्लाग देखें और फिर शुरू करें। फोरम पर चलते हुऐ हम आशीष कुमार अंशु के ब्लाग पर पहुंच गये। उनके ब्लाग पर किसी टीवी चैनल की ब्रेकिंग न्यूज दिखाई जा रही थी। वह तो अपनी पोस्ट डाल कर बैठ गये और हम पढ़ते हुए चिंतन में आ गये। भई याह क्या है? कमिश्नर का कुत्ता मिला! वह कुता जो लापता हो गया था! हमने उल्टा पुल्टा विचार किया और सोचते रहे आखिर यह क्या हो रहा है? आखिर पोस्ट डालकर वह कहना क्या चाहते है? कुछ लिखा ही नहीं। मगर क्या लिखते ‘अंशु जी’। जब ऐसे व्यंग्य चित्रों के रूप में हास्य व्यंग्य के जीवंत दृश्य प्रकट होते हैं तो भला कौन अपने शब्द लिखकर हिट हो सकता है। बना बनाया हुआ व्यंग्य सामने आ जाये तो लिखा हुए व्यंग्य कौन पढ़ना चाहेगा?

हमारे व्यंग्यकार मित्र श्री शिवकुमार मिश्र ढेर सारे शब्द लिखकर कर व्यंग्य लिखते हैं। उनको देखकर ही मैं सोचता हूं कि अगर व्यंग्य लिखूं तो उन जैसा नहीं तो लिखना बेकार है-ऐसे ही अपनी छवि बनी हुई। अगर हम व्यंग्य लिखें तो उनसे लोग तुलना करेंगे और हम क्या उनका मुकाबला करेंगे। मगर आज पोस्ट देखकर मैं सोच रहा ं कि व्यंग्य लिखकर तो मैं तो क्या मेरे फरिश्ते भी हिट नहीं हो सकते। एक तो श्री शिवकुमार मिश्र की चुनौती का सामना करने में मैं संक्षम नहीं फिर अगर यह टीवी चैनल वाले ऐसी खबरें देते रहे और आशीष कुमार ‘अंशु’ जैसे लोग उनको लाकर यहां ब्लाग रखते रहे तो भला हम कहां लिख पायेंगे। इससे तो अच्छा है चिंतन लिखकर अपना रुतवा झाड़ते रहें। लोग सोचें कि कोई बड़ा भारी विद्वान है जिसका ब्लाग पढ़ रहे हैं।
कुछ दिनों बाद टीवी पर चैनलों पर ऐसी ही खबरे आयेंगीं कि अमुक हीरो का कुत्ता खो गया। चारों तरफ रेड अलर्ट घोषित किया गया है। तलाशा जारी है। कभी ऐसी खबरें आयेंगी कि अमुक हीरोइन की बिल्ली बीमार है उसके लिये पूरे देश में प्रार्थना की जा रही है। एक फिल्मी हस्ती के घर के बाहर एक चूहे को दौरा करते देखा गया। एक हीरो ने अपनी बिल्ली का आज नामकरण किया और जोरदार पार्टी रखी। आईये हम आपको सीधे वहां ले चलते हैं। वगैरह… वगैरह……..
लोग हंसते हुए कभी कभी रोने भी लगेंगे। हंसेगा कौन मैं, उड़न तश्तरी और श्री शिवकुमार मिश्र और अन्य व्यंग्यकार ब्लाग लेखक। रोएगा कौन? ताकतवर हस्तियों को देखकर उनमें अपने जजबात जोड़ने वालों की संख्या का अनुमान मेरे पास नहीं।

अभी हमारे हिंदी ब्लाग जगत के सबसे लोकप्रिय ब्लाग लेखक उड़न तश्तरी के समर्थकों ने एक सुपर स्टार का ब्लाग नहीं देखा। नहीं तो उनमें से कई उनसे मूंह फेर लेते और कहते कि अब यह ब्लाग जगत के सुपर स्टार नहीं है। उस सुपर स्टार के ब्लाग पर 294 टिप्पणियां तों मैंने देखी थी। उस समय मैं सोच रहा था कि हमारे हिंदी ब्लाग जगत में शायद अभी तो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता जो अपने ब्लाग लेखक मित्रों के अलावा कहीं से इतनी टिप्पणियां जुटा सके। मेरा दावा कि कई लोगों ने उस ब्लाग को पढ़ा ही नहीं होगा क्योंकि वह अंग्रेजी में था दूसरा उसका विवरण पहले ही अखबारों में छप चुका थां। आखिर मुझे उस समय उड़न तश्तरी जी की याद क्यों आयी? मैं उस अंग्रेजी में लिखने वाले सुपर स्टार के मुकाबले अपने ही मित्र और हिंदी भाषा के सेवक समीरलाल उड़न तश्तरी को कमतर क्यों बता रहा हूं? इसलिये कि उस ब्लाग को मैं हिंदी-अंग्रेजी टूल से पढ़ रहा था तो मेरे लिए तो हिंदी में ही हुआ न!सच तो यह है कि लोग आकर्षण का जबरदस्त शिकार हैं और वह ऐसे आनंद में खोना चाहते हैं जिसमें उनकी बुद्धि का व्यय न हो। यह मान लिया गया है कि कला और साहित्य में सृजन भी केवल प्रसिद्ध और शक्तिशाली लोगों से ही चमकता है। पढ़ना समझ में आये या नहीं पर पढ़ने का गौरव हर कोई चाहता है और इसलिय जरूरी है कि कोई बड़ा नाम लिखने वाले से जोड़ा जाये।

