आवश्यकता ही अपमान की जननी हैःहास्य व्यंग्य


पैट्रोल के भाव आज बढ़ेंगे यह मुझे एक जगह टीवी पर समाचार देखने के बाद पता चल गया था। इसके बावजूद हमने उस पर ध्यान नहीं दिया। अचानक चलते-चलते रास्ते में स्कूटर रिजर्व में आ गया। हमने अपनी आदत के अनुसार पैट्रोल पंप का रुख किया तो देखा वहां भारी भीड़ है। दूसरे पर गये तो वहां भी भीड़ देखकर हमने तय कि किया अपने घर के पास वाले पैट्रोल पंप से भरवायेंगे क्योंकि वह शहर से दूर होने की वजह से वहां भीड़ कम होने की संभावना थी।
मैं अपना स्कूटर लेकर वहां पहुंचा और वहां खड़े लड़के से कहा-‘सौ रुपये का पैट्रोल डाल दो।

उसने रूखे स्वर में कहा-‘‘साहब, पैट्रोल सौ का नहीं मिलेगा। केवल पचास का मिलेगा। हमारे सेठजी का हुक्म है।’
मैं दंग रह गया। उसके उत्तर ने मुझे गुस्सा दिलवा दिया। उसने मेरे सामने ही कई लोगों का एसा जवाब दिया। मुझे ध्यान आया कि यह आज मूल्य बढ़ने की खबर का परिणाम है।
बहरहाल मैंने वहां से पचास रुपये का पेट्रोल भरवाने के बाद उससे कहा-‘यह तो मूल्य बढ़ने की संभावना की वजह से ऐसा कर रहे हो।’
उसने कहा-‘हम तो फिर भी भर रहे हैं। अन्य पैट्रोल पंप वाले तो भर भी नहीं रहे।’
मैंने उससे कहा-‘तुमसे किसने कह दिया कि नहीं भर रहे। मैं अभी तीन पैट्रोल पंपों से हो होकर आया हूं। वहां भीड़ थी इसलिये नहीं रुका। तुम ऐसे लोगों का बहलाओ नहीं।’
हमारे देश के व्यापारिक दर्शन के अनुसार ग्राहक देवता का रूप होता है। यह दर्शन तब तक ही ठीक है जब तक ऊपर वाले देवता की नजरें इनायत नहीं हों। अगर ऊपर वाले देवता खुश हों तो फिर इंसान रूपी देवता को मानने की क्या जरूरत है। पैट्रोल पंप का मालिक आजकल कोई बन सकता है तो वह ऊपर वाले देवता की कृपा से ही हो सकता है। ऐसे में तो वैसे भी नीचे वाले ग्राहक देवता की कोई जरूरत नहीं रह जाती। वह तो भिखारियोें की तरह पैट्रोल भरवाने आता है-उसके पांव नहीं चल सकते। अपने आपको लाचार बना दिया है तो उसे पैट्रोल पंप पर जाना ही पड़ेगा। अरे, प्यासा ही कुऐं के पास जाता है कोई कुआं उसके पास थोड़े ही आता है।
सरकारीकरण की समाप्ति के बाद निजीकरण की वकालत बहुत लोग करते हैं पर क्या यह पूंजीवाद का दानव भी क्या इंसान को चैन से रहने देगा?

