राजनीतिक विषयों पर लिखा जल्दी अपना प्रभाव खो देता है-आलेख



अक्सर कुछ लोग मेरे ब्लाग/पत्रिका पर ऐसी टिप्पणियां लिखकर अपनी पसंद के राजनीतिक विषयों पर लिखने का आग्रह करते हैं। हालांकि मुझे लगता नहीं है कि आम पाठक होंगे क्योंकि अनेक बार मैं यह मानकर उनको ईमेल करता हूं तो उनके जवाब नहीं आते। कई बार ऐसे भी दिखाते हैं कि मैं कोई बड़ा भारी लेखक हूं। मुझे लगता है कि कुछ मित्र या आलोचक ऐसे झटके देकर अपने मनपसंद विषयों पर कुछ नया पढ़ना चाहते हैं। कई बार मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की जाती है। मैं ऐसी टिप्पणियां पढ़कर अब हैरान नहीं होता।

अभी कुछ दिन पहले मेरा पर्यावरण का लेख कहीं शामिल करने की अनुमति मांगी गयी। मैंने वह दे दी तो पता लगा कि छह महीने में लेख शामिल होगा। इसलिये मुझे लगता है कि कुछ छद्म लोग मुझसे लिखवाने के लिये प्रेरित कर रहे है। बहरहाल मैं राजनीतिक विषयों पर सीधे कुछ नहीं लिखता पर मेरे लिखे को आप उनके संदर्भों में पढ़ना चाहें तो मेरे आलेखों और कविताओं में अप्रत्यक्ष रूप से उनका समावेश होता है पर घटनाओं और पात्रों का उल्लेख इसलिये नहीं करता क्योंकि उस तरह की कई घटनायें पहले भी हो चुकीं हैं और आगे भी संभावित होती हैं। वैसे राजनीतिक विषयों पर किसी खास संदर्भ में लिखना मुझे अपना समय ऊर्जा नष्ट करना लगता है। हां, उनमें से निकलने वाले संदेशों पर मैं इस तरह लिखता हूं जिससे मेरे पाठ का दीर्घकाल तक प्रभाव रह सके। इसलिये पात्रों के नाम और स्थान लिखकर उनका फोकट में प्रचार करने की बजाय उन घटनाओं का उपयोग इस तरह करता हूं कि पाठ का प्रभाव लंबे समय तक बना रहे।

जैसे आपने देखा कि भारत में एक नहीं अनेक क्षेत्रों में बाहर से आये व्यक्तियों के विरुद्ध अभियान चलते रहे हैं। भारत मे ही नहीं विदशों में भी भारतीयों के विरुद्ध ऐसे अभियान चलते हैं। मैंने इस पर एक लेख लिखा था कि ‘मनुष्य का आगमन और प्रस्थान रोकना कठिन’। यह लेख मैंने अनेक घटनाओं से प्रेरित होकर लिखा था और यह आज से पचास वर्ष भी प्रासंगिक रहेगा क्योंकि यह मानवीय स्वभाव से उपजी समस्या है और इसलिये ऐसे आंदोलनों या अभियानों को समर्थन मिलता भी है। आप इस देश का तो छोड़ें जिन देशों में अवैध रूप से घुसने के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही होती है वहां भी लोग पहुंच जाते हैं-ऐसे कई उदाहरण है।

मानव मन है जो उसे कहीं विचरण करने के लिये प्रेरित करता है और वही उसे दूसरे को अपने यहां आगमन अपने खतरे के रूप में ही देखता है। अब आप बताईये किसी घटना विशेष को लेकर लिखने पर वह कितना प्रभावी रह सकता है?

