आम पाठक को चाटुकारिता या चांटाकारिता से मतलब नहीं होता-आलेख


हिंदी ब्लाग लेखकों का एक समूह इस बात के लिस बहुत हाथ पांव मार रहा है कि अंतर्जाल पर हिंदी का लेखन और पठन पाठन बढ़े। इसके लिये नये ब्लागर के प्रवेश कई ब्लागर लेखकों ने उसके स्वागत में कमेंट रखने का सिलसिला जारी रखा है। देखा जाये तो स्थिति में धीरे धीरे बदलाव आ रहा है पर जिस गति से प्रगति होना चाहिए वह नहीं हो रही । दरअसल हिंदी इस विशाल भारत देश के उपभोक्ताओं मेें सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। बाजार अपने उत्पाद बेचने के लिये हिंदी भाषा को एक हथियार की तरह उपयोग करना चाहता है। इस देश में सात करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं-इसका आशय यह है कि इनमें हिंदी बोलने और समझने वालों की संख्या निसंदेह अधिक है पर फिर भी अंतर्जाल के हिंदी लेखकों की पहुंच उन तक नहीं हैं। बड़ी बड़ी कंपनियां वहां अपना माल पहुंचा रही है, पर अंतर्जाल पर लिखे गये हिंदी के शब्दों से प्रयोक्ता अभी बहुत दूर है। हिंदी ब्लाग जगेत के अनेक ब्लाग लेखक अगर हिंदी में अपनी पैठ बनाने का प्रयास इसलिये कर रहे हैं क्योंकि वह भविष्य में अपने लिये संभावना देखते हैं। उन्हें ऐसा करना भी चाहिए क्योंकि आम प्रयोक्ता भी उनको पढ़ने के लिये लालायित हैं। मुश्किल यह है कि इन दोनों बीच संपर्क कायम करने के लिये कोई व्यवसायिक एजेंसी नहीं हैं और जो हैं वह केवल तात्कालिक लाभ के लिये लालायित हैं ओर उनके पास कोई दीर्घकालीन योजना नहीं है।

कल मीडिया से जुड़े दो लोगों ने हिंदी ब्लाग जगत में प्रवेश किया तो आज एक अभिनेता ने भी अपना ब्लाग लिखा। हिंदी ब्लाग जगत के अनेक ब्लाग लेखकों ने अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए टिप्पणियां लिखकर उनका स्वागत किया। प्रसिद्ध लोग हिंदी में ब्लाग बनायें या अंग्रेजी में उनको पाठक मिल जायेंगे पर हिंदी ब्लाग जगत के लिये उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका तब तक नहीं बन सकती जब तक सर्वांगीण रूप से हिंदी अंतर्जाल पर स्थापित नहीं हो पाती।

अभी देश के लिये अंतर्जाल एकदम नया है। देश का एक बहुत बड़ा वर्ग अंतर्जाल से दूर है। फिर आम लोगों के लिये इसमें या तो शिक्षा है या सैक्स। अभी लोगों को यह जानकारी मिलना है कि उन्हें यहां पढ़ने को वैसा भी मिल सकता है जैसा कि बाहर। टीवी चैनल और अखबारों की खबरों से लेाग संतुष्ट नहीं हैं। फिर यथास्थितिवादी लोगों के हाथ में यह प्रचार माध्यम है जो थोड़े बहुत बदलाव की हवा से भी घबड़ा जाते हैं। कुछ अलग हटकर पढ़ने की चाहत हर आदमी में है पर अंतर्जाल पर वैसा लिखा जा रहा है उसको जानकारी नहीं है।

लोग माने या नहीं सच यह है कि अंतर्जाल पर लिखने वाले अनेक ब्लाग लेखक सच्चाईया लिख रहे हैं। वह ऐसे समाचार देते हैं जो बाहर नहीं मिलते। वह खुलकर ऐसे विषयों पर वाद-विवाद करते हैं जिनसे प्रचार माध्यम संस्कृति,संस्कार और धार्मिक सहिष्णुता के भय के कारण बचते हैं। समस्त प्रचार माध्यम सच से मूंह चुरा रहे हैं पर ब्लाग लेखकों उन पर अपनी राय बेबाक रख रहे हैं। आम आदमी अगर चाहता कि वह सच पढ़े और सुने तो उसे हिंदी ब्लाग पढ़ना चाहिए। उसे अपने बच्चों को भी पढ़ने के लिये भी प्रेरित करना चाहिए। आजकल की शिक्षा और प्रचार माध्यम बच्चों में चिंतन और मनन की चिंगारी पैदा करने में विफल हो गये हैं। आप थोड़ा गौर करें तो लगेगा कि पूरा समाज ही अंधी दौड़ में भागे जा रहा है और लोग रुक कर विचार करने के लिये तैयार नहीं हैं। वह किसी बदलाव का विचार भी नहीं करते क्योंकि उनके चारों तरफ शोर बचाया जा रहा है यह खरीदी, वह खरीदो, यह देखो, वह देखो।

