ब्लाग यानि अखबार और किताब-आलेख


अगर मुझसे कोई सवाल करता है कि अंतर्जाल पर क्या लिख रहे हो तो मेरा एक ही जवाब होता है कि‘ब्लाग पर लिखता हूं।’
फिर सवाल पूछा जाता है-‘ब्लाग यानि क्या?’
अब मेरे लिये बहुत मुश्किल होता है यह जवाब देना क्योंकि इसका कोई आधिकारिक हिंदी अनुवाद मेरे पास उपलब्ध नहीं है। तब मैं कहता हूं कि यह समझो कि‘जैसे अपनी समाचार पत्र या पत्रिका की तरह ही समझो।’
लोग आराम से मेरी बात समझ जाते हैं। हालांकि उनका अगला प्रश्न होता है कि-‘इसमें तुम्हें मिलता क्या है?’
तब मुझे बताना पड़ता है कि अभी ऐसी संभावना नहीं बनी है।’
उस दिन एक मित्र ने मुझसे कहा-‘यार, मेरी पत्नी एक स्कूल में टीचर है वहां निकलने वाली एक पत्रिका के लिये उसे एक निबंध चाहिये । कोई पुराना लिखा हो तो बता दो या फिर नया लिख दो।’
मैने उससे कहा-‘अलग से तो मैं कुछ लिखने से रहा पर अगर तुम मेरे घर आकर सभी ब्लाग देख लो और जो पसंद आ जाये तो उसे फ्लापी,सीडी, या पेन ड्राइव में ले जाओ।’
उसने कहा-‘ इंटरनेट तो उसी स्कूल में है तुम तो ब्लाग का पता दे दो।’

दो दिन बाद वह प्रिंट कर ले आया और बोला-‘यार, यह लेख मेरी पत्नी को पसंद आया पर इस पर थोड़ा कुछ और लिख दो मजा आ जाये। यह कुछ छोटा है।’

मैंने उस लेख को देखा और उस ब्लाग पर जाकर वहां से वह लेख ले आया और यूनिकोड से कृतिदेव में परिवर्तित कर विंडो में लाया और फिर उसमें जोड़कर उसे सीडी में दे दिया ताकि वह प्रिंट करा सके। चलते समय उसने कहा-‘यह ब्लाग तो वाकई काम की चीज है। यह एक अखबार की तरह भी है और किताब की तरह भी।
मैंने तुम्हारी कम से कम पांच लेखों की कापी निकलवाई थी और यह इसलिये ले आया कि इसमें संशोधन करा सकूं।’

यह बात आज से चार माह पुरानी है और मेरे से कई लोग कहते हैं कि अपनी रचनायें दो तो मैं उनसे कहता हूं कि तुम मेरे ब्लाग से उठा लो, पर कई लोग सुविधा होते हुए भी उसका लाभ नहीं उठा सकते। कारण यह है कि लोग यहां परंपरावादी हैंं। अभी भी लेखक को एक फालतू का आदमी समझा जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर वह मशहूर नहीं है तो किसी काम का नहीं है। अक्सर मैं सोचता था कि कोई प्रकाशक मिल जाये तो अपनी किताब छपवा लूं। मरे एक मित्र ने अपनी क्षणिकाओं की किताब छपवाई थी और वह चाहता था कि इस संबंध में वह किसी ई-पत्रिका से संपर्क कर इसे अंतर्जाल पर प्रचारित करे। उस समय मैंने नया कंप्यूटर केवल इस इरादे से लिया था कि उस पर आपन लेख टाईप करूंगा और बाहर का कोई काम आया तो उसे भी कर दूंगा। कंप्यूटर में सौ घंटे का इंटरनेट टाईम फ्री मिला। उससे पांच दस घंटे काम किया और वह फिर बंद हो गया। मेरे मित्र ने एक ई-पत्रिका का पता दिया और मैं उसे ढूंढने में लग गया पर वह नहीं मिली तो दूसरी हाथ लग गयी। उस पर लेख लिखा। उस समय सद्दाम को फांसी दी गयी थी और अंतर्जाल पर इस संबंध में मेरा आलेख वहां छपा। इधर यह विचार बना कि चलो अपना कनेक्शन लगा लेते हैंं।

