खास वर्ग के सुझाये मुद्दों से परे हटे बिना एकता संभव नहीं-आलेख


उस दिन अफलातून जी ने अंतर्जाल पर सीधे वार्तालाप के दौरान उन्होंने अपने शैशव ब्लाग का एक पाठ पढ़ने के लिये कहा। पाठ का शीर्षक था ‘भारतीय ‘जागृति’ बनाम पाकिस्तानी ‘बेदारी’ का राष्ट्र-प्रेम’। पाकिस्तान की फिल्म की ‘बेदारी का दर्द’ और भारतीय फिल्म ‘जाग्रति’ की न केवल कहानियां एक जैसीं हैं बल्कि उनके गाने भी मिलते जुलते हैं। एक गाना हमने सुना होगा जिसका मुखरा है ‘हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के, बच्चों तुम रखना इसे संभाल के’। इसके बाद हमारे यहां जो शब्द आते हैं वह हैं वंदे मातरम और और पाकिस्तान की फिल्म में पाकिस्तान जिंदाबाद के जोड़ा गया है।
उस समय आजादी का जज्बा दोनों तरफ था इसलिये सब इस रौ में बह रहे थे। भारतवर्ष की जनता को बहलाने के लिये कोई न कोई साधन उन लोगों के चाहिए जो खास वर्ग के होते हैं। उस समय दोनों तरफ लाखों और करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़ कर इधर से उधर पलायन करना पड़ा। उनकी पीड़ा को भुलाने के लिये खास वर्ग के लोगों ने लेखकों, पत्रकारों और फिल्मकारों को आगे कर ऐसे फिल्मी गाने लिखवाये, कहानियां लिखवाईं ओर गीत गंवाये। फिर दोनों तरफ के रचनाकार, फिल्मकार और पत्रकार भी उस रौ में बहने लगे और इनाम और सम्माने ने उन्हें प्रेरित किया कि खास वर्ग के लोगों ने जो मुद्दे उठाये उस पर ही विचार व्यक्त करो।

मैंने कई उपन्यास और कहानियां इस बारे में पढ़ी हैं पर उन्होंने मुझे कभी प्रभावित नहीं किया क्योंकि मुझे लगा कि वह विभाजन के दर्द से पीडि़त लोगों की पीड़ा को बयान करती हैं पर उन्हें संघर्ष के लिये प्रेरित करते नजर नहीं आतीं। आज भी अनेक लोग हैंे जो नारे लगा रहे हैं कि अब एक हो जाओ। मगर इसके लिये उनके पास कोई योजना नहीं है। यह बुद्धिजीवी वर्ग जोश में आकर अपने सारे अधिकार खास वर्ग को दे चुका है। खास वर्ग के द्वारा जो मुद्दे बताये जाते हैं वह खौफ फैलाने के लिये होते हैं। इन्हीं मुद्दों पर कुछ लोग आक्रामक होकर समर्थन करते हैं तो कुछ लोग विरोध। पगपग पर बिछायी गयी खास वर्ग की चालों को समझे बिना बुद्धिजीवी केवल नारे लगाते रह जायेंगे।

आपने सुना होगा कि ज्वलंत मुद्दों की बात होती है। आखिर हमेशा कोई न कोई ज्वलंत मुद्दा मौजूद क्यों होता है। आखिर यह आता कैसे है? कोई जानने की कोशिश नहीं करता बस सभी दौड़ पड़ते हैं अपनी अपनी विद्याओं में उसे सजाने के लिये। आजादी के बाद इस देश में कभी बुद्धिजीवियों का एक झुंड लंबे समय तक रहा जो काफी हाउसों में जाकर लंबी चैड़ी बहसें करता, इन पर लिखता और फिर इंतजार करता कि कोई नया मुद्दा आये। इनमें से कई लोग तो अपने देश को मुर्दा कौमे तक कह देते थे। सच तो यह है कि वह इस देश की मानसिकता को समझे ही नहीं। वह चाहते हैं कि खास वर्ग जो उनको मुद्दे बता रहा है उस पर सभी उसकी बात माने। नहीं माने तो कम से कम उनका लिखा पढ़ें या सुने। नहीं सुना तो कह दिया कि यहां मुर्दा कौमे रहती हैं।

