भेदात्मक दृष्टि वाले विद्वानों की बहुतायत-आलेख


भारत में कदम कदम पर विद्वान मिल जायेंगे। अगर देखा जाये तो हर तीसरे आदमी को अपना ज्ञान बघारने की आदत होती है। फिर अब तो अंग्रेजी से पढ़े लिखे लोगों का कहना ही क्या? यहां भाषा का ऐसा कबाड़ा हुआ है कि हिंदी वाले ही सही शुद्ध हिंदी नहीं समझ पाते और इसलिये अंग्रेजी वालों का भाव अधिक बढ़ा ही रहता है। ऐसे में उनको अपने ज्ञान के अंतिम होने का आभास-जिसे भ्रम भी कहा जा सकता है-कि अपने विचार के प्रतिवाद करने पर हायतौबा मचा देते हैं। ऐसे में मेरा कई ऐसे विद्वानों से वास्ता पढ़ता है जो अपनी बात को अंतिम कहते हैं और सिर हिलाकर सहमति देता हूं। अगर देखता हूं कि वह सहनशील है तो प्रतिवाद करता हूं हालांकि यह भी एक बात है कि जो वास्तव में जो ज्ञानी होते है वह गलत प्रतिवाद पर भी उत्तेजित नहीं हेाते।

जीवन में कई बार ऐसा अवसर आता है जब हमें दूसरे से विचार या ज्ञान लेने की आवश्यकता पड़ जाती है। ऐसे में संबंधित विषय की जानकारी रखने वाले की शरण लेने में कोई संकोच भी नहीं करना चाहिए। मुश्किल तब आती है जब हम ज्ञानी समझकर किसी के पास जाते हैं और वह अल्पज्ञानी होता है। हम उसकी राय से सहमत नहीं होते तो वह उग्र हो जाता है‘-तुम मेरे पास आये ही क्यों?’
फिर अंग्रेजों ने इस देश में अनेक विभाजन स्थापित कर दिये। चाहे
वह समाज हो या शिक्षा सभी क्षेत्रों के अलग अलग स्वरूप कर दिये। उनको इस देश पर राज्य करना था इसलिये फूट डालो और राज्य करो की नीति अपनाई तो शिक्षा में भी अलग-अलग विषय स्थापित किये। अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, हिंदी, राजनीति शास्त्र, विज्ञान, और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में शिक्षा का विभाजन कर इस देश में अधिकाधिक विद्वानों का अस्तित्व बनाये रखने का मार्ग प्रशस्त किया ताकि विवाद खड़े होते रहें पर समाधान न हो। वैसे अर्थशास्त्र में दर्शनशास्त्र को छोड़कर सारे शास्त्रों का अध्ययन किया जाता है-इसमें भारत के प्राचीन शास्त्र शामिल नहीं है। इस शिक्षा पद्धति से विद्वानों के झुंड के झंड इस देश में पैदा हो गये और आजकल सभी जगह बहसों में उन विद्वानों को बुलाया जाता है जो कहीं अपनी ख्याति अपनी शिक्षा की बजाय अपने धन, पद, और प्रतिष्ठा के कारण अर्जित कर चुके होते हैं।

