कुछ इधर की, कुछ उधर की-व्यंग्य आलेख


मैं जैसे ही स्कूटर से उतरा तो मेरे मित्र ने मुझे देखते ही कहा-‘पिटवा दी भद्द। टोक दिया न उडन तश्तरी ने कि आजकल तो दनादन कवितायें लिखते जा रहे हो। क्या बचा अब? मना करता हूं कि इतनी सारी कवितायें मत लिखो।’

मैं उसकी बात सुन रहा था। कल मैंने अपने ब्लाग/पत्रिका पर छहः कवितायें प्रकाशित की थीं और मेरे ब्लाग लेखक मित्र समीर लाल ‘उडन तश्तरी’ ने एक जगह सहज भाव से लिख दिया कि ‘आजकल तो दनादन कवितायें लिखी जा रही हैं। मेरा मित्र उसका ही हथियार बना मेरी मजाक बना रहा था।

मैंने भी बनते हुए गंभीरता से कहा-‘हां यार! मेरी एक कविता तैयारी पड़ी थी वह इसलिये ही मैंने पोस्ट नहीं की कि कहीं अपनी छबि खराब न हो जाये। बाकी लोग तो इतना नहीं देखते जितना समीरलाल की दृष्टिपथ में आता है। वैसे तुमने कब देखी उनकी टिप्पणी?’
वह बोला-‘कल रात ही देखी।’वह ऐसे बोल रहा था जैसे कि कोई नया राज बता रहा हो-‘ कल मेरा टीवी खराब हो गया था तो सोचा चलो तुम्हारे ब्लाग ही पढ़ डालें। हमने सारे ब्लाग देख मारे। तुमने कल छहःकवितायें लिख मारीं। यार, हमें तो किसी को यह बताते हुए भी शर्म आये कि हमारा कोई ब्लागर दोस्त छह कवितायें लिख सकता है। ऐसे ब्लागर से दोस्ती रखने पर तो हमारी दूसरी मित्र मंडलियां हमें बिरादरी से बाहर भी निकाल सकती हैं।’
मेरा एक अन्य मित्र हंसते हुंए इस संवाद को सुन रहा था वह बोला-‘‘यार, तुम कवितायें कम लिखा करो। यह हमेशा रोता रहता है कि वह लेख या व्यंग्य नहीं लिखता।’
मैंने अपने पहले मित्र से कहा-‘‘वैसे कल तुम्हारा टीवी खराब था इसलिये तुमने यह सब देखा। अगर टीवी खराब नहीं होता तो तुम क्या करते?’

वह बोला-‘वही देखते। हां, तुम्हारे इतने सारे ब्लाग एक साथ नहीं देखते और यह पता नहीं चलता कि तुमने कितनी कवितायें लिखीं हैं। हम तुम्हारे ब्लाग से यह तो पढ़ ही लेते है कि तुमने कौनसी तारीख को लिखा था। अगर पुरानी तारीख का होता है तो मैं नहीं पढ़ता। तुम यार कोई व्यंग्य, कहानी या चिंतन लिखा करो। यह कवितायें हमेंं पसंद नहीं है।’

मैंने कहा-‘पुरानी तारीखों से तुम्हारा क्या आशय है? अरे भई, मै। लिख रहा हूं डेढ़ बरस से और तुम पढ़ रहे हो तीन महीने से। पहले बहुत सारे व्यंग्य और कहानियां लिखे हुए हैं। तुम उनको पढ़ा करो। वह सम सामयिक तो हैं नहीं कि उनका प्रभाव नहीं पड़ता हो।

वह तुनक कर बोला‘-यार, हम कहीं में जाते हैं तो पुरानी पत्रिका या समाचार पत्र देख कर उसे पढ़ने का मन नहीं करता। अगर मजबूरी में कहीं पढ़ना पड़ता है तो यह बात मन में बराबर बनी रहती है कि हम पुराना पढ़ रहे है। मैं तुम्हारे ब्लाग को भी इसी तरह पढ़ता हूं फिर तुमने अपने ब्लाग पर अपने नाम के साथ पत्रिका शब्द जोड़ रखा हैं। जिस ब्लाग को मैं खोलता हूं उसमें अगर तुम्हारे लिखे पर पुरानी तारीख होती है तो तुम्हारे दूसरे ब्लाग और वहीं अन्य ब्लागर मित्रों के ब्लाग खोलकर पढ़ता हूं। उनके पढ़ने पर भी यही हाल रहता है।’
मैंने हंसकर पूछा-‘तो जो पुराना लिखा है उसका क्या करें? वैसे अंतर्जाल पर नया पुराना क्या होता है यह मेरी समझ से परे है। वहां हमारा हर पाठ स्वतंत्र ढंग से खुलता है। वह तो मेरी वजह से तुम्हें मेरे और मेरे मित्रों के ब्लाग इतनी आराम से मिल रहे हैं वरना अगर तुम स्वयं प्रयास करते तो तुम्हे सभी ब्लाग के पाठ तुम्हारें सर्च के हिसाब से मिलेंगे। वहां तुम्हारे लिये नये पुराने के नखरे नहीं चल सकते।’

