अभिनव बिंद्रा ही है असली इंडियन आइडियल-आलेख


ओलंपिक मेंं अभिनव बिंद्रा का स्वर्ण पदक जीतना बहुत खुशी की बात है इसका कारण यह है कि भारत में खेल जीवन का एक अभिन्न अंग माना जाता है और हर वर्ग का व्यक्ति इसमें रुचि लेता है पर कई कारणों वश भारत का नाम विश्व में चमक नहीं पाया।

पिछले कई वर्षों से क्रिकेट का आकर्षण लोगों पर ऐसा रहा है कि हर आयु वर्ग के लोग इसे खेलते और देखते रहे। अनेक जगह ऐसे प्रदर्शन मैच भी होते हैं जहां बड़ी आयु के लोग अपना खेल दिखाते हैं क्योंकि इसमें कम ऊर्जा से भी काम चल सकता है। कई जगह महिलाएं भी प्रदर्शन मैच खेलती रही हैं। मतलब इसका फिटनेस से अधिक संबंध नहीं माना जाता। वेसे भी अंग्रेज स्वयं ही इसे बहुत समय तक साहब लोगों का खेल मानते हैं और जहां उनका राज्य रहा है वहीं वह लोकप्रिय रहा है। यह अलग बात है कि प्रतियोगिता स्तर पर एकदम फिट होना जरूरी है पर भारतीय क्रिकेट टीम को देखें तो ऐसा लगता है कि सात खिलाड़ी चार बरस तक अनफिट हों तब भी टीम चल जाती है। भारत में शायद हाकी की जगह क्रिकेट को इसलिये ही बाजार में महत्व दिया गया कि कंपनियों के लिये माडलिंग करने वाले कुछ अनफिट खिलाड़ी भी अन्य खिलाडि़यों के सहारे अपना काम चला सकते हैं। हाकी,फुटबाल,व्हालीबाल,और बास्केटबाल भी टीम के खेल हैं पर उनमें दमखम लगता है। अधिक दमखम से खिलाड़ी अधिक से अधिक पांच बरस तक ही खेल सकता है, पर क्रिकेट में एसा कोई बंधन नहीं है। अब भारतीय क्रिकेट टीम की जो हालत है वह किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद प्रचार माध्यम जबरन उसे खींचे जा रहे हैं।

अभिनव बिंद्रा ने व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता है। अपने आप में यह उनकी एतिहासिक जीत है। वह संभवत इस ओलंपिक के ऐसे स्वर्ण पदक विजेता होंगे जो लंबे समय तक अपने देश में सम्मान प्राप्त करेंगे। अन्य देशों के अनेक खिलाड़ी स्वर्ण पदक प्राप्त करेंगे तो उस देश के लोग किस किसका नाम याद रख पायेंगे आखिर सामान्य आदमी की स्मरण शक्ति की भी कोई सीमा होती है। सर्वाधिक बधाई प्राप्त करने वालों में भी उनका नाम शिखर पर होगा। उनकी इस उपलब्धि को व्यक्तिगत दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। देश के अधिकतर खेलप्रेमी लोग केवल टीम वाले खेलों पर ही अधिक ध्यान देते हैं जबकि विश्व में तमाम तरह के खेल होते हैं जिनमें व्यक्तिगत कौशल ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है।
अभिनव बिंद्रा की इस उपलब्धि से देश में यह संदेश भी जायेगा कि व्यक्तिगत खेलों में भी आकर्षण है। अभी साइना बैटमिंटन में संघर्ष कर रही है। मुक्केबाज भी अभी मैदान संभाले हुए हैं। सभी चाहते हैं कि यह सभी जीत जायंे। ओलंपिक में जीत का मतलब केवल स्वर्ण पदक ही होता है। ओलंपिक ही क्या किसी भी विश्व स्तरीय मुकाबले में जीत का मतलब कप या स्वर्णपदक होता है। यह अलग बात है कि हमारे देश मेंे जिम्मेदारी लोग और प्रचार माध्यम देश को भरमाने के लिये दूसरे नंबर पर आयी टीम को भी सराहते हैंं। इसका कारण केवल उनकी व्यवसायिक मजबूरियां होती हैं। सानिया मिर्जा विश्व में महिला टेनिस की वरीयता सूची में प्रथम दस क्या पच्चीस में ं भी कभी शामिल नहीं हो पायी पर यहां के प्रचार माध्यम उसकी प्रशंसा करते हुए नहीं थकते। कम से कम अभिनव बिंद्रा ने सबकी आंखें खोली दी हैं। लोगों को यह समझ मेंं आ गया है कि किसी भी खेल में उसका सर्वोच्च शिखर ही छूना किसी खिलाड़ी की श्रेष्ठता का प्रमाण है।

भारतीय दल एशियाड,राष्ट्रमंडल या ओलंपिक मेें जाता है तो यहां के कुछ लोग कहते हैं कि ‘हमारा देश खेलने में विश्वास रखता है जीतने में नहीं। खेलना चाहिए हारे या जीतें।’
यह हास्यास्पद तक है। कुछ सामाजिक तथा आर्थिक विश्ेाषज्ञ किसी भी देश की प्रगति को उसकी खेल की उपलब्धियों के आधार पर ही आंकते हैं। जब तक भारत खेलों में नंबर एक पर नहीं आयेगा तब तक उसे कभी भी विश्व में आर्थिक या सामरिक रूप से नंबर एक का दर्जा नहीं मिल सकता। भारत में क्रिकेट लोकप्रिय है देश के अनेक लोग इसे गुलामी का प्रतीक मानते हैं। उनकी बात से पूरी तरह सहमत न भी हों पर इतना तय है कि अन्य खेलों में हमारे पास खिलाड़ी नहीं है और हैं तो उनको सुविधायें और प्रोत्साहन नहीं है। अभिनव बिंद्रा सच में असली इंडियन आइडियल है। अभी तक लोगों ने टीवी पर फिल्मी संगीत पर नाचते और गाते इंडियन आइडियल देखे थे उनको अभिनव की तरफ देख कर यह विचार करना चाहिए कि वह कोई नकली नहीं है। उन्होंने कोई कूल्हे मटकाते हुए कप नहीं जीता। ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल करना कोई कम उपलब्धि नहीं होती। अपना अनुभव धीरज के साथ उपयोग करते हुए पूरे दमखम के साथ उन्होंने यह स्वर्ण पदक जीता है। वह भारत के अब तक के सबसे एतिहासिक खिलाड़ी हैं। अभी तक किसी भी भारतीय ने भी ऐसी व्यक्तिगत उपलब्धि प्राप्त नहीं की है। ध्यानचंद के नेतृत्व वाली हाकी टीम के बाद अब उनकी उपलब्धि ही एतिहासिक महत्व की है। जिस खेल में उन्होंने भाग लिया उसमें पूरे विश्व के खिलाड़ी खेलते हैं और वह क्रिकेट की तरह आठ देशों में नहीं खेला जाता। ऐसे अवसर पर अभिनव बिंद्रा को बधाई। वैसे उनका खेल निरंतर चर्चा में नही आता पर उनकी उपलब्धि हमेशा चर्चा में रहेगी।
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यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक बापू कहिन’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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