अंतर्जाल पर किसी से द्वेष रखना बेकार-आलेख


मेरे एक ऐसा ब्लाग जिस पर मैं ही तीन-तीन महीने जाकर नहीं देखता कि वहां क्या हो रहा है? ऐसा ब्लाग जिस पर मेरी अभी तक 12 पोस्ट और उस पर 801 व्यूज हैं। उस पर मेरे अन्य ब्लाग लिंक हैं पर वह कहीं भी लिंक नहीं है। अगर मेरे मित्र चाहें भी तो उस पर नहीं पहुंच सकते और उन्हें वहां जाने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि उस पर कभी कभार दूसरे ब्लाग से कापी कर मै अपनी पोस्टें ऐसे ही रख देता हूं।
उस ब्लाग/पत्रिका पर वह टिप्पणीकर्ता सर्च में इंजिन में अंग्रेजी में यह Hasya shayari india, शब्द डालकर आया। उसने तीन टिप्पणियां लिखीं और जाहिर है जो तीसरी थी वह पहले रखी गयी थी और उसने शुरूआत में ही लिखा Actually , I belongs from UP. और उसके बाद वह मनु स्मृति के बारे में लिखा कि ऐसा उसमें नहीं लिखा गया। आप पता करों कौनसी मनु स्मृति से लिख रहे हो। कविता के बारे में उसने लिखा कि मैंने आपकी कविता पढ़ी एकदम बकवास है और हास्य व्यंग्य पर लिखा कि मैं आपकी कविता ही नहीं बल्कि अधिकतर कवितायें पढ़ी। लोगों को लिखना ही नहीं आता। तमाम तरह की उसने प्रतिकूल बातें लिखीं और आर्तनाद करते हुए लिखा ‘प्लीज मत लिखो‘। प्लीज शब्द एक पंक्ति में बीस बार था।

मैंने लिखना किसी के कहने से प्रारंभ नहीं किया था और किसी के कहने से बंद करने वाला नहीं हूं। मैं नकारात्मक विचार वाले लोगों के साथ अपनी संगत भी नहीं करता। अगर कोई मेरे विषय से असहमत होने वाली टिप्पणी लिखता है तो उसे रखने में मुझे एतराज भी नहीं है पर अपने प्रति अपमान करने की इजाजत किसी को नहीं देता। इसलिये उन टिप्पणियों को माडरेट नहीं किया और भी भी वह वहां वजूद बनाये हुए हैं।
किसी प्रतिकूल टिप्पणीकर्ता पर लिखने की जरूरत भी मुझे नहीं पड़ती पर उसने शुरूआत जिस ढंग से की वह मेरे लिये बहुत पहले से विचार का विषय है। उसकी पहली पंक्तियों से ही मैंने इस विषय पर विचार करना शूरू कर दिया था।
अभी दो दिन पहले ही मेरे एक पाठ पर एक वरिष्ठ ब्लागर ने अपनी टिप्पणी में लिखा था कि कुछ लोग यहां प्रांतवाद से ग्रस्त हैं। वह मेरे मित्र हैं और उनकी बात ने मुझे चिंता में डाल दिया। यह ब्लाग लेखक मध्य प्रदेश के हैं और मैं भी मध्यप्रदेश का हूं। मध्यप्रदेश के इस समय बहुत सारे ब्लाग लेखक अंतर्जाल पर अति सक्रिय हैं बल्कि उनका लिखा अत्यंत प्रभावी भी प्रमाणित हो रहा है, अगर ऐसे में उनके मन में एसी बात हैं तो सभी प्रदेशों के ब्लाग लेखकों को आत्ममंथन करना चाहिए। हो सकता है यह संदेह निरर्थक हो पर ऐसी कुछ गतिविधियां अवश्य हो रही होंगी जिससे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार या अन्य बड़े प्रदेशों और शहरों के ब्लाग लेखकों के जाने या अनजाने कृत्य से एसा झलक रहा हो। जहां तक मेरा सवाल है मैं तो लिखने में ही इस तरह मस्त रहता हूं कि मेरा इस तरफ ध्यान नहीं जाता। फिर समय भी इतना नहीं मिल पाता कि मैं इस तरफ ध्यान दे सकूं। वैसे भी मुझे तो हर प्रदेश से बराबर समर्थन मिल रहा है और फिर मेरे विषय ही ऐसे हैं कि देश के किसी प्रदेश का पाठक एक बार अगर मेरे ब्लाग को रुचि से पढ़ जाये तो मुझसे दूर रह भी नहीं सकता। यही कारण है कि इस पाठ को मैं लिख रहा हूं कि ताकि कोई जाने अनजाने अपनी गतिविधियों से ऐसे संदेह पैदा कर रहा हो तो वह अपनी तरफ ध्यान दे। इसलिये कुछ आत्ममंथन कर लिया जाये तो अच्छा रहेगा। अगर मेरी किसी गतिविधि से ऐसी आशंका हो तो बता दें फिर उसमें सुधार कर लूंगा।
बात उत्तर प्रदेश की जरूर करूंगा क्योंकि इस मामले में बहुत समय से लिखने का विचार करता रहा था। अगर मेरी आलोचना या निंदा करनी है तो उस टिप्पणीकर्ता को यह बताने की क्या आवश्यकता थी कि वह उत्तर प्रदेश से है। क्या वह बताना चाहता था कि उत्तर प्रदेश का होना ही विद्वान होने का प्रमाण है और इसी कारण वह मुझे फेल भी कर रहा है। क्या वह बताना चाहता है कि मध्यप्रदेश का होने के कारण मुझे उसके उत्तर प्रदेश होने का आभास होते ही विचलित हो जाना चाहिए।
वह कोई आम पाठक नहीं हो सकता। वह कोई ब्लाग लेखक ही है जो मुझसे बहुत चिढ़ा हुआ है। रोमन लिपि में हिंदी लिखकर वह मुझे धोखा नहीं दे सकता। वह डरपोक भी है क्योंकि मेरे उस ब्लाग से वह दूसरे ब्लाग पर भी गया था पर उसने वहां ऐसी टिप्पणी नहीं लिखी। वजह! उसे पता है कि यह ब्लाग लेखक आर्ई डी वगैरह से ढूंढ नहीं सकता पर दूसरे ब्लाग पर धुरंधर ब्लाग लेखक आते हैं जो आई डी से उसे पकड़ सकते हैं। उड़न तश्तरी ने अपने एक आलेख में ऐसे ही एक टिप्पणीकर्ता को पहचानने का दावा किया था और वह इन ब्लाग पर आते हैं। मैंने छद्म नामों के बारे में कहा भी है कि उसमें मेरे मित्र और आलोचक दोनों ही हैं। ऐसे में अधिक माथापच्ची करना मैं ठीक नहीं समझता। उसके ब्लाग लेखक होने पर संदेह इसलिये भी है कि क्योंकि आजकल अनेक ब्लाग लेखक फोरमों की बजाय सर्च इंजिनों में ही प्रयोग कर रहे हैं। संभवतः उसने मेरा वह ब्लाग ऐसे ही पकड़ा होगा।