अब विद्वानों की बात करें तो अर्थशास्त्र के विद्वान केवल अर्थ के धन और ऋण से अधिक नहीं जानते। वह मांग और आपूर्ति की बात करते हैं वह विश्व बाजार में से अपने देश के बाजार की तुलना करते हैं पर कभी अपने समाज के बारे में वह नहीं बोलते। समाज के नियमित क्रिया कलापों का किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता पर किसी अर्थशास्त्री को उसका जिक्र करते हुए नहीं देखते होंगे। अर्थशास्त्र के अध्ययन में भारत के पिछड़े होने का कारण यहां के लोगों के अंधविश्वास और रूढियों को भी बताया जाता है। सगाई शादी और मृत्यु के अवसर पर उनके द्वारा दिखावे के लिये धन व्यय करना गांवों में गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण माना जाता है। इसके लिये लोग अपनी जमीन गिरवी रखकर सगाई, शादी और मुत्यु के अवसर पर समाज में अपनी साख बनाये रखने के लिये भोज का आयोजन करते हैं और कई लोग तो इतना कर्जा लेते हैं कि उनकी पीढि़यां भी उबर नहीं पाती। पहले भारत के किसान साहूकारों से कर्जा लेते थे और उनकी ब्याज दर बहुत अधिक होती थी। आजकल कई जगह बैंकों से भी कर्जा दिया जाने लगा है पर वह धन वास्तव में कृषि पर होता है या अनुत्पादक कार्यों-जैसा सगाई, शादी या मुत्यु भोज- पर इस कोई चर्चा नहीं करता। आपने कई जगह किसानों द्वारा आत्महत्या की बात सुनी होगी। नित-प्रतिदिन ऐसी घटनायें प्रचार माध्यमों से आती हैं। आखिर वह किसके कर्ज से त्रस्त हो कर आत्म हत्या कर रहे हैं और वह कर्ज किस काम के लिये लिया और किस काम पर किया-यह कभी चर्चा का विषय नहीं बनता। अर्थशास्त्र के विद्वान तो समाज शास्त्र का मुद्दा होने के कारण इस पर प्रकाश नहीं डालते और समाज शास्त्री अर्थशास्त्र का विषय मानकर मूंह फेर जाते हैं। वर्तमान में पश्चिमी प्रभावित संस्कृति ने जिस तरह इस देश में पांव फैलाये हैं और भौतिकता के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है उससे समाज में तमाम तरह के आर्थिक तनाव है पर यह बात कोई नहीं लिखता।
मैंने इस पर अनेक लंबी चैड़ी बहसें सुनी हैं पर यह सच्चाई सामने नहीं आ पाती कि आखिर किसानों के कर्ज के आत्महत्या के मूल में कारण क्या है? क्या किसी समाज शास्त्र ने इस पर अपना विचार रखा है। यह एक चिंता का विषय है। यह आत्महत्यायें देश के लिये शर्म की बात है पर हमारे अर्थ और समाज शास्त्री इसके मूल कारणों पर प्रकाश डालने की बजाय ऐसी बहसों में ही लगे रहते हैं जिनका कोई हल नहीं निकलाता।
अर्थशास्त्र में यह भी पढ़ाया जाता है कि यहां रूढि़वादिता है। अगर किसी किसान के छह बेटे हैं तो उसके बाद उसकी जमीन के छह विभाजन हो जाते हैं और यह विभाजन आगे बढ़ता जाता है और धीरे-धीरे कृषि योग्य जमीन कम होती जाती है। जनसंख्या वृद्धि के चलते यह समस्या बढ़ती जाती है और इसका अंत भी अभी तो नजर नहीं आता। देश के अर्थशास्त्री विश्व बाजार में उथल पुथल के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की बात तो करते हैं जो कि जो केवल औद्योगिक क्षेत्र पर ही पड़ता है। भारत की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है और उसके साथ ऐसी समस्यायें जो अन्य देशों में कम ही पायी जातीं है-जिनका निराकरण केवल कर्जे माफी से नहीं बल्कि देश में रूढि़वादिता के विरुद्ध लोगों में जागृति कर ही लाया जा सकता है।
किसान-उद्योगपति, मजदूर-मालिक, स्त्री-पुरुष, जवान बालक-वृद्ध और अधिकारी-कर्मचारी जैसे भेद कर सब पर अलग-अलग चर्चा करते हुए ढेर सारे विद्वानों के तर्क सुनिये और फिर भूल जाईये। कोई घटना हो तो तैयार हो जाईये प्रचार माध्यमों पर फिर वही बहस सुनने के लिये।
बहसें भी ऐसी होती हैं कि किसान, मजदूर, स्त्री, बालक-वृद्ध के कल्याण पर ऐसे तर्क सुनाये जाते हैं कि दिल खुश हो जाता है। उद्योगपति, मालिक, पुरुष और जवान की जैसे कोई समस्या नहीं है जबकि यह अभी तक इस भारतीय समाज में अपनी सक्रियता के कारण प्रभाव बनाये हुए हैं।
आखिर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सारी बहसें होने के बावजूद कोई निष्कर्ष क्यों नहीं स्थापित हो पाता है। कुछ लोग कहते हैं कि अगर निष्कर्ष निकलने लगे तो फिर बहस के लिये बच क्या जायेगा? अर्थशास्त्र में मनोविज्ञान का अध्ययन किया जाता है जो कि सारे शास्त्रों का आधार स्तंभ होता है पर विद्वान लोग इस पर कभी चर्चा नहीं करते। वैसे मैंने मनोविज्ञान नहीं पढ़ा पर अपने मन को एक दृष्टा की तरह उसके उतार चढ़ाव देखकर कई अनुभूतियां होती हैं उस पर कविता और आलेख लिखता हूं। इसलिये मैं कभी भेदात्मक दृष्टि से कहीं नहीं देखता।
ऐसा अनेक बार होता है कि कहीं दो समुदायों में दंगे होते हैं तो वहां पर कुछ सज्जन लोग दूसरे समुदाय वाले को न बल्कि बचाते हैं बल्कि उसकी अन्य प्रकार से सहायता भी करते हैं। वह लोग प्रशंसनीय हैं पर देखने वाले लोग इसमें भी भेद देखते हुए उसकी कहानी बयान इस तरह बताते हैं कि जैसे कोई अस्वाभाविक बात हुई हो। तमाम तरह के कसीदे पढ़े जाते हैं और बताया जाता है कि ऐसे में भी कुछ लोग हैं जो दुर्भावना में नहीं बहते।