आम लोग शायद इसी तरह के खबरें पसंद करते हैं जिसमें कोई बड़ी हस्ती का नाम जुड़ा हो-मीडिया जगत में यही एक विचार है। विद्वान कहते है कि निजी क्षेत्र मांग और पूर्ति के आधार पर कार्य करता है। मुझे लगता है कि कई बार यह सिद्धांत नहीं करता बल्कि अपनी पूर्ति के लिये मांग बनाता है। अब कई ऐसे तत्व हैं जो हमारी नजर में नहीं आते। समाचार चैनलों पर समाचार तो हैं ही नहीं। मैं घर में सवा (सात, आठ और कभी कभी नौं) के टाईम पर आता हूं। दस पंद्रह मिनट शवासन और ध्यान कर जब टीवी खोलता हूं तो जबरन क्रिकेट की खबरें मेरे सामने होतीं हैं। मुझे नहीं लगता कि क्रिकेट प्रेमियों का टीवी की खबरों में रुचि होती है। हां हम भी तब ही देखते हैं जब अपना देश जीत जाता है। यहां कोई भी टीम इतनी लोकप्रिय नहीं है जिसके लिये इतना समय बर्बाद किया जाये। मगर निजी टीवी चैनल जबरन खबरें थोपे जा रहे हैं। सरकारी दूरदर्शन आज भी समाचारों की दृष्टि से सवौपरि है-हो सकता है मेरी यह बात कुछ लोगों का बुरी लगे पर जब खबरें देखनी हैं तो वही देखने में मजा आता है। मनोरंजक चैनल हों या समाचार चैनल लोगों को मूर्ख मानकर अपने कार्यक्रम पेश किये जा रहे है। 14 वर्ष की एक लड़की की हत्या और उसके आरोप में उसके पिता की गिरफ्तारी के मामले में इस मीडिया का रवैया संवेदनहीन रहा है। जिस तरह खबर को एक फिल्म की तरह प्रस्तुत किया गया उसके आगे तो कई कहानियां भी फ्लाप है और अगर ऐसे ही खबरे आईं तो फिल्म वालों की भी स्थिति खराब हो जायेंगी।

बहरहाल जब मैंने यह ब्लाग देखा तो तय किया कि आज तो कोई व्यंग्य नहीं लिखेंगे। इससे अधिक हिट तो मिल ही नहीं सकते। हां, अगर यह पाठ पढ़कर हमारे मित्र श्री शिवकुमार मिश्र वहां यह ब्लाग न पढ़ने न चले जायें हो सकता है कि वह भी कहीं ऐसा निर्णय न ले बैठें। तब हम कहां जायेंगे। ऐसी खबरों पर हंस सकते हैं पर अधिक देर तक नहीं और हमें मजबूर होकर उनका ब्लाग तो पढ़ना ही है। अब कुछ दिन तक देखकर ही व्यंग्य लिखेंगे। इतनी मेहनत से व्यंग्य लिखो और फ्लाप हो जाओं तो क्या फायदा? यकीन मानिए कुछ लोग इस खबर पर यह भी कह रहे होंगे कि ‘भगवान की कृपा हो तो आपका खोया कुत्ता भी वापस आ सकता है। इसलिए भगवान को भजना चाहिए।
नोट-यहां मैंने अपने कुछ मित्र ब्लाग लेखकों के नाम उनके प्रति सद्भावना के कारण लिखे है। उनको इंगित करते हुए जो मैंने शब्द लिखें हैं उसका अन्य कोई आशय नहीं है। उससे पाठकों को यह समझाना है कि उनकी बौद्धिक चेतना का हरण किया जाकर उन्हें मूर्ख बनाया जा रहा है।

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