ब्लागवाणी जैसे हिट किसी के लिये भी सपना-आलेख


ब्लागवानी के लोग सही कहते हैं कि वह लोग शौकिया हैं पर उनको नहीं मालुम वह कई व्यवसायिक लोगों के लिये चुनौती बने हुए हैंं। इस समय हिंदी ब्लाग जगत में चार हिंदी फोरम ऐसे हैं जो सभी हिंदी ब्लाग को अपनी जगह दिखाते हैं। ब्लाग वाणी के अलावा तीन अन्य हैं-नारद, चिट्ठाजगत, और हिंदी ब्लागस। अधिकतर हिंदी ब्लाग लेखक लिख तो पूरी दुनिया के रहे हैं पर उनकी दुनिया इन चार के आपपास ही सिमटी हुई है। इनमें ब्लागवाणी सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। अधिकतर हिंदी ब्लाग लेखक उस पर आकर ही दूसरे के ब्लाग को पढ़ना और उन पर टिप्पणियां लिखना पसंद करते हैं।

ब्लागवाणी के जन्म की एक कहानी है पर उसके बाद जो बदलाव हिंदी ब्लाग जगत में आये हैं उस पर अनेक लोगों की हिंदी ब्लाग जगत में दिलचस्पी जागी। वैसे हिंदी में ब्लाग लेखक की शुरुआत ऐसे लोगों ने की जो व्यवसायिक थे या फिर इसमें आगे व्यवसाय की संभावनाएं तलाश रहे थे। उनके साथ ऐसे लोगों का समूह भी जुड़ा जो पूरी तरह शौकिया था। ब्लाग वाणी के कर्णधार भले ही विनम्रता के कारण अपने आपको कर्णधार कहलाने की वजह कार्यकर्ता कहलाना चाहते हैं पर वह अनेक वेबसाईट और अपने स्वाजातीय फोरमों के कर्णधारों के लिये चुनौती है। ब्लागवाणी के कर्णधार विशुद्ध रूप से शौकिया है कम से कम यह बात हम मान सकते हैं क्योंकि वह किसी बदलाव से विचलित नहीं होते। उनको किसी एग्रगेटर या वेबसाइट का अभ्युदय विचलित नहीं करता पर ब्लागवाणी का आकर्षण कई लोगों के लिये ईष्र्या का विषय हो सकता है।

हिंदी में अन्य एग्रीगेटर और वेबसाईटें ब्लागवाणी की चुनौती का सामना करने के लिये तमाम उपाय कर रहीं हैं। यहां उनमें से किसी का नाम लेना ठीक नहीं है क्योंकि हर किसी को व्यवसाय करने का अधिकार है। मुद्दा यह है कि हिंदी में बरसों से चली आ रही परंपराओं के आधार लेखकों को मजदूर या मुफ्त का समझना है। हिंदी में लिखने वाले बहुत हैं पर जिसे रचना कहा जाता है उसकी कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं-यह एक अलग विषय है। कई वेबसाईटें अपने यहा लिखने के लिये इनाम आदि देने की बात करती हैं तो कोई इशारों में सम्मान आदि देने की बात भी करती हैंं। दरअसल उन वेबसाईटों के कर्णधारों का मुख्य उदद्ेश्य अपने आपको प्रचारित करना है। लिखे लेखक और वह उसे छापकर संपादक या हिंदी भाषा के अंतर्जाल पर अभ्युदय करने वाले श्रेष्ठ व्यक्ति कहलाना चाहते हैं। इनमें कुछ लेखक भी हैं पर निरंतर लिखने के लिये उनके पास अवसर नहीं हैं पर नाम निरंतर चर्चा में बनाये रखने के लिये वह ऐसे प्रयास कर रहे हैं जिन पर सोचना पड़ता है।