मुख्य बात तो प्रदेश का नाम इस तरह लिखना जैसे कि उससे वह कोई ऊंचा ज्ञान रखने वाला हो अपने आप में उसकी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। मैंने यह विषय पहले इसलिये उठाया कि अंतर्जाल पर ऐसे किसी भ्रम को पालना ही निरर्थक है जिसका अस्तित्व ही नहीं है। अपने प्रारम्भिक दौर में हिंदी में उत्तर प्रदेश के लेखकों को बहुत प्रभाव रहा था। सच तो यह है कि भारत के अन्य प्रदेशों में हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षकों की बहुत बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश से ही थी। पाठय पुस्तकों में उत्तर प्रदेश के लेखकों की रचनाओं को ही स्वाभाविक रूप से अधिक स्थान मिला। हिंदी के प्रचार माध्यमों में उत्तर प्रदेश के लोग बहुतायत में रहे मगर समय के साथ अन्य प्रदेशों में अगर हिंदी का विस्तार हुआ तो वहां लेखक भी पैदा हुए। मध्य प्रदेश के हरिशंकर परसाईं और शरद जोशी का व्यंग्यकार के रूप में उल्लेखनीय योगदान है। अब हिंदी प्रचार माध्यमों में समस्त प्रदेशों के लोग सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बुद्धिजीवी भी किसी भी प्रकार का भेदभाव किये बिना अन्य प्रदेश के लोगों के साथ जुड़े हुए हैं पर एक वर्ग है जो इस सत्य को स्वीकार नहीं कर रहा कि उत्तर प्रदेश के बाहर भी बहुत अच्छे लेखक हो सकते हैं। उसे अपने प्रदेश के गौरव के साथ किसी दूसरे प्रदेश को गौरवान्वित होते नहीं देखना चाहता। यह वर्ग चाहता है कि उनके प्रदेश के लोगों द्वारा ही प्रतिपादित विषय पर ही समस्त प्रदेशों के बुद्धिजीवी चिंतन करते हुए उनका नेतृत्व स्वीकार करें।