ब्लाग पर काम करना शुरू किया तब पता लगी इसकी ताकत क्या है? आज एक जगह पढ़ा कि आस्+ट्रेलिया में टीवी चैनलों और अखबारों को इंटरनेट ने पीछे छोड़ दिया है। एक दिन यह यहां भी होना है। जैसे अंतर्जाल पर ब्लाग लेखन बढ़ता जायेगा वैसे पाठक भी इधर आयेगा। जैसे प्रिंटर मेरे पास है अगर उसकी स्याही सस्ती होती तो शायद मैं बहुत सारे प्रिंट निकालकर किताबें बांट चुका होता। यह प्रिंटर जितने का है उतने की तो स्याही है। एक तरह से मेरा प्रिंटर कबाड़ हो गया है।

समय बहुत बलवान है। जिस गति से पिछले दो सालों में जो बदलाव यहां मैने देखे हैं उससे लगता है कि वह समय भी आयेगा जब लोग ब्लाग को किताबों की तरह पढ़ेंगे। मुख्य समस्या यह है कि लेखक को क्या मिलेगा? हिंदी में मौलिक लेखकों के पाठों पर नजर सबकी है पर उनको कुछ मिले इसके लिये कोई प्रयासरत नहीं है। वैसे ही हिंदी लेखकों के साथ बहुत चालाकियां की जाती रहीं है और अंतर्जाल पर तो वह और भी अधिक होंगी इसमें संदेह नहीं है, पर यहां किसी से मनमानी से बचने का एक ही उपाय है कि अपने ब्लाग पर ही लिखते जायें। यहां किसी को आका बनाने की जरूरत नहीं है। जो मजा लेते हुए लिखेंगे वह कालांतर में बहुत नाम करेंगे। यह ब्लाग किताबों की तरह अंतर्जाल की लाइब्रेरी में बने रहेंगे। जब तक लिख रहे हैं तब तक अखबार की तरह लिखो।

लिखने के बारे में त्वरित टिप्पणियां का मोह त्यागे बिना अंतर्जाल पर बेहतर लिखना कठिन है। त्वरित टिप्पणियों से प्रेरणा मिलती है यह ठीक है पर उसमें मोह पालना अपने लेखन के लिए विष है तब केवल ब्लाग लेखकों को प्रसन्न करने के लिये ही लिखने का मन करता है और वह आम पाठकों के लिये किसी मतलब का नहीं रह जाता। कुल मिलाकर हिंदी ब्लाग जगत में अभी आम ब्लाग लेखक को आय अर्जित करने में समय लगेगा क्योंकि अभी किसी ने इतनी ख्याति अर्जित नहीं की है जिसे विज्ञापनदाता विज्ञापन दें। अभी तो जो लोग कमा रहे हैं उनके बारे में क्या लिखना?
वह सभी तो डोमेन लिये बैठे हैं ओर उनके लिये ब्लाग लेखक एक सहायक से अधिक नहीं है पर वह समय आयेगा जब ब्लाग लेखक कहीं लिंक करने के लिये भी पैसे मांगेंगे। शायद यही कारण है कि आम ब्लाग लेखकों को भटकाने की भी कोशिशें हो रहीं हैं। हमारे यहां लिख और दिख। कुछ लोगों को सम्मान आदि भी मिलेंगे पर जिनको अंतर्जाल पर प्रसिद्ध प्राप्त करना है उन्हें केवल अपने ब्लाग पर ही बने रहना बेहतर होगा क्योंकि यह अखबार भी है और किताब भी। उन्हें बेगारी से भी बचना होगा। यहां की चालाकियों पर शेष फिर कभी!

यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक बापू कहिन’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका

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