ब्लागवाणी के कर्णधारों को अपने फोरम में कोई ऐसा बदलाव नहीं करना चाहिए जिससे ब्लागलेखक उनसे दूर जायें। उन्हें किसी दूसरी वेबसाईट की नकल भी नहीं करना चाहिए और अगर करते हैं तो उन्हें यह देखना चाहिए कि कहीं वह उनको ब्लाग लेखकों से दूर तो नहीं ले जायेगा। आज यह लेख लिखते समय इसके लेखक का ध्यान उनकी चिप्पियों की तरफ गया। वहां उसके ब्लाग से संबंधित कुछ भी नहीं था। चाणक्य, कबीर, रहीम, अध्यात्म तथा अन्य कई चिप्पियां गायब हैं। स्पष्टतः यह दूसरी वेबसाईटों से प्रेरित होकर किया लगता है यही कारण है कि अपनी श्रेणियों, लेबल और टैगों से आने वाले पाठकों के आने के मार्ग देखने पर पता चलता है कि तो वहां ब्लागवाणी का अस्तित्व नहीं दिखता जबकि उसका एक प्रतिद्वंद्वी फोरम सभी जगह दिखता है। यह लेखक कोई शिकायत नहीं करता क्योंकि इस अंतर्जाल पर किसी भी लेखक के शब्द ही अपने ब्लाग पर पाठको को लाने में सक्षम है। बाकी वेबसाईटें या तो अपने प्रिय ब्लाग लेखकों की चिप्पियां लगाये हुए हैं या फिर वह स्वयं ही उनके मालिक भी है। अगर ब्लागवाणी उनकी नकल कर रहा है तो वह गलती करने जा रहा है। यह उनकी अपनी मर्जी है पर लेखक का अपना यह एक विचार है। इस लेखक को तकनीकी ज्ञान नहीं है पर जो दिखता है उसे इसी सरल भाषा में लिखना जरूरी है। खासतौर से ब्लागवाणी के कर्णधार भी जब उसकी श्रेणी के उपेक्षित लेखकों की जमात से हो तब तो और भी जरूरी हो जाता है।
अनेक हिंदी वेबसाईटों के लिये ब्लागवाणी जितने पाठक पाना अभी भी एक ख्वाब हैं। यह अंतर्जाल है जहां अंतरिक्ष और हवा तक शब्दों घूम रहे हैं यहां जमीन पर चलने वाली पूंजीवादी और सामंतशाही के सहारे हिंदी में प्रसिद्धि पाना एक ख्वाब है। अंतर्जाल पर घूमने वाले टीवी चैनलों और अखबार के आधार पर ही यहां खोज करें यह जरूरी नहीं है। यही कारण है कि ऐसी मानसिकता वाले कुछ लोग ब्लागवाणी जैसा बनना चाहते हैं।

नारद फोरम की पुरानी साख है और वह परिदृश्य में अधिक नहीं होने के बावजूद लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। हिंदी ब्लाग्स भी अपनी छबि धीरे धीरे बना रहा है पर चिट्ठाजगत इस समय जमकर प्रयोग कर रहा है। ब्लागवाणी को ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए क्योंकि वह हिंदी ब्लाग जगत पर जितनी चमक बनाये हुए है उसे फिलहाल कोई चुनौती नहीं है। कई चमकदार चेहरे अपने लेखन और व्यवसायिक कौशल से वैसी ही स्थिति प्राप्त करना चाहते हैं जो उसके कर्णधारों को बड़ी सहजता से ही मिल गयी। ब्लाग वाणी के कर्णधार पहले पंगों और धुरविरोध के लिये जाने जाते थे। उनमें जोश और लिखने के प्रति निष्काम भाव था जो उन्हें ऐसी स्थिति मिल गयी। ब्लोगवाणी इस लेखक के उस पाठ को नहीं भूले होंगे जिसमे सभी ब्लाग लेखकों से समस्त फोरमों पर जाने का आग्रह किया गया था और उसके बाद ब्लागवाणी तेजी ने नारद पर हावी हो गया। नारद के कर्णधारों ने एक योजना के तहत ही उसे शुरू किया पर ब्लागवाणी के कर्णधारों ने तो केवल उसे चुनौती देने के लिये ही यह फोरम बनाया।

