अपनी कविताओं से दूसरों के ईमेल कूड़ेदान की तरह नहीं सजाते-हास्य कविता


दनदनाता आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू, आज मिल गया
तुम्हारे हिट होने का मंतर
अपने फ्लाप होने का दर्द भूल जाओ
अपने ब्लाग लिखकर दूसरों के ईमेल में
जबरन भिजवाओ
हर कोई एक उड़ाने से पहले एक बार
जरूर देखेगा
इस तरह अपना हिट भेजेगा
चलो आज से जमकर लिखो कविता
और हिट की सीढि़या चढ़ जाओ’

सुनते ही उठ खड़े हुए और
चिल्लाते हुए बोले महाकवि दीपक बापू
‘निकल यहां से जल्दी
वरना देख इन जबरन घुसे ईमेल संदेशों की तरह
तुम्हारा नाम भी दोस्तों की लिस्ट से उड़+ा देंगे
क्या समझ रखा है कि
जिस बात से स्वयं परेशान है
वह व्यवहार दूसरे से करेंगे
कमबख्त, जवां दिलों को पटाने के लिये
यह कविताएं नहीं शायरों का नुस्खा है
जैसे उनके लिये तंबाकू का गुटका है
न दिमाग की सोच से इसका वास्ता
न दिल की तरफ जाता शब्दों का रास्ता
यह शब्द भोजन की तरह हैं
आदमी स्वयं दाना खाकर पेट भरता
मछली को खिलाकर फांसता
इन शब्दों में भाव कम
किसी को बहलाने और हिट होने का
ताव है ज्यादा
अपने लेखक और कवि होने का भ्रम
उसे सच बनाने का है इरादा
कविता ऐसे लिखी है जैसे लिखना हो नाश्ता
साहित्य में बहुत जल्दी हिट होने का
साजिश से निकाल रहे है रास्ता
असली लिखने वाले कभी
पाठकों के दरवाजे नहीं बजाते
ईमेल को कूड़ेदान की तरह नहीं सजाते
लिखा जाये दिन और दिमाग से
तो लेखक और कवि लिखने का ही
सुख बहुत उठा लेते
कोई पढ़े या नहीं इस चिंता से मूंह फेर लेते
भेज रहे हैं जो जबरन कवितायें
दूसरों के गुलदस्ते को कूड़ेदान की तरह सजायें
हम फ्लाप है फिर को परवाह नहीं
हिट होने का ऐसा मोह नहीं कि
दूसरों के सामने हिट के लिये भीख मांगें
हर लिखे गये शब्द कविता या कहानी नहीं हो जाते
जब तक पढ़ने वाले उसे हृदय से नहीं अपनाते
अरे, फैंक रहे हैं जो
कूड़ें की तरह अपनी रचनायें
भला वह कहां सम्मान पायें
पल भर में ईमेल से उड़ा दी जायें
अपनी पत्रिका ही है वह किला
जहां रचना चमकते रहे शब्द सोने की तरह
पढ़े जो वह सम्मान दें
जो न पढ़ें, वह नहीं करते गिला
किसी दूसरे के आगे जाकर
उनको क्या मिलेगा
जब आदमी को प्यार नहीं मिला
तुम निकल लो यहां से
साथ में अपना मंतर भी ले जाओ
……………………………………………..

यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक बापू कहिन’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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