एक ब्लाग गायब हुआ तो दूसरा प्रकट हो गया-आलेख


अपने साफ्टवेयर की सहायता से वर्डप्रेस की पांच श्रेणियों को अपने यहां खिसकाकर ले जाने वाला ब्लाग परिदृश्य गायब हुआ तो दूसरा छठी श्रेणी से यही काम करते हुए प्रकट हो गया। 20 जुलाई को उसने इस लेखक के ब्लाग की एक पोस्ट ली है और उससे पहले और बाद में कोई पोस्ट नहीं ली। इस तरह का जो पहला ब्लाग था उसकी जानकारी एक सप्ताह पहले ही आयी थी और उस पर कुछ पाठ इसी ब्लाग पर लिखे गये थे। अब यह पता नहीं कि यह ब्लाग उसी विवाद के दौरान जानकारी के अभाव में बना या चूंकि इस ब्लाग से उस पर प्रहार हुए तो प्रतिकार स्वरूप उसने यह ब्लाग बनाया है। यह कोई एक व्यक्ति कर रहा है या कोई समूह है कहना मुश्किल है। यह कहना मुश्किल है कि इस ब्लाग पर लिखे गये पाठ उनकी दृष्टि में आ रहे हैं कि नहीं क्योंकि वह अपने यहां अनेक ब्लाग खींच लेते हैं और यह संभव नहीं है कि वह सभी पढ़ते हों। बहरहाल यह चालाकियों से भरा काम है और इसका मुकाबला चालाकी से ही किया जा सकता है। वह नाम छिपाना चाहते हैं तो हम अपने पाठों पर अपना नाम इस तरह दें कि उनके पाठक यह जान सकें कि उस पाठ को किसने लिखा है।

अंतर्जाल पर वैसे कोई बात तो पूरी तरह कह पाना मुश्किल है पर ऐसा लगता है कि लोगों के पास डोमेन की खरीद के कारण स्पेस हैं पर उनका उपयोग करने के लिये उनके पास कोई योजना नहीं है। वह नाम और नामा तो कमाना चाहते हैं पर इसके लिये जो प्रयास किये जाने की आवश्यकता है वह उनके बूते का नहीं है। अधिकतर वेबसाइट उतावली में बना लीं गयी कि हम कुछ करेंगे! पर क्या? इसकी कोई योजना नहीं है। डोमेन बेचने वालों की हालत के बारे में इन्हीं ब्लाग पर पढ़ा कि उनके व्यवसाय को वह ऊंचाई नहीं मिली जिसकी वह आशा कर रहे थे। ऐसे में हो सकता है कि जिनके पास डोमेन फालतू पड़े हों वह स्पेस भरकर यह प्रयास कर रहे हों कि शायद इससे कुछ बात बन जाये। कहने का मतलब यही है कि स्पेस भरने के लिये उन्हें कुछ चाहिए। फोटो और विडियो से भी कौन और कब तक काम चलायेगा? शब्द पढ़ने का अलग ही मजा है और अब उन्हें चाहिए शब्द! ऐसे में उनके पास इस दुनियां में अनेक भाषाओं को ब्लाग लेखक हैं जो अपनी अभिव्यक्ति और अनुभूतियों के साथ यहां मौजूद हैं। अपने हाथों को कंप्यूटर पर नचाते हुए अपना पसीना निकालकर शब्दों की रचना कर रहे हैं। उनसे अपने ब्लाग को साफ्टवेयर से सजाने में उनको भला क्या परेशानी?

यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक बापू कहिन’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका

ऐसे साफ्टवेयर बनाये गये हैं जिसमें लेखक का नाम अगर पाठ में नहीं हो तो पाठक को दिखाई नहीं देगा। इसलिये वह उस ब्लाग की संपत्ति बन जाता है जिस पर वह दिखाई दे रहा है। शब्दों के रचयिता मजदूर भला कहां देखने जाते हैं कि उनका उपयोग कैसा कर रहा है? वह तो अपने ब्लाग पर ही पाठकों की आमद देखकर यही सोचते हैं कि उनके ब्लाग पर ही आमद हो रही है। जब यहां ऐसे कारिस्तानी करने वाले ब्लागर है तो कुछ ऐसे भी हैं जो ऐसी चालाकियों की जानकारी संबंधित ब्लाग लेखकों तक पहुंचा कर अपने मजे लेते हैं। आशय यह हैकि यहां केवल लेखक होने से ही काम नहीं चलने वाला बल्कि अपने साथ ऐसे मित्र भी रखना जरूरी हैं कि जो अंतर्जाल पर अपने ब्लाग की देखरेख करते रहें।

कुल मिलाकर अब कहीं शिकायत लेकर जाने का विचार करना बेकार लगता है क्योंकि यह एक व्यवसायिक चालाकी है और उसका प्रतिकार किया जा सकता है। अभी कौनसा पैसा मिल रहा है बस नाम की एक ललक है और अगर कहीं पाठक ब्लाग का पाठ पढ़ते हुए लेखक का नाम पढ़ सकता है तो फिर विवाद में अपना समय नष्ट करने से कोई फायदा नहीं है। अपने कुछ तकनीकी ब्लागरों की राय अनुसार अपने ही ब्लाग पर अपनी पहचान लिखते जाना ही एक ठीक उपाय है । हर पाठ में अपने ब्लाग का नाम लिख कर लिंक लगाकर प्रदर्शित करना अच्छा उपाय है। यह लिंक ऐसे ही है जैसे अपनी पूंछ की कुर्सी बनाकर बैठना। जहां यह पाठ चालाकी से जायेगा वहां यही लिंक हमारे ब्लाग से उसको भी लिंक कर बताता है कि यह पाठ उस ब्लाग पर लिंक हुआ पड़ा है। अभी चालाक ब्लागरों की नजर में यह बात शायद नहीं आयी। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह काम कट पेस्ट कर नहीं किया गया क्योंकि उनके द्वारा ब्लाग को देखने की जानकारी कहीं नहीं मिल रही। अगर ऐसे ब्लाग लेखकों ने उसे मिटाने का प्रयास किया तो हर पैराग्राफ के नीचे अपनी पहचान लिखी जाये ताकि वह वह हम लोगों के ब्लाग के पाठ उठाने में कुछ मेहनत करें। वैसे वह लोग इतनी मेहनत करेंगे इसकी संभावना कम ही है।

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