श्री अफलातून जी मेरे मित्र हैं और मैं अक्सर उनसे कहता भी हूं कि आपके लिखे पर मुझे लिखने में मजा आता है। यह अलग बात है कि पहली बार उनका नाम लेकर लिख रहा हूं क्योंकि उन्होंने जो विषय सामग्री प्रस्तुत की वह मुझे वाकई बहुत अच्छी लगी। हिंदी ब्लाग जगत में गंभीर लेखन में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। उनके इस पाठ में यूट्यूब गीत सुनकर मुझे यह बात साफ लगी कि उस समय जौ दौर शुरू हुआ वह अब तक थमा नहीं है क्योंकि भारत वर्ष (भारत, पाकिस्तान, और बंग्लादेश) देश के रचनाकार, फिल्मकार, और पत्रकार अपने देश भक्ति के जज्बातों में लंबे समय तक बहते हुए ऐसे आदी हो गये हैं कि उनके पास स्वतंत्र सोच रहा ही नहीं है। इसलिये अवसर पाते ही एक दूसरे के विरुद्ध विषवमन करने लगते हैं। आज दोनों तरफ के बुद्धिजीवी उस आजादी को कथित और अपूर्ण मानते हैं। अनेक तरह के सवाल उठा रहे हैं तब यह प्रश्न उठाते है कि क्या उस समय लोग भ्रमित थे या आज हैं।

कुछ लोग सवाल करेंगे कि आखिर किस विषय पर लिखा जाये। लिखने के लिये खास वर्ग के लोगों द्वारा सूझाये गये मुद्दों से अलग भी कई विषय है पर इसके लिये अपने विचारों का दायरा बढ़ाने के लिये प्रयास करने होंगे। इस मामले में मैं प्रेमचंद जी का नाम लिखना चाहूंगा। उन्होंने गुलामी के समय में अपने समय में सामाजिक परिवेश पर लिख कर यह सबित किया कि खास वर्ग के लोगों द्वारा सुझाये गये मुद्दों से अलग भी लिखा जा सकता है। उनकी नमक का दरोगा और टार्च बेचने वाला जैसी कहानियां इसी बात का प्रमाण है।
स्वतंत्रता के बाद आप देखें तो केवल पीड़ाओं का व्यापार करते लिखने वालों की जमात का ही जमावड़ा हो गया। हम लोगों की मानसिकता है कि हम अपनी पीड़ाओं से उबर आते हैं और फिर निकल पड़ते हैं संघर्ष पथ पर। बंगाल की गरीबी पर बनी अनेक फिल्में विदेशों में लोकप्रिय हुईं पर देश में उनको सम्मान नहीं मिला। इस पर एक फिल्मकार ने टिप्पणी की थी कि ‘भारत में कला की कोई कद्र नहीं है।‘ तब मुझे हंसी आई थी। उसे मालुम ही नहीं आदमी जिस वातावरण में रहता है उसके विपरीत वातावरण का दृश्य उसे भाता है। देश में गरीबी है तो यहां गरीब से अमीर बनने वाली कहानियां ही पसंद की जायेंगी न कि गरीब से मौत पर बनी फिल्मों को यहां कोई देखना चाहेगा।

आजादी के बाद फिल्मों में उर्दू और हिंदी गीतकारों ने जज्बातों को जिस तरह भुनाया वह सभी जानते हैं। मूल बात यह है कि आम आदमी के सामाजिक परिवेश और मानसिकता से परे होकर लिखने से वह कुछ देर उस पर आकर्षित होता है पर फिर उसकी दिलचस्पी उसमें नहीं रह जाती।
आखिरी बात यह है कि भारतवर्ष के बुद्धिजीवी चाहते हैं कि तीनों का जनमानस मानसिक रूप से एकदूसरे के करीब आये तो उसे खास वर्ग द्वारा इंगित मुद्दों से मूंह फेरना सीखना होगा। ऐसे एक नहीं सैंकड़ों मुद्दे हैं जो उठे वह इसलिये नहीं कि सुलझेंगे बल्कि लोग इसमें उलझे रहेंगे और खास वर्ग के लोगों का काम चलता रहेगा। यकीन मानिये जिन मुद्दों पर बड़े बड़े बुद्धिजीवी त्योंरियां चढ़ाते हैं वह बिना किसी आधार के उनको काम में लगाने के लिये दिये जाते है। वैसे मैं इस विषय पर संभवतः अच्छी तरह अपनी बात नहीं कह पाया पर श्री अफलातून जी का पाठ पढ़ने पर मैं भूल न जाऊं इसलिये यह लिख लिया। वैसे इस मामले में उर्दू शायरों की रचनाओं के संबंध में लिखने वाला हूं जिन्होंने इश्क, मोहब्बत, और गरीबों के दर्द पर लिखकर खूब वाहवाही लूटी है और अगर उनको नाम मिला है तो वह संगीतकारों द्वारा उसे गाने की वजह से मिला है न कि उनकी रचनाओं की वजह से।
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यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक बापू कहिन’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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