अंतर्जाल लेखक हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों के उपयोग पर स्वविवेक से निर्णय करें-आलेख


हिंदी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द समावाष्टि करने पर अनेक लोग नुक्ताचीनी करते हैं। समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पिछले कई बरसों से मैंने इस विषय पर अनेक चर्चाएं पढ़ी हैं। उनको पढ़कर मैं यही अनुमान करता था कि लोग अपने प्रचार के लिए ऐसी बातें लिख रहे हैं जिन्हें वह अपने जीवन में शायद ही अपनाते होंगे। शुरूआती दौर में जब मैं लिखता था तो उसमें कुछ शब्द उर्दू मेंे आ जाने पर मेरे दिमाग में कुंठा आ जाती थी। अगर शुद्ध हिंदी शब्द लिखने का प्रयास करता तो लगता था कि वैचारिक प्रवाह कागज पर आने में कहीं न कहीं बाधा आ रही है। बाद में पंजाब केसरी में व्यंग्य प्रकाशित होने के बाद मैं इस दुविधा से निकल आया।

इस देश में अभी तक हिंदी पर संगठित क्षेत्र का नियंत्रण रहा है। हिंदी के लेखक और साहित्यकारों का समूह अपने अपने दृष्टिकोण के साथ अपने संगठनों में काम करता है। वाद और नारों पर चलने के आदी हो चुके इस देश के लेखक भी उसी राह पर चलते हैं। समाचार पत्र पत्रिकाओं में मैंने अनेक ऐसे लेखकों के लेख देखे जो स्वयं ही असंमजस्य में प्रतीत होते हैं। हिंदी को शुद्ध रखने के समर्थक और विरोधी केवल औपचारिक रूप से ही इन बहसों में शामिल होते रहे हैं ताकि लोग समझें कि वह विद्वान हैं। कोई नई बात कहने या संतुलित दृष्टिकोण रखने वाले लेखकों को कहीं भी स्थान नहीं मिला। इसलिये जो कथित विद्वान लेखक इन बहसों में अपना समय नष्ट करते रहे उसका परिणाम शून्य रहा।

हमारे देश में हर कार्य संगठित रूप से होता है और ऐसे में असंगठित लोग बहुत कठिनाई से अपना स्थान बनाते हैं। वाद और नारों पर चलने वाले लेखकों ने लंबे समय तक हिंदी लेखन पर अपना नियंत्रण रखा और आज अंतर्जाल पर लेखकों का जो समूह चालीस और पचास की आयु को पार कर चुका है उसका यहां खुलकर लिखना इस बात का प्रमाण है कि वह असंतुष्ट हैं। बात हम हिंदी की शुद्धता की करें तो मुझे लगता है कि वह आम आदमी के कारण ही अपना अस्तित्व बचा पायी है। वरना तो आपने देखा होगा कि हिंदी की लिपि पर ही लोग सवाल उठाते रहे हैं। इसी अंतर्जाल पर रोमन लिपि का विवाद के बारे में पुराने ब्लाग लेखक जानते है जिसमें मैंने भी अपनी हास्य कवितायें बरसाईं थी। एक आलेख में मैंने हिंदी के ऐसे शुभचिंतकों से अनेक सवाल भी पूछे थे।

शुद्ध हिंदी का समर्थक वह तबका है जो लिखता तो ऐसे शब्द हैं जिसे सामान्य आदमी आम बोलचाल में प्रयोग न होने के कारण क्लिष्ट मानता है पर वही लेखक बोलते समय उन्हीं विजातीय भाषा के शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनका वह विरोध कर चुके है। यह तबका अपने को अच्छा लेखक साबित करने के लिये ही शुद्ध और क्लिष्ट हिंदी शब्दों का प्रयोग करता है ताकि उसके पाठ या रचनाओं का वैचारिक धरातल यदि कमजोर भी तो उसे भाषा की दुरूहता का लाभ मिल जाये। लोग समझें नहीं पर यह कहें कि लेखक अच्छा है क्योंकि उसकी हिंदी अच्छी है। दूसरा यह कि कोई मौलिक लेखक जिसे भाषा का सामान्य ज्ञान हो और उसके शब्दों में कोई विशिष्टता न हो उसे चुनौती नहीं दे सके।

