ब्लाग दे सकते हैं प्रचार माध्यमों को चुनौती-आलेख


कितनी विचित्र बात है कि प्रचार माध्यमों से जुड़े लोग स्वयं ही यह स्वीकार करने लगे हैं कि व्यवसायिकता से जो प्रतिस्पर्धा की भावना ने उनको सामाजिक सरोकारों से परे कर दिया है। सारे टीवी चैनल टी.आर.पी. की अंधी दौड़े में शामिल होने के साथ अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं। उनको अपने कल पर विश्वास नहीं है इसलिये वह सारी कमाई आज करना चाहते हैं।

सभी संचार और प्रचार माध्यम-टीवी चैनल और समाचार पत्र-पत्रिकाऐं-अपने प्रसारणों और प्रकाशनों की विषय सामग्री में सामाजिक सरोकारों से संबद्ध दिखने का प्रयास करते हैं पर उनसे जुड़े लोगों को पता है कि वह हृदय से इसमें शामिल नहीं है। वह यह भी जानते हैं कि उनके प्रस्तुतीकरण में व्यवसायिकता अधिक है और समाज से प्रतिबद्धता कम। उससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि वह इसे स्वीकार कर रहे हैं। कितनी विचित्र बात है कि जो समाचार पत्र सामाजिक सरोकारों से परे हैं वही ऐसे लेखों को छाप भी रहे हैं जिसमें उन्हीं पर यह आक्षेप आता है।
किसी भी टीवी चैनल पर भ्रष्टाचार के रहस्योद्घाटन करने वाला कोई कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है उसमें उद्घोषक नैतिकता और ईमानदारी की बात करता है जैसे कि उसका व्यवसायिक कार्य केवल शुद्ध नैतिक आधार पह टिका है-और सामने बैठे दर्शक भी पूरी तरह उस जैसे हैं। यह सच सभी जानते हैं कि जो पकड़ा गया चोर और जो नहीं पकड़ा गया वही साहूकार है। तसल्ली इस बात की है प्रचार मध्यमों से संबद्ध लोग व्यवसायिक बाध्यताओं के चलते वह कार्य कर रहे हैं जो हृदय से उनको स्वीकार नहंी है और अवसर पाते ही वह स्वीकार कर लेते हैं-इस पर तसल्ली की जा सकती है कि वह कम से कम इसका ज्ञान तो रखते हैं कि नैतिकता और सामाजिक सरोकार क्या होते हैं।

अक्सर मैं अपने आलेखों के प्रचार माध्यमों के प्रसारणों और प्रकाशनों पर निराशा व्यक्त करता हूं। उनके कार्यक्रमों और प्रकाशनों के स्तर में गिरावट आयी है यह लोग तो वह स्वयं भी स्वीकार करने लगे है। इसके बावजूद वह नये प्रयोग का प्रयास नहीं करते। शायद प्रयोग से उनको जो परिणाम मिलने में समय लगेगा उसकी प्रतीक्षा वह नहीं कर रहे क्योंकि उनको लगता है कि कहीं वह इस चक्कर में टी.आर.पी. की दौड़ से बाहर न हो जायें। यही कारण है कि वह पश्चिमी प्रचार माध्यमों की सफलता के फार्मूले यहां भी आजमा रहे हैं। वह अपने प्रयोग कर भविष्य में उसके परिणामों की प्रतीक्षा में समय बर्बाद नहीं कर सकते क्योंकि जिस तरह विश्व में तकनीकी परिवर्तन आ रहा है उसमें उनको अपने अस्तित्व का खतरे में पड़ने की आशंका दिखाई देती है।
देख जाये तो इस समय इंटरनेट इन प्रचार माध्यमों को एक भारी चुनौती देने जा रहा है। इस देश में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या छह करोड़ है-यह मैंने एक हिंदी के ब्लाग में ही पढ़ा था। इसके प्रयोक्ता वही हैं जो इन्हीं प्रचार माध्यमों से हटकर यहां आ रहे हैं। इन प्रचार माध्यमों में कुछ लोग इस बात को जानते हैं इसलिये उन्होंने इंटरनेट पर भी अपने प्रकाशानों के लिये जगह बना रखी है ताकि यही प्रयोक्ता वहां भी उनके उपभोक्ता बन जायें पर जिस तरह से स्वतंत्र वेब साईटों और ब्लाग की संख्या बढ़ रही है उससे इनको चुनौती मिलेगी क्योंकि उनके स्वामियों पर कोई व्यवसायिक दबाव नहीं हैं। इस समय केवल इंटरनेट से भारी कमाई करने वाला कोई है इसकी जानकारी मुझे नहीं है पर आगे यह संभावना बन सकती है पर ऐसे लोग किसी के दबाव में आयेंगे यह नहीं लगता।

