दिल में कोई आईना नहीं हैं-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
-सुना है तुमने महाकवि की
उपधि स्वयं ही धारण की है
क्या इतनी कुंठा आ गयी कि
कोई सम्मान नहीं देता
कोई इनाम नहीं देता
या किसी अन्य कारण से की है
अरे, कुछ नैतिकता की बातें लिखते
भले ही वैसे हमें न दिखते
अंतर्जाल पर कौन देखता है
आदर्श की बातें हर कोई फैंकता है
तुम भी शांति की बातें करते
भले ही हम से झगड़ा करते
अब मुश्किल होगा तुम्हारे लिये
यह महाकवि की पदवी
चाहे किसलिये भी धारण की है’

अपनी पहले टोपी पहनी और
फिर आंखें तरेरते हुए बोले महाकवि दीपक बापू
‘सब संभव है हमारे लिये
सिवाय झूठ बोलने के
और शब्द लिखना बिना तोलने के
कभी नहीं कर सकते काम
स्वभाव मे अस्वाभाविकता घोलने के
नैतिकता की बात नहीं कर सकते
अपने आचरण से मूंह नहीं फेर सकते
हाल ही किसी की बात पर गुस्सा आता
भला ऐसे में शांति का संदेश कैसे लिख पाता
किसी की असहमति पर
आ जाता है मन में ताव
कैसे दिखाएं दूसरों को अहिंसा का भाव
अपनी मूर्खताओं का हमें ज्ञान है
कैसे लोगों को बतायें कि विद्वान है
यह तो मालुम है कि
शांति, अहिंसा और नैतिकता की बात लिखकर
हम भी हिट हो जाते
पर अपने से मूंह कैसे छिपाते
कैसे करें सिद्धांतवादी होने का नाटक मंचन
हर पल तो करते हैं आत्ममंथन
अपने अंदर ढेर सारे दोष नजर आते
इसलिये अपनी बात हास्य में कह जाते
चिंतन में भी नहीं छिपाते
देखा है लोगों को दोगली बातें कर हिट लेते हुए
देते हैं नैतिकता का संदेश देते मंच पर
नीचे उतरकर उपहारों की किट लेते हुए
क्षमा को वरदान बताने वाले
बन जाते मारधाड़ कर दान की रकम बचाने वाले
सच को सीधे न कहें
हास्य में तो कह ही जाते हैं
लोग हंसी में सुनने पर घबड़ा जाते हैं
भर गये हैं लोगों के धन और सम्मान से खजाने
पर फिर भी होते अपनों में बेगाने
कोई हमें क्यों उपाधि देता
पहले हमसे हमारी पगड़ी पैरों में रखवा लेता
इस राह पर अकेले हैं
इसलिये ही यह उपाधि धारण की है
दिल में कोई आईना नहीं है
जो हमारा सच हमें दिखा सके
यह गफलत इसी कारण की है
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टिप्पणियाँ

  • आप अकेले नहीं हैँ…

    और भी बहुत से मिल जाएँगे जो आपसे…आपकी बातो से …आपके लेखों से इत्फाक रखते हैँ लेकिन… मेरे ख्याल से गंजो के शहर में कँघी की दुकान खोलने से कोई फायदा नहीं

  • sameerlal  On जुलाई 2, 2008 at 12:00

    इस राह पर अकेले हैं
    इसलिये ही यह उपाधि धारण की है

    –अरे नहीं नहीं…आप अकेले नहीं हैं. 🙂

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