अन्य मित्र ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा-‘यार, तुम इसके लिए अपने पुराने लेखों को ही दोबारा प्रकाशित कर दो । कंप्यूटर पर तुम सब करना जानते हो। कापी कर फिर पेस्ट कर दो। इसको क्या पता लगेगा कि पुराना लिखा हुआ है। वहां तो नयी तारीख आ जाती होगी।’

मेरा पहला मित्र बोला‘-हां, यह ठीक है। मुझे क्या पता लगेगा?नये पुराने का टैंशन नहीं होगा तो फिर आराम से पढ़ लूंगा।’

मैंने हंसते हुए कहा-‘क्या खाक ठीक होगा? एक बार समीरलाल ‘उडन तश्तरी’ ने ब्लाग स्पाट के ब्लाग से वर्डप्रेस पर रखी गयी ऐसी ही पोस्ट के बारे में लिखा था कि‘यह पोस्ट पढ़ी हुई लग रही है। अब किसी और ने ऐसा लिख दिया तो तुम्हीं फिर रोते फिरोगे कि ‘मेरे दोस्त की भद्द पिट गयी।’
पहला दोस्त आश्चर्य चकित होकर पूछने लगा-‘यार, तुम्हारे साथ ऐसा भी हो चुका है।’
मैंने कहा-‘मैंने कहा उड़न तश्तरी की टिप्पणियां तो बहुत सहज हैं जबकि अपने ब्लाग/पत्रिकाओं पर मुझे अब कटुतापूर्ण टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है। मैं ही नहीं स्वयं उड़न तश्तरी को भी ऐसी हालतों से गुजरता पड़ रहा है। वैसे तुम कविताओं का रोना करो बंद और अपना टीवी सुधरवा लो ताकि मैं बेफिक्री से लिख सकूं।
दूसरा दोस्त अब मेरे पक्ष में आ गया और बोला-‘वैसे टीवी देखकर दिमाग से खराब करने की बजाय तो कविता लिखना और पढ़ना ही सही है। वैसे जैसा यह लिखता है तो कवितायें भी दमदार होती होंगी।’
पहला मित्र बोला-‘बहुत दिलचस्प और दमदार! पर यह ऊपर शीर्षक पर ही कविता या शायरी मत लिखा करो। आगे पढ़ने का मन ही नहीं करता।’
आखिर मुझे कहना पड़ा-‘जिनका नहीं पढ़ना हो वह न बाध्य न हों इसलिये लिखता हूं। आखिरी बात यही है कि टीवी देखना मैंने कर दिया है बंद। इसलिये मेरे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि कवितायें लिखकर ही मन बहलाऊं। तुम जिन टीवी और अखबार वालों से हमारी तुलना कर रहे हो वह तुम्हारी परवाह भी नहीं करते। सब लोग रोते हैं कि यार कहीं कुछ ढंग का पढ़ने या देखने को नहीं मिलता।’
पहला मित्र बोला-‘हां, यह बात सही है। सच तो यह है कि तुम्हारे ब्लाग पर आने के बाद जब दूसरे ब्लाग और फोरम पर जाता हूं तो मुझे पढ़ना अच्छा लगता है। बस, हम तुम अच्छा लिखो यही चाहते हैं। जहां तक टीवी देखने का सवाल है अब वाकई बोरियत भरे कार्यक्रम आने लगे हैं। तुम्हारे ब्लाग खुलने का मतलब है कि हमारे पूरे दो घंटे अच्छा पढ़ लेते हैं।‘

मैं चलने को हुआ और उससे कहा-‘एक बात समझ लो। मैं ब्लाग या पत्रिका पर लिख रहा हूं कोई अखबार नहीं निकालता। अखबार तो दो घंटे में पुराने हो जाते हैं, पर अंतर्जाल पर ब्लाग हमेशा बने रहेंगे। वह किसी अल्मारी में बंद नहीं होंगे न कबाड़ में बिकेंगे

मुझे बाद में इस संवाद पर स्वयं हंसी आ रही थी। सबसे बड़ी बात यह है कि ब्लाग लेखक और व्यक्तिगत मित्रों के बीच खड़े एक पुल की तरह मुझे रोमांच अनुभव हो रहा था। मेरे ब्लाग लेखक मित्र हो या निजी मित्र उनकी आलोचनाओं और प्रशंसाओं से सीखता हूं। यही कारण है कि मैं नित नया लिखने के लिये प्रेरित होता हूं।

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टिप्पणियाँ

  • sameerlal  On जून 24, 2008 at 06:44

    अरे दीपक भाई, टोकना उद्देश्य नहीं था, बस यूँ ही एकाएक ढ़ेरों कविता देख मजाक कर रहा था.

    चलिए, आपके बहाने आपके मित्रों तक भी हमारा नाम पहूँचा, बहुत आभार.

    ऐसे ही स्नेह बनाये रखें.

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