हिंदी ब्लाग जगत में मेरे कुछ मित्र श्री शिवकुमार मिश्र, अफलातून, राजेंद्र त्यागी और रविंद्र प्रभात तथा अन्य कई ब्लाग लेखक बहुत बढि़या और प्रभावपूर्ण लिखते हैं क्योंकि वह किसी ऐसे प्रांतवाद के चक्कर में कभी फंसते नहीं दिखते। इसी तरह उनके लिखने का दृष्टिकोण व्यापक संदर्भों में होता है पर शायद कुछ ब्लाग लेखक जो प्रभावपूर्ण नहीं लिख पा रहे उनको यही एक सहारा लगता है कि कभी किसी रूप में प्रांत तो कभी शहर का नाम लेकर अपने लिए हिट जुटाये जायें। सच तो यह है कि वह इसी सोच के चलते प्रभावहीन भी होते जा रहे हैं। मैं ऐसे अनेक पाठ देख चुका हूं जो मुझे संकीर्ण आधारों पर लिखे जाने के कारण प्रभावित नहीं कर पाते।
मेरा अपने समग्र साथियों को यही संदेश है कि वह प्रांत या शहरों के दायरों में बंध कर न लिखें। यह अंतर्जाल है जहां हजारों पाठक आ रहे हैं जिनकी दिलचस्पी आपके पाठ में हैं। वह आपके प्रदेश के है केवल इसलिये आपको पसंद नहीं करेंगे बल्कि वह अपने मन के संतोष के लिये पढ़ना चाहेंगे। हो सकता है कि आप प्रांत के नाम पर अपने लिये हिंदी फोरम पर कुछ दिन अपने लिए हिट जुटा लें पर कुछ समय बाद वह भी आपसे उकताने लगेंगे। दीर्घकालीन दृष्टि से व्यापक विषयों पर बृहद शैली में लिखना ही सकारात्मक परिणाम दे सकता है। मैं तो ऐसी संभावना देख रहा हूं कि जब बेहतर लिखने पर अन्य देशों में भी अपने मित्र बना सकते हैं क्योंकि भाषा की दीवार अब धीरे धीरे गिरती नजर आ रही है।
मैंने यह बात उस टिप्पणीकर्ता की अपमानजनक टिप्पणियों से क्षुब्ध होकर नहीं लिखी बल्कि उसने अपने उत्तर प्रदेश के होने का जिस तरह प्रदर्शन किया उसने हैरान हुआ। मेरा अनुमान है कि वह कोई ब्लाग लेखक है। इसका अनुमान भी करता हूं कि वह कौन हो सकता है? वह इस लेखक को पढ़ेगा यह भी मेरा दावा है क्योंकि मैं उसके वही शब्द श्रेणी में उसी ब्लाग पर रखूंगा जहां वह आया था। वह मुझे सिखाये उससे अधिक उसे सीखने की जरूरत है। वह मेरे ऐसे ब्लाग पर क्यों आया जिसे मैं कहूं कि हल्का है? मेरे कुछ मित्रों को याद होगा जनवरी में मेरे एक हल्के ब्लाग की रेटिंग पांच रखकर मुझे अपमानित किया गया था और वही ब्लाग अब मेरा सबसे हिट ब्लाग बनने जा रहा है। यह दूसरा अवसर है जब मेरे हल्के ब्लाग को निशाना बनाया गया है-क्या छानबीन का विषय नहीं है। मैं कभी इनसे विचलित नहीं होता क्योंकि मुझे अपने ब्लाग लेखक मित्रों ने ही इतना साहसी बना दिया है कि मुझे पर ऐसी टिप्पणियों की परवाह तक नहीं होती। इन ब्लाग लेखकों में उत्तर प्रदेश के भी ब्लाग लेखक मित्र भी शामिल है। जहां तक पाठकों का सवाल है तो मुझे पता है कि अंतर्जाल पर पढ़ने वाले व्यापक दृष्टिकोण वाले ही होते हैं और उन पर रहे मेरे संभावित प्रभाव के ही भय से कुछ लोग मुझे विचलित करने का प्रयास कर रहे है। मैंने तो अपने पाठों में कई बार लिखा है कि राष्ट्र, प्रांत. शहर, जाति, धर्म, भाषा और वर्ग के नाम पर भ्रामक समूह बनाये गये हैं जिनको बनाने वाले लोग अन्य लोगों को भेड़ की तरह हांकते हैं। बाहर से ठोस दिखने वाले यह समूह वैचारिक रूप से खोखले होते हैं और इनका संचालन वाद और नारों के द्वारा किया जाता है। लेख को समाप्त करने से पहले याद आया कि मैं पिछले कुछ समय से एक ब्लाग लेखक से बहुत नाराज था कि उसने मेरी एक कविता पर बहुत बदतमीजी से टिप्पणी लिखी थी हालांकि वह बहुत विद्वान हैं और मैं कभी उन पर बरसने वाला था पर वह उस दिन मेरी एक कविता पर प्रसन्नता से इतनी जोरदार टिप्पणी रख गये कि मैं हक्का बक्का रह गया। तब मेरे मन में आया कि यहां किसी से द्वेष रखना बेकार है। इस कथित प्रांतवाद पर शेष बात फिर कभी।

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