आप जरा इस पर गहराई से दृष्टि डालें तो यह समझ में आयेगा कि मनुष्य का मन ही उसे ऐसे काम के लिये प्रेरित करता हैं हर मनुष्य में क्रूरता और उदारता का भाव होता है। कुछ लोगों में जब क्रूरता का भाव पैदा होता है तो कुछ में दया भाव भी होता है। अगर कहीं कोई मनुष्य तकलीफ में है तो और इधर उधर कातर भाव से देखता है तो उसकी भाषा न जानने वाला व्यक्ति सामथर्य होने पर उसकी सहायता करता हैं-कोई भी मनुष्य अपने पास पानी या भोजन होने पर किसी को प्यासा या भूखा करने नहीं दे सकता क्योंकि उसका मन नहीं मानता। अगर किसी व्यक्ति को किन्हीं व्यक्तियों से खतरा उत्पन्न हो गया है तो उसके निकट उस समय मौजूद कोई अनजान आदमी भी उसे छिपा सकता है क्योंकि किसी आदमी को संकट में फंसे होने पर मूंह फेरने के लिये उसका मन नहीं मानता। यह मन है जो मनुष्य को चलाता है मगर देखने और सुनने वाले भी उसमें धर्म, जाति और भाषा के भेद कर उस पर लिखते हैं और वाहवाही बटोरते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कोई मनुष्य किसी की सहायता करता है तो वह उसकी प्रकृति न कि उसे जाति, धर्म या प्रदेश से जोड़ना चाहिये।

वाद और नारों पर बनी अनेक विचाराधाराओं के मानने वाले विद्वान इस देश में हैं और वह अपनी भेदात्मक बुद्धि के कारण विश्व में कोई सम्मान नहीं बना पाये उल्टे वह विदेशी विद्वानों के कथनों को यहां लिखकर ऐसे दिखाते हैं जैसे तीर मार लिया हो। अगर आप देखें तो निश्चयात्मक और भेद रहित होकर संत कबीर, रहीम और तुलसी ने पूरे विश्व में ख्याति अर्जित की और अब तो विदेशों में भी उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है। मूर्धन्य हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया और इसलिये उनको पूरे विश्व में ख्याति मिली। बाद में हुए विद्वान वाह वाही बटोरने के लिये अंग्रेजों द्वारा सुझाये गये भेदात्मक मार्ग पर चले तो फिर किसी ने विश्व में अपनी ख्याति नहीं बनायी। हां, तमाम तरह के शास्त्रों के अध्ययन के नाम पर उनको धन और सम्मान जरूर मिला पर यहां वह लोगों के हृदय में स्थान नहीं मना सके। यही कारण है कि पुराने विद्वान आज भी प्रासंगिक है और वर्तमान विद्वान भेदात्मक मार्ग के कारण आपस में झगड़े कर वहीं गोल-गोल चक्कर लगाते हैं।

इसका कारण यह है कि वाद और नारों पर चलते रहने से एक छवि बन जाती है और उससे विद्वान लोगों को यह लगता है कि उसे भुनाया जाये। वैसे अधिकतर लोग किसान, नारी,गरीब, बालक, शोषित, वृद्ध और अन्य तमाम तरह के वह वर्ग जिनके नाम पर शब्दों का संघर्ष कर अपनी छवि बनायी जा सकती है उनका उपयोग करते हैं। अब ऐसा भी नहीं है किसी एक वर्ग का नारा लगाकर काम करते हों वह समय के अनुसार अपने अभियानों में वर्ग बदलते रहते है ताकि लोग उनके वाद और नारों से उकतायें नहीं। कभी किसान की बात करेंगे तो कभी गरीब और कभी नारी कल्याण की बात करेंगे। यह सब केवल अपनी छवि बनाये रखने के लिये करते है। यही कारण है कि कोई समग्र विकास में समस्त लोगों के हित देखने की बात कोई नहीं करता।

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