समाचार पत्र पत्रिकायें भी समसामयिक विषयों पर सतही लेख (वह भी लेखन के अलावा अन्य कारणों से प्रसिद्ध लोगों के होते हैं)लोगों को पढ़ने के लिये प्रस्तुत कर रहे हैं। इनमें से कई लेखक तो अंग्रेजी में लिखने के कारण प्रसिद्ध हुए हैं और उनके अंग्रेजी में लिखे का अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है। ऐसा लगता है कि हिंदी में नये लेखक पैदा होना ही बंद हो गये है। यह प्रचार केवल अपने बचाव के लिये बाजार अपना रहा है। हिंदी ब्लाग पर ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनको पढ़ने पर पाठक किसी और को पढ़ना नहीं चाहेगा। वह पैदा कर सकते हैं हिंदी के पाठकों में विचार, चिंतन और मनन की चिंगारी जो बाहर कोई भी लेखक पैदा नहीं कर सकता। अध्यात्म और साहित्य की बात तो छोडि़ये समसामयिक विषयों पर भी ऐसे लेख समाचार पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने को नहीं मिल सकते क्योंकि तमाम तरह के विज्ञापनों का बोझ उठाने वाले ऐसे गंभीर और प्रेरित करने वाले लेखों को अपने यहां स्थान नहीं दे सकते।

मुश्किल यह है कि हिंदी ब्लोग जगत को आगे लेने के इच्छुक अनेक लोगों के मन में केवल आत्मप्रचार का भाव है। यहां के अनेक लोगों ने बाहर जाकर केवल अपने ब्लाग का प्रचार किया। इससे उनको लाभ नहीं होना है क्योंकि यहां समूहबद्ध रूप से ही सफलता संभव है। हिंदी ब्लाग जगत में गुटबंदी के कारण इसमें बाधा आयेगी। प्रचार माध्यमों में अनेक लोगों ने स्वयं को ब्लाग लेखक के रूप में प्रचारित कर रखा है और वह अन्य किसी का नाम वहां नहीं लेतें। यहां गजब का लिखने वाले लोगों का नाम बाहर कोई नहीं लेता और ऐसा कर वह उन्हीं प्रचार माध्यमों की सहायता कर रहे हैं जिनको आगे इस ब्लाग जगत से चुनौती मिलने वाली है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि आम पाठक की पसंद है समसामयिक विषयों पर गंभीर विचारोत्तेजक लेख, हास्य व्यंग्य, गंभीर और हास्य कवितायें, कहानियां तथा चुटकुले न कि उन्हें ब्लाग लेखकों की आपसी चाटुकारिता या चांटाकारिता।
दूसरी समस्या बड़े शहर के कुछ ब्लाग लेखकों का आत्म मुग्ध होना भी है। वह लोग मानकर चले रहे हैं कि हिंदी ब्लाग जगत की शुरूआत उन लोगों ने की है और वह अब सर्वश्रेष्ठ हैं ओर यही रूप सब जगह प्रचारित होना चाहिए। छोटे शहरो के ब्लाग लेखकों को तो केवल भीड़ की भेड़ की तरह समझा जा रहा है जबकि हकीकत यह है कि छोटे शहरों के अनेक लोग बेहतर लिख रहे हैं। अभी तक प्रचार माध्यमों में ब्लाग के नाम पर जिन लोगों के नाम आये हैं उनमें से ब्लाग लेखक कितनों को प्रभावपूर्ण मानते हैं यह एक अलग विषय है पर पिछले दिनों एक ऐजेंसी के कर्ताधर्ता की पत्रकार वार्ता का समाचार अखबारों में छपा उसमें वह ब्लाग लेखकों की बात तो कह रहा था पर किसी का नाम नहीं लिया। अगर पांच दस ब्लाग लेखकों के नाम लेता तो क्या बिगडता? मगर उसे तो केवल अपना प्रचार करना था। यह दिखाना था कि वह हिंदी ब्लाग जगत के लिये सक्रियता दिखा रहा है।

इसके बावजूद हिंदी ब्लाग जगत के लेखक आशावादी हैं क्योंकि यह शब्द अपना काम करेंगे किसी की चाटुकारिता नहीं। आगे वही ब्लाग लेखक प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे जिनके लिखे में दम होगा। जहां तक वर्तमान प्रचार माध्यमों में प्रचार का प्रश्न है तो लोग आजकल अंतर्जाल पर ही अधिक विश्वास करते हैं और वहां जब धीरे धीरे किसी ब्लाग लेखक के शब्द प्रभावी काम करेंगे तो वह प्रसिद्ध हो जायेंगे। ऐसे में जिन लोगों को वास्तव में अंंतर्जाल पर हिंदी को स्थापित करना है उनको चेत जाना चाहिये। अगर वह चाहते हैं कि उनके प्रयासों की वजह से उनको प्रसिद्धि मिले तो उन लोगों को प्रोत्साहित करें जिनके आगे बढ़ने की संभावना है। जिनके शब्दों में प्रभाव है वह आज नहीं तो कल नाम करेंगे पर फिर वह किसी को अपना साथी नहीं बना

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