अपनी गलतियों से सिखाता हुआ बीस हजार की पाठक संख्या पार कर गया यह ब्लोग


मेरे यह ब्लाग/पत्रिका भी आज बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। ऐसा करने वाला यह तीसरा ब्लाग/पत्रिका है। इस ब्लाग का नाम गंभीरता से नहीं लिखा गया। पता तो केवल प्रयोग करने के लिये डाला गया इसी कारण इतना लंबा है। इस ब्लाग से मेरी ऐसी यादें जुड़ीं हुईं है जो मेरा आत्म विश्वास बढ़ाती हैं। कभी कभी मेरे दिमाग में उग्रता का भाव आता है तो मैं इसके लिये ही लिखने लगता हूं। अंतर्जाल पर अपने लिखने के लिऐ एक लेखक जब तकनीकी ज्ञान से रहित हो तब पर किन हालतों से गुजरता है और किस तरह अपनी गलतियों से सीखता है यही संदेश यह ब्लाग मुझे देता है।

आज से सात वर्ष पूर्व मैं उच्च रक्तचाप का शिकार हुआ। तब मुझे लगा कि मैं जब भी अध्यात्म और लेखन से दूर जाता हूं मेरे अंदर अनेक शारीरिक विकार उत्पन्न होते है। ऐसे में मैंने लिखने में अपना मन लगाने के साथ ध्यान में अपना मन लगाने का विचार किया। चूंकि यह दोनों मनोवृत्तियां मेरे अंदर प्रारंभ से ही है इसलिये अनेक लोगों से व्यक्तिगत संपर्क में इस पर चर्चा होती रहती है। उन्हीं दिनों एक भक्त किस्म के व्यक्ति को मैं अपनी एक अध्यात्म संबंधी रचना दिखा रहा था तो उसने मुझसे कहा ‘तुम तो दीपक बापू हो‘। फिर वह जब भी मिलते मुझे इसी नाम से बुलाते हैं। उन्हीं दिनों मैं एक रजिस्टर खरीद लाया और उस पर ऐसे ही शीर्षक लिख दिया ‘दीपक बापू कहिन’। अकेले बैठकर उस पर चिंतन वगैरह लिखता और कभी कभी पत्रिकाओं के लिए व्यंग्य वगैरह लिखता तो वह अलग से लिखता। उस रजिस्टर पर मैंने कविताएं भीं लिखीं।

जब अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तो वह रजिस्टर मेरे पास ही था क्योंकि मैं कृतिदेव से पाठ लिखकर इस प्रकाशित करने वाला था। अक्षरग्राम से मेरा संपर्क जम नहीं रहा था। पता नहीं कैसे वर्डप्रेस पर जब दीपक बापू कहिन लिखा कर हाथ पांव मारे तो अक्षरग्राम जैसा कुछ सामने आता लगा-तब मैं नहीं जानता था कि यह एक दरवाजा है जहां से मैं दाखिल हो रहा हूं। फिर नारद से भी संपर्क नहीं जम रहा था तब चल पड़ा था अपनी अकेली राह। हां, मुझे याद है उन्मुक्त का वह संदेश ‘आपका ब्लाग तो कूड़ा दिख रहा है।’ हतप्रभ होकर मैंने दूसरा ब्लाग बनाया जिसे आज ‘शब्द पत्रिका’ फिर तीसरा ‘हिंदी पत्रिका’ के नाम से जाना जाता है। ‘हिंदी पत्रिका’ पर यूनिकोड में एक क्षणिका टाईप कर प्रकाशित की और उस पर मिली थी मुझे पहली टिप्पणी। मगर मुझे आगे लेकर निकली थी उन्मुक्त जी और सागरचंद नाहर की टिप्पणियां। मैं उन्मुक्त जी का प्रशंसक हूं। कभी भ्रमित नहीं करते और तकनीकी ब्लाग लेखकों में उनको और अनुनादजी को मैं बहुत मानता हूं। श्रीश शर्मा जी की बहुत याद आती है पर वह दिखते ही नहीं।

ब्लाग लेखकों ने प्रेरित किया और समय समय पर टूल भी बताये पर ब्लाग की तकनीकी के बारे में मुझे किसी ने कुछ नहीं सिखाया। अगर मैं सीखा तो अपनी गलतियों से। अभी दोतीन दिनों से चिट्ठाकार चर्चा में बहस इस बात पर चल रही है कि किसी के ब्लाग पर व्यस्क सामग्री की चेतावनी आ रही है। तमाम बड़े ब्लाग लेखक उसके साथ सहानुभूति जता रहे हैं पर यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि ब्लाग स्पाट की सैटिंग में उसने व्यस्क सामग्री पर ‘हां‘ पर क्लिक कर रखा है। मैंने दो दिन पहले भी बताया था और आज भी लिख रहा हूं। पहले मेरा लिखा अगर पढ़ा होता तो शायद आज उनको इतने सारे शब्द खर्च नहीं करना पड़ता। इससे एक बात तो पता लगती है कि जो तकनीकी श्रेणी का छलावा है वह भी कम नहीं है।