एक और है कि राजनीतिक में सक्रिय लोग अपने कथित ढांचागत दायरों से कभी बहुत कम लोग निकल पाते हैं। अक्सर मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर लिखने की बात करते हैं तो उनसे ही सवाल करूंगा कि वह उस देश का नाम बता दें तो जहां के राजनेताओं ने अपने विचारों मे बदलाव किया हो। बिल क्लिंटन दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रहे और जार्ज बुश भी दूसरी बार राज्य कर रहे हैं-इससे भारत का क्या मतलब? मगर उनकी चर्चा इतनी देश में होती है जैसे इस देश पर उनका प्रभाव पड़ता हो। अमेरिका के राजनेता कभी भी अपने दायरों से बाहर नहींं निकल सके। वह आज भी यह मानकर चलते हैं कि जितनी अन्य देशों में अशांति रहेगी उनके देश सुरक्षित रहेगा। कुल मिलाकर जो मुद्दे राजनीति बनाती है उसका कोई हल नहीं निकल पाता। उस पर ढेर सारा लिखने का अवसर भले ही मिल जाता पर वह अल्पकाल के लिये ही पढ़ने योग्य रहता है। अमेरिका आठ वर्ष से आतंकवाद के विरुद्ध लड़ रहा है और यकीन मानिये अगले आठ वर्ष तक यही स्थिति रहने वाली है-क्योंकि विश्व में आतंकवाद राजनीति से निकली समस्या है। अमेरिका के इराक पर पहले किये गये हमले के लेख मैंने उस दिन फाड़ दिये जो अखबारों की कटिंग कर रखे थे। वह अब किसी काम के नहीं थे। आप कितने बरसों से अमेरिका की यह लड़ाई देख रहे हैं और आपको क्या अभी इसका अंत नजर आता है?
हम किसी भी अन्य देश में सत्ता परिवर्तनों के साथ जबरन अपने को जोड़ने का प्रयास करते हैं जबकि इस बात को भूल जाते हैं कि अंततः हमारे मामलें में वह अपनी पुरानी ही नीतियों पर चलेंगे। अभी पाकिस्तान में आये परिवर्तन पर हमारे यहां सब फूलकर कुप्पा हो रहे थे। ऐसा भी सुनने में आया कि पाकिस्तान एकतरफा रूप से वीजा खत्म करने की योजना बना रहा है उस समय मैंने लिख दिया था कि वह ऐसा कभी नहीं करेगा। वजह यह है कि वहां भारत के प्रति सौहार्द का भाव आना कठिन है और अगर वह आ गया तो पाकिस्तान का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। कभी कभार वहां के नेता भारत के बारे में ऐसा बयान देते है कि यहां लोग फूलकर कुप्पा हो जाते हैं और अगले दिन ही उनका खंडन आ जाता है। अब ऐसे विषयों पर लिखने से क्या फायदा जिनको अगले दिन ही पुराना पड़ जाना है।

एक दिलचस्प बात है पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोने वाले नेता स्वयं ही अपने वैचारिक ढांचों में कैद हैं और वह अपने साथ अपने देश के लोगों को भी रखना चाहते हैं उनसे इन ढांचों से बाहर निकलने की आशा करना ही बेकार है क्योंकि यह कैद ही उनका राज्य है। आपने संयुक्त राष्ट्र संघ का नाम सुना होगा। क्या कभी वहां ऐसा प्रस्ताव आया है कि सभी देशों के लिये वीजा पासपोर्ट का कानून समाप्त कर दिया जाये? वह ऐसा कभी नहीं करेगा क्योंकि वह ढांचों के ऊपर ढांचा खड़ा है अगर सब ढांचे ढह गये तो उसका अस्तित्व क्या रह जायेगा?
हम कहते हैं कि हम पहले से अधिक सभ्य हैं? इस सभ्यता अहंकार एक पिंजरे मेंे कैद होने के दर्द को छिपाने के लिये है। पहले अनेक अहिंसक लोग बिना किसी हथियार के कहीं भी आ जा सकते थे। अनेक राज्य थे इस देश में पर साधु और संतों की यात्रायें बिना किसी बाधा के हुईं। अपने देश के अनेक व्यापारी और संत मध्य एशिया तक हो आये। क्या उन्होंने कोई पासपोर्ट या वीजा बनवाया था? अनेक यात्री भारत आये और यहीं आकर रह गये। सभ्यतायें आयी और यहां नयी सभ्यता बनती गयी। जब देशों के नाम पिंजरे बने तो नई सभ्यताओं का निर्माण रुक गया-मेरा विवेक तो यही कहता है। आप मुझसे उदाहरण न मांगें क्योंकि बात वहीं पर अटकेगी कि अगर वह प्रस्तुत किया तो मेरे लेख का प्रभाव समाप्त हो जायेगा। मैं हमेशा चिंतन प्रस्तुत करता हूं जो कि मनुष्य के हृदय में निराकार भाव से विचरण करता है।

