भीड़ से अलग पहचान के लिए अकेले हो जाते- व्यंग्य कविता



अपनी अलग पहचान के लिये
भीड़ से अलग होना ही पड़ता है
जब चुनते हैं अपनी अलग राह
छोड़नी पड़ती है साथी की चाह
तब हो जाते हैं अकेले
यहां हर कोई यहां ढूंढ रहा है अपनी पहचान
कोई न एक न बने सरताज
इसलिए हर कोई एक दूसरे से लड़ता है

भीड़ मे बाहर से सभी एक लगते हैं
अंदर से सभी एक दूसरे से जलते हैं
बन जाती है भीड भी कभी भेड़ों का समूह
किसी का इशारा मिलता है कहीं
ताज मिलने का
वहीं पूरा समूह भ्रम में उमड़ता है
जो होता हैं भीड़ से अलग
उससे मूंह फेरते लगते हैं लोग
नाम से अनजान होते दिखते
पर फिर भी उस अकेले के शिखर छू लेने का
खौफ उनके दिमाग में घुमड़ता है
…………………………………

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टिप्पणियाँ

  • mehhekk  On जून 6, 2008 at 02:32

    bilkul sahi baat,apna astitva khojne bhid se alag akele ho jate hai,phir vahi akelapan khane ko daudta hai,bahut achhi rachana

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