एक आदमी के रूप में अपमान के घूंट पीने का मैं इतना अभ्यस्त हो चुका हूं कि मुझे लोगों की कथित वाद और नारों पर यकीन ही नहीं रहा है। लोग कहते हैं इस देश में सरकारी नियंत्रण की वजह से अव्यवस्था है पर क्या निजी नियंत्रण होने पर शक्तिशाली लोग अपनी ताकत आम आदमी को क्या नहीं दिखायेंग? केवल पैट्रोल की बात नहीं है। बहुत सारे ऐसे विषय है जिसमें सरकार का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त या कम होने से परेशानी बढ़ती जा रही है। मैं पिछले पांच सालों में बसों में सफर करते हुए जो झेल रहा हूं उससे तो यह लगता है कि निजीकरण भी उतना ही भ्रम होता जा रहा है। बसों में कहीं सरकारी बसें हैं तो कहीं प्राइवेट, कहीं ड्रायवर सरकारी है तो कंडक्टर प्राइवेट-पर सभी जगह निजी हाथों का हस्तक्षेप देखा जा सकता है। बसों में यात्री ठूंसकर भरे जाते हैं, उनके साथ व्यवहार खराब किया जाता है। पिछली बार जब वृंदावन से वापस अपने घर लौट रहा था तब जो मेरी हालत हुई थी उसे भूला नहीं। कहीं बस सरकारी, ड्राइवर सरकारी पर कंडक्टर प्राइवेट होता है और दस तरह झगड़े होते हैं जैसे गली मोहल्लों में होते हैं। यात्री घूप में परेशान हो रहे हैं पर उनको एक इंसान नहीं बल्कि बकरी या भेड़ समझकर उपेक्षा कर दी जाती है। पहले सरकार बसों में पैसे जरूर अधिक लगते थे पर आराम से आदमी सफर कर सकता था जो अब नहीं। जब तक सरकारी बसें थीं मैं प्राइवेट में जाना पसंद ही नहीं करता था पर आज कोई चारा नहीं है।
लोग भी हद से आगे बढ़ते जा रहे हैं। उन्हें शायद आत्मसम्मान से अधिक सुविधायें और विलसिता को शौक है। मैं आज भी मानता हूं कि अधिकतर लोग अनावश्यक रूप से पैट्रोल बर्बाद करते हैं। आंकड़ों का मायाजाल मेरे पास नहीं है पर इतना जरूर कह सकता हूं कि इस देश के लोग अगर तय कर लें कि कहीं भी बिजली, पानी, पैट्रोल या रसोई गैस का अनावश्यक व्यय नहीं करेंगे तो वह मरने के बाद स्वर्ग भोगने के लिये प्रयास करने की बजाय जीते जी स्वर्ग भोग सकते हैं।
कल एक मित्र के घर गया तो पता चला कि अब वह पानी का ड्रम खरीद कर काम चला रहे हैं। उनके इलाके में पानी अब नहीं आता। पूरी कालोनी का यही हाल है। कई कालोनियों में मकानों और फ्लेटों के भाव इसलिये कम हो गये हैं कि वहां पानी की किल्लत है। मित्र की कालोनी में मोटर सायकिलों और कारों का झुंड खड़ा था तो मैंने उससे कहा-‘अच्छी कालोनी है।’
मेरे दोस्त ने कहा-‘हां, पर पानी की परेशानी ने मन को दुःखी कर दिया है। सोच रहे हैं कि अब ऐसी जगह जाकर मकान लें जहां पानी मिलता हो। यह मकान बेचने की सोच रहे हैं, पर अब तो यहां रेट गिर गये हैं।
जल ही जीवन है-सब जानते हैं, पर जिनको मिल रहा है उनको आभास तक नहीं है इसलिये फैलाये जा रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्या है असमान वितरण और उसका हल करता कोई नजर नहीं आता। पूंजीपतियों के आगमन का स्वागत सभी कर रहे हैं पर उपभोक्ता संरक्षण के लिए कहीं कोई सोचता नहीं है। वह तो झक मारकर आयेगा। फिर वह किसी का दानदाता तो होता नहीं है। उसे तो पैट्रोल भी खरीदना है और पानी में। कहीं से लाकर पैसा देगा और जो उससे कमायेंगे वही सारा देश चला रहे हैं तो उनकी सुनी जायेगी न कि उपभोक्ता की। पूंजीपति ही पानी और पैट्रोल बेचते हैं। दस रुपये पानी की बोतल जहां बिकेगी वहां का प्याऊ सूखा ही होगा। अगर उसमें पानी भरा जायेगा तो फिर बोलत कौन खरीदेगा। अधिकतर पानी के प्याऊ बंद देखे जा सकते हैं। मतलब यह कि आम आदमी तो गूंगा बहरा और अंधा बनकर चलता रहेगा उसकी क्या परवाह करना। अगर आम आदमी चाहता है कि उसका सम्मान हो तो वह अपनी आवश्यकतायें कम करे क्योंकि उनकी पूर्ति के लिए वह जो व्यय करता हैं वही उस पर अन्याय करने वाले की ताकत बढ़ाता है। सच तो यह है कि कभी कभी तो यह लगता है कि आवश्यकता अविष्कार की नहीं बल्कि अपमान की जननी है।

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