हिंदी भाषा में विजातीय भाषा के समर्थक केवल नारा लगाते रहे पर उनका लिखा कभी प्रभावी नहीं रहा। ऐसे में अनेक लेखक इन विचारों को पढ़कर विचलित हो जाते हैं और उनको कभी अपने अच्छा लेखक बन पाने की संभावना नहीं दिखती तो वह लिखना छोड़ देते हैं। आजकल अंतर्जाल पर जिस तरह वेबसाइट और ब्लाग लेखक बड़ी संख्या में आ रहे उन्हें ऐसी किसी बहस से परे रहकर अपने मौलिक लेखन पर ही ध्यान देना चाहिए। अपने अंदर चल रहे विचारों का वह सीधे आने दें। शब्दों के चयन पर अपना समय बर्बाद करेंगे तो उनको अपने विचार प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती नजर आयेगी और वह उस पाठ या रचना को वह स्वरूप नहीं दे पायेंेगे जो वह देना चाहते हैं। अगर उनको लगता है कि कहीं शब्द में गड़बड़ है तो वह उसे लिखने के बाद अपने संपादन कौशल का प्रयोग करते हुए सुधारें। समय मे साथ कुछ शब्द अंग्रेजी और उर्दू से हिंदी भाषा में आते गये हैं और कुछ तो ऐसे भी हैं जो भाषा को दोरंगी कर देते हैं। ऐसे में यही हो सकता है कि अगर अन्य भाषा का शब्द आवश्यक लगे तो कोष्टक में हिंदी शब्द लिखकर अपना दायित्व निर्वाह किया जा सकता है।
जैसे मैं लिखता हू कि ‘ट्रेन का टिकिट कंफर्म हो गया है।’
अब इसमें ट्रेन और टिकिट तो आम बोलचाल की भाषा में बहुत समय से है पर कंफर्म शब्द अब प्रचलन में अधिक आया है और थोड़ा परेशान करता लगता है। इसलिये कंफर्म के लिये कोष्टक में पुष्ट या पुष्टि लिख सकते हैं ताकि अपनी भाषा के प्रति दायित्व पूरा हो जाये।

गाड़ी मिस हो गयी के लिये चूक शब्द कोष्टक में ले सकते हैं। वैसे यह बात तभी करें जब हम किसी कहानी या व्यंग्य में किसी अन्य पात्र से कहला रहे हों। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि किसी कहानी या व्यंग्य की पृष्ठभूमि बहुत महत्वपूर्ण होती है। बड़े शहरों में कई विजातीय भाषाओं के कई ऐसे शब्द प्रचलन में आ गये हैं कि वह कई कहानियों और व्यंग्यों की पृष्ठभूमि में उपयोग किये जायेंगे। इसलिये भाषा के शब्दों के प्रयोग मेंं सावधानी बरतें और भले ही आवश्यक हो तो अंग्रेजी शब्द का प्रयोग करे। साथ ही यह भी याद रखें कि आगे आने वाले समय में आपका पाठ का प्रिंट निकालकर कहीं पढ़ाना चाहे तो उसमें अंग्रेजी शब्द का अनावश्यक प्रयोग आपके अंक काट सकता है। देश की अधिकांश हिंदी भाषी आबादी शहरी क्षेत्रों में प्रचलन में आये अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग नहीं अभी नहीं जानती है इसलिये अंग्रेजी शब्द के साथ हिंदी का शब्द जरूर जोड़ें। यह मानकर चलें कि आगे आपके पाठों के प्रिंट भी निकाल कर पढ़े जा सकते हैं।

मुख्य बात हिंदी में लिखना है। कई प्रकार की रूढताओं से परे रहकर ही यह संभव है। संगठन के रूप में सक्रिय लोग इन रूढ़ताओं को इसलिये जीवित रखना चाहते हैं ताकि नयी पीढ़ी आगे न आ सके। यही कारण है कि कई बड़े लेखक ब्लाग लेखन की आलोचना कर रहे हैं क्योंकि इससे उनका वह वर्चस्व समाप्त हो रहा है जो अपने व्यवसायिक और सामाजिक संगठनों की शक्ति पर उन लोगों ने बना रखा था। आजादी की बात करने वाले ऐसे लोग सर्वाधिक नियंत्रित व्यवस्था के समर्थक रहे है। इसलिये अंतर्जाल के लेखक भाषा के संबंध में अपने साथियों के साथ सतत चर्चा करें पर लिखते समय अपने विचार प्रवाह में बाधा न आने देते हुए बाद में संपादन के द्वारा उसे इस तरह पठनीय बनायें कि अंग्रेजी का शब्द आवश्यक होने पर ही वहां रह पाये। अपना विचार भाषा की शुद्धिकरण पर चल रही बहस से दूर ही रहें क्योंकि मैंने ऐसी बहसों से कुछ नहीं सीखा है।
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दीपक भारतदीप

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