ब्लागवाणी दूसरे फोरमों या वेबसाईटों की नकल करे इसके लिये अन्य बेवसाईटें बहुत प्रयास कर रही हैं- इनामों की घोषणा और हिंदी का एक मात्र मसीहा बनने की होड़ लगी हुई है। कहीं फिल्म के कार्यक्रम जोड़े जा रहे हैं तो कहीं इनाम आदि की घोषणा की जा रही है। कहीं लिखना सिखाया जा रहा है। कहीं ब्लाग लेखकों द्वारा लिखे जा रहे विषयों पर उंगलियां उठाई जा रही है। यह सब प्रयास प्रयास ब्लागवाणी को पथ से विचलित करने के लिए है।
फोरमों से अलग वेबसाईटें अभी हिंदी ब्लाग को इस तरह दिखाती हैं जैसे वह कोई हल्की विधा हो पर आने वाले समय में यह सभी छांटछांटकर ब्लाग अपने यहां दिखायेंगी यह इस लेखक का दावा है। अभी पुरानी किताबों से पुराने लेखकों की रचनायें छापकर लोग अपना काम चला रहे हैं पर नये लोगों को चाहिए नये संदर्भों के नयी रचनायें और आम ब्लाग लेखकों के अलावा यह कोई और नहीं कर सकता। ऐसे अनेक ब्लाग लेखक हैं जो स्तरीय लिख रहे हैं। अंतर्जाल पर संक्षिप्तता का महत्व है और यहां गागर में सागर भरने वाले ही हिंदी में पुराने लेखकों से भी अधिक नाम कर सकते हैं।
ब्लाग लेखकों को दोयम दर्जे का कहने वालों पर आप हंस सकते हैं क्योंकि उनके लिखों में वैसे ही पूर्वाग्रह हैं जो हम हिंदी में बरसों से देखते आ रहे हैं। अंतर्जाल पर हिंदी को ले जायेंगे तो यही केवल http:// वाले ब्लागर ही न कि www वाले। www लेने के बाद लोग लिखना ही भूल जाते हैं केवल यही प्रयास करते हैं कि उनके विज्ञापन पर अधिक क्लिक हो। सभी वेबसाईटें अपनी चिप्पियों में इस ब्लाग लेखक की श्रेणियों, लेबलों और टैगों से दूरी बनाये हुए हैं और यह सोच समझकर किया गया है। फोरमों के बारे में तो मुझे कुछ नहीं कहता पर बाकी वेबवाईटें अगर इस ब्लाग लेखक को इतना हेय समझती हैं तो क्यों फिर उसके ब्लाग लिंक किये बैठी हैं। बहरहाल ब्लाग लेखकों को लिखने के लिये प्रेरित किया जा रहा है पर न तो उनको नाम देना चाहता है कोई और नहीं सम्मान। ब्लाग लेखकों को यह समझना चाहिए कि उनको अपना लिखा ही शिखर पर पहुंचा सकता है। ब्लागवाणी के कर्णधारों के बारे में मेरी राय यही है कि वह आम ब्लाग लेखकों की मानसिकता वाले हैं और इस वास्तविकता का उन्हों समझ लेना चाहिए। वैसे वह भी जमीन पर पूंजीवादी, सामंतवादी और रूढि़वादी लोगों से उपेक्षित लेखक हैं और वह दूसरों के कहने में आकर बहकेंगे नहीं यह कहा जा सकता है पर सजी सजाई वेबसाईटें देखकर उनके मन में विचार आते ही होंगे तक उन्हें यह सोचना चाहिए कि उन जितने पाठक अभी किसी के पास भी नहीं है। अगर बहके तो वह लोकप्रियता के उस शिखर से गिरेंगे जिसकी कल्पना ही उनके प्रतिद्वंद्वी करते है। ब्लाग लेखकों को तो चारों फोरमों के प्रति एक जैसा रवैया अपनाना चाहिए पर अन्य वेबसाईटों के प्रचार पर बहुत सोच समझ कर विचार करना भी आवश्यक है कि क्या वह वास्तव में ब्लाग लेखकों का सम्मान करती हैं कि नहीं। यहां उन्हें किसी का मोहताज नहीं होना चाहिए। यह अंतर्जाल एक खुला मैदान हैं जहां केवल लेखकों के शब्द ही पाठक जुटा सकते है। इसलिये अपने ब्लाग पर ही लिखते रहें। कितने लोगों ने आज तक पढ़ा यह मत सोचें आगे कितने पढ़ने वाले हैं इस पर विचार करें। ब्लागवाणी नहीं कई ब्लाग लेखक भी इन वेबसाईटों के लिये चुनौती बने हुए हैं हालांकि यह लेखक ब्लागवाणी पर फ्लाप ब्लागर है पर यह इसी कारण कि इधर उधर घूमते हुए ऐसी चीजे उसकी नजर में आती है जिससे लगता है ब्लागवाणी जैसे हिट किसी के लिये भी अभी तक सपना है। ब्लागवाणी के कर्णधार (उनके अनुसार कार्यकर्ता) कभी दूसरी वेबसाईटों को देखकर यह न सोचें कि उनकी चमक हमसे अधिक कैसे? उनके पास पाठक नहीं है और न वह आम ब्लाग लेखकों को महत्व देती है।

यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक बापू कहिन’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका

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टिप्पणियाँ

  • sanjayrajasthani  On अक्टूबर 17, 2008 at 14:09

    good,, please tell me that how can i publish my blog on thease agregetors…
    electionrajasthan.wordpress.com
    re.

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