सभी देशों के राजनेताओं ने अपने लिये वैचारिक ढांचे बना रखे हैं। अमेरिका आज भी पाकिस्तान को वैसा ही औपनिवेश मानता है जैसे कभी ब्रिटेन अखंड भारत का मानता था। एक दिलचस्प बात यह है कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता पर मेरा अपना एक सोच है और यकीनन वह इतिहास से मेल नहीं खाता। मेरा मानना है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है और घटनायें क्रमबद्ध ढंग से घटित होतीं हैं। भारत में स्वतंत्रता के बाद अनेक ऐसी घटनायें हुईं हैं जो मुझे स्वतंत्रता का वह सच बताती हैं जिसके लिये मुझे इतिहास की जरूरत नहीं रहती। इन्हीं घटनाओं पर सब कुछ देखने के बावजूद सत्य आज के लोग नहीं लिख पाये तो उस समय क्या उन लोगों ने खाक लिखा होगा? चिंतन और मनन से परे समाचार देना इतिहास नहीं होता। इतिहास में अगर किसी घटना की पृष्ठभूमि का सही अवलोकन न किया जाये तो सारा इतिहास ही बेकार हो जाता है। चीन कभी भी अरुणांचल को भारत का अंग नहीं मानेगा क्योंकि उसके नेता एक ढांचागत विचाराधारा में काम कर रहे हैं-अब उस पर लिखकर अपना समय और ऊर्जा नष्ट करना नहीं तो और क्या है? चीन क्यों नहीं भारत के नागरिकों के लिये बिना वीजा के प्रवेश शूरू कर देता क्योंकि वह तो पूरी दुनियां को एक मानने वाली विचाराधारा के समर्थक हैं? कहने का तात्पर्य है कि विश्व के राजनेता अपने वैचारिक ढांचों में ही घूमते हुए मुद्दे बनाते हैं और उनका हल निकालने की बजाय उन्हें लगातार चर्चा में बनाये रखकर अपने लिये भुनाना पसंद करते है।

पहले ज्वलंत मुद्दे देकर मैं प्रभावी होता था और उन पर लिखने से लोग मुझे पसंद भी करते थे पर धीरेधीरे जब सच सामने आया तो मुझे लगा कि मैंने बेकार मेहनत की। आज भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर लोग गरमागरम लिखते हैं और अन्य लोग उनको सराहते हैं पर मैं हंसता हूं। मुझे पता है कि अभी इन विषयों पर और गर्मीगर्मी वाला लिखा जायेगा। मैं यह नहीं कहता कि कोई भी इस पर न लिखे क्योंकि ऐसा कहना अपने अहंकार का प्रदर्शन करना है। आजकल अंतर्जाल पर ऐसे अनेक मुद्दे आते हैं जैसे कि बहुत संवेदनशील मामला हैं पर मैं बिल्कुल प्रभावित नहीं होता और मैं उनमें मनुष्य मन की हलचल ढूंढता हूं और अपनी बात कविताओं और आलेखों में इस तरह लिखता हूं कि उनका प्रभाव दीर्घकाल तक रहे और यह काम भी बिना संवेदनशीलता के संभव नहीं है। बस अंतर यह है कि लोग अपनी संवेदनाओं को जल्दी बहने देते हैं और मैं उसके लिये प्रतीक्षा करता हूं। ऐसे कई मामले हैं जिन पर मेरा सोच गहरा है और मैं उसे व्यक्त करता हूं और कुछ लोग इसे जानने लगे हैं बस वह यह समझ नहीं पाते कि निशाने पर कौन है? उसका जवाब यह है कि मेरे निशारे पर व्यक्ति नहीं बल्कि मानवीय प्रवृत्तियां रहतीं हैं और नाम बदल जाये पर वह किसी दूसरी आदमी में भी रहेंगी।

उस दिन एक पाठक की टिप्पणी से उपजा यह आलेख है जिसने लिखा था कि वह मुझसे मिलना चाहता है और भारत अमेरिका के बीच परमाणू संधि पर आप भी कुछ लिखिये। तब मुझे हंसी आयी। एक तो मैं आज तक यह समझ नहीं पाया कि इसमें हैं क्या? संभव है यह कोई बड़ा मामला हो या नहीं भी हो सकता है। राजनीति में कई विषय तो नारों पर खड़े किये जाते है जिनमें गहराई कितनी है बहुत कम समझ पाते हैं पर चूंकि वह ज्वलंत होते हैं इसलिये लोग लिखकर नाम कमा लेते हैं। उस दिल लेख फाड़ते वक्त मुझे ऐसा लगा कि मुझे यह लिखना ही नहीं चाहिये थे जिनको आज मैं पढ़ना नहीं चाहता। इसलिये मैं अगर ऐसे विषयों पर लिखता भी हूं तो मनुष्य, समाज और राष्ट्र की ऐसी हलचलों को रूप में लिखता हूं तो स्वाभाविक होने के कारण लंबे समय तक बनी रहती हैं। हां, घटना और पात्र बदल जाते हैं। अगर कोई अन्य लिखता है तो मैं उसे बहुत दिलचस्पी से पढ़ता हूं और उसमें तलाशता हूं अपने लिये कोई ऐसा विषय जिस पर लिख दीर्घकाल तक प्रभावी हो। इसमें सफलता या असफलता की परवाह मैं अपने पाठको पर ही छोड़ता हूं। शेष फिर कभी

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