अनेक वेबसाईट और ब्लाग लेखक तमाम तरह के प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में हो सकता है कि कोई अपना टीवी चैनल या अखबार बना ले जिसे लोग रुचि के साथ पढ़ना और देखना चाहें। यह सही है कि अपने घर पर रखे टीवी का बटन खोलकर उसे तत्काल देखना और अपने आंगन में पड़े अखबार को पढ़ना अधिक सरल है बनिस्बत कंप्यूटर खोलने से, पर अगर किसी वेबसाइट या ब्लाग ने अपनी विशिष्टता के कारण लोकप्रियता प्राप्त कर ली तो लोग वह भी करेंगे। अभी कई लोग अपने कंप्यूटर का उपयोग गाने सुनने और फिल्में देखने के लिये कर रहे हैं। जिस तरह नित नयी तकनीकी आ रही है इंटरनेट की शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ रही है जो आगे इन प्रचार माध्यमों को चुनोती देगी।
अंतर्जाल पर ब्लाग लेखन का विरोध बहुत लोग कर रहे हैं तो इसका कारण यह है कि उनको समाज और व्यक्ति को नियंत्रित करने वाले संगठनों का सहयोग रहा है। अनेक लोग यथास्थिति बनाये रखने के लिये इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि परिवर्तन से उनके अस्तित्व पर संकट आ सकता है। मैं केवल अपने लिखने के कारण ही अंतर्जाल पर आया पर ऐसे परिवर्तनों का साक्षी बन रहा हूं जिसकी कल्पना मैंने कभी नहीं की। अंतर्जाल पर सक्रिय मेरे मित्र और पाठक शायद ऐसे परिवर्तनों का महत्व इसलिये नहीं समझ रहे क्योंकि वह उनके लिये अभी फलदायी नहीं हुए हैं। उदाहरण के लिये अंग्रेजी-हिंदी अनुवाद टूल से कोई हिंदी भाषी ब्लाग लेखक और पाठक अभी मुझे नहीं पढ़ रहा इसलिये वह इसका महत्व नहीं समझ पायेंंगे पर मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरे ब्लाग इसी टूल से अन्य भाषी लोग पढ़ रहे हैं और यह केवल मेरे नहीं पूरे हिंदी ब्लाग जगत के व्यापक क्षेत्र में पहुंचने का संकेत है। कुछ समय बाद हो सकता है कि हिंदी के वेब साईट और ब्लाग लेखक यह अनुभव करें कि उनको तो अन्य भाषी भी पढ़ रहे हैं। दो वर्ष पूर्व मुझे अपने कृतिदेव फोंट में टंकित कर उसे अपने ब्लाग पर प्रकाशित करने की सुविधा नहीं थी पर आज यह आसान हो गया है। इसकी उपलब्धता का महत्व भी वही ब्लाग लेखक समझ सकते हैं जिनको इसकी जरूरत है। इधर मैं देख रहा हूं कि कुछ वेबसाइट और ब्लाग लेखक वीडियो और आडियो के जरिये भी अपनी बात रख रहे हैं। ऐसे में बहुद्देशीय कंप्यूटर और इंटरनेट प्रचार माध्यमों को वेबसाईट और ब्लाग चुनौती देगा इसकी संभावना प्रबल है। अभी तक आम लोगों में इसका प्रचार अधिक नहीं हुआ है पर आगे इसका प्रचार बढ़ेगा वैसे ही पाठक तो बढ़ेंगे ही ऐसे लेखक भी आयेंगे जो इसे विस्तार प्रदान करेंगे।

हां, एक बात है कि ऐसे परिवर्तनों का साक्षी बनने पर मुझे एक रोमांच का अनुभव होता है बाकी मेरे हिस्से में लोकप्रियता आयेगी या नहीं इस पर मैं विचार नहीं करता। वैसे तो लोकप्रियता की चाहत सभी में होती है पर निष्काम भाव से लिखते हुए मुझे इसकी परवाह इसलिये भी नहीं होती क्योंकि मुझे लगता है कि मेरा रास्ता उसी तरफ ही जाता है। इसलिये इन परिवर्तनों का रोमांच अनुभव करते हुए लिखता जाता हूं।

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