चिट्ठा चर्चा में श्री समीरलाल ‘उड़न तश्तरी’ ने लिखा था कि ‘दीपक बापू कहिन इस ब्लाग जगत में नया अलख जगायेगा‘। मैं आज भी सोचता हूं कि उन्होंने केवल तुक्का मारा था या पढ़कर प्रभावित हुए थे। क्योंकि मुझे लगता है कि वह अब कहीं जाकर बेहतर लिख रहे हैं। उस समय तो मुझे उनके पाठों में अधिक रुचि नहीं रहती थी। उस समय मैं उनकी परवाह भी नहीं करता था पर आज देखकर लगता है कि वह वाकई प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक हैं। उस समय उनके अधिकतर पाठ ब्लाग लेखकों को ही प्रभावित करने वाले लगते थे। अब उनके लेखक में जो गंभीरता आ रही उससे ही लगता है कि वह न केवल अच्छे लेखक भी हैं बल्कि पाठक भी हैं। वैसे अच्छे पाठक अच्छे लेखक हो यह जरूरी नहीं है पर अच्छे लेखक जरूर अच्छे पाठक होते हैं। आप देखिये तीन दिन पहले मैंने ही ब्लाग स्पाट के ब्लाग लेखक को व्यस्क सामग्री संबंधी जानकारी दी पर किसी ने नहीं पढ़ी और आज सभी लोग फिर उसी बहस में लगे रहे। यह इस बात का प्रमाण है कि लोग कम पढ़ते हैं और लिखने का प्रयास अधिक करते हैं। मैं आज यह सोचता हूं कि मैं एक ब्लाग लेखक होकर वेबसाइट धारकों सलाह लेने की गलती करता था इसी कारण हमेशा परेशान रहा-यह संदेश मुझे इसी ब्लाग पर मिलता है। इस ब्लाग को विलंब इसलिये भी लगा कि मैंने इस पर रचनाएं भी एक अंतराल के बाद ही दोबारा प्रकाशित करना शुरू कीं।

आने वाले समय में भी मैं सोच रहा हूं कि थोड़ा अधिक बेपरवाह होकर लिखा जाये। अभी कुछ बातें स्पष्ट करने में थोड़ा संकोच होता है पर अब उसे भी छोड़ना होगा। अंतर्जाल पर लटके-झटके और भ्रमजाल का विस्तार हो रहा है। फिर अब यह भी अनुभव हो रहा है कि वेबसाइट बनाने वाले ब्लाग लेखक एक तरह से अपने को अलग समझ रहे हैं। वह अपने को ऐसा ही समझ रहे हैं जैसे अधिक पैसा खर्च कर विशिष्ट कक्ष में बैठे हैं। इनमें कुछ मेरे मित्र है और वाकई भोले हैं पर कुछ चालाक हैं और उनकी मित्रता केवल दिखावा है। लिखने के मामले में अधिक प्रभाव नहीं छोड़ते भले ही टिप्पणियां उनके पास अधिक होती हैं। वेबसाइट का मालिक होने के बावजूद वह ब्लाग जगत में इसलिये सक्रिय हैं कि उनके कुछ निहितार्थ हैं। मैं मूलतः अल्हड आदमी हूं पर चालाकियां मेरे सामने छिपतीं नहीं है। बहरहाल मैं अपने पाठको, मित्रों और हितचिंतकों का आभारी हूं। यह मेरा सेनापति ब्लाग है और ब्लाग लेखकों के साथ ही अनेक वेबसाइटें इस पर मेहरबान हैं। हां, पाठकों का समर्थन अधिक नहीं मिल पा रहा है इसलिये यह विलंब से इस मुकाम पर आया। अब मेरा सोचना है कि मुझे लिखना कम कर यहां हिंदी ब्लाग जगत पर साहित्य लिखने वालों पर प्रेरणा देन का काम भी टिप्पणियां उनके ब्लाग पर रखकर करना चाहिए। यहां ऐसा लिखने वाले कई हैं पर उनको प्रेरित करने वालों में समीरलाल और दो तीन अन्य लोग ही इस बात के लिए प्रयत्नशील रहते हैं पर यह संख्या पर्याप्त नहीं है।
विभिन्न प्रमुख स्थानों से आये पाठक

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टिप्पणियाँ

  • sameerlal  On जून 6, 2008 at 07:43

    २०००० पाठकों का आंकड़ा पार करने के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाऐं.

    तुक्का नहीं मारा था, जनाब. नब्ज़ पहचान गये थे तभी. और आप अभी तक उसे याद रखे हैं, बहुत आभार.

  • ramadwivedi  On जून 7, 2008 at 05:15

    Deepak ji,

    congratulation !!

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