ब्लागस्पाट का लेबल, वर्डप्रेस की श्रेणियां और टैग-जानकारी के लिये आलेख


यह आलेख मैं एक प्रयोक्ता की तरह लिख रहा हूं और मुझे अपने तकनीकी ज्ञान को लेकर कोई खुशफहमी नहीं है। कल कुछ ब्लाग लेखक ने टैगों को लेकर सवाल किये। अधिकतर लोग ब्लागस्पाट पर काम करते हैं और उनका यही कहना था कि उनके यहां टैग(लेबल)कम लग पाता है। कई लोग के मन में वर्डप्रेस के ब्लाग को लेकर भी हैरानी है। यह आलेख मैं ऐसे ही नये ब्लाग लेखकों के दृष्टिकोण से लिख रहा हूं जिन्हें शायर मुझसे कम जानकारी हो।

पहले ब्लाग स्पाट के लेबल या टैग के बारे में बात कर लें। वहां लेबल में 200 से अंग्रेजी वर्ण नहीं आते यह सही बात है पर उसका उपयोग अगर इस तरह किया जाये जिससे स्पेस कम हो तो उसमें अंग्रेजी के अधिकतक शब्द हम शामिल कर सकते हैं। अगर हिंदी के शब्द भी लिखने हैं तो पहले हिंदी में शब्द फिर उसके साथ अंग्रेजी के शब्द लिखकर वहां से कापी लाकर लेबल पर पेस्ट करें। उसका तरीका यह है। हिंदी,कविता,शायरी,साहित्य,हास्य,व्यंग्य,hindi,kavita,shayri,sahitya,hasya,
कोमा के बाद स्पेस न दें। इससे दोनों मिलाकर अट्ठारह से बीस टैग या लेबल आ सकते हैं।
वैसे तो वर्ड प्रेस के किसी ब्लाग लेखक ने कोई सवाल नहीं किया पर फिर भी उसकी जानकारी दे देता हूं। वहां कैटेगरी और टैग दो तरह से सुविधा मिली है। कैटेगरी में अगर आप ऐसे शब्द भर दें जो आप हमेशा ही अपने पाठों के साथ कर सकते है। जैसे हिंदी,कविता,साहित्य,आलेख,व्यंग्य,hindi,kavita,sahitya,vyangya,hasya vyangya। वहां अपने ब्लाग में सैटिंग में जाकर अपने ब्लाग ओर पाठ की सैटिंग में हिंदी शब्द ही लिखें। इससे आपका ब्लाग हिंदी के डेशबोर्ड पर दिखता रहेगा। मुझे तो अपने ब्लाग की सैटिंग ही दो महीने बाद समझ में आयी थी। वैसे मेरे वहां इस समय आठ ब्लाग हैं जिनमें से दो अन्य श्रेणी में कर रखे हैं क्योंकि वह भी बिना किसी फोरम के इतने पाठक जुटा लेते हैं कि डेशबोर्ड पर दिखने लगते हैं। उस पर मैं अभी तक दूसरे ब्लाग से पाठ उठाकर रखता हूं और डेशबोर्ड पर हिंदी के नियमित ब्लाग लेखक भ्रमित न हों मैंने उसे अन्य श्रेणी में कर रखा है। यह अलग बात है कि चिट्ठाजगत वालों की उस पर नजर पड़ गयी और अपने यहां उसे लिंक किये हुए हैं। वर्डप्रेस में वर्णों की संख्या का कोई बंधन नहीं हैं। मैंने शुरू में एक ब्लाग लेखक को इतनी श्रेणियां उपयोग करते देखा था कि डेशबोर्ड पर उससे हमारे ब्लाग पर दूर ही दिख रहे थे। जब वह नंबर वन पर था तो हमें बड़ी मेहनत से अपने ब्लाग देखने पड़ रहे थे। वर्डप्रेस पर वर्ण या शब्द की कोई सीमा नहीं है

अब आ जाये टैग की किस्म पर जो शायद इस समय सबसे अधिक विवादास्पद है। मुझे अनुमान नहीं था कि यह इतना तीव्र हो जायेगा कि मुझे यह सब लिखना पड़ेगा।
मैने ब्लाग के बारे में लेख पढ़ा था अपने ब्लाग बनाने के छह महीने पहले यानि सवा दो साल पहले। उसके निष्कर्ष मुझे याद थे और आज भी हैं और मैं उन्हीं पर ही चलता हूं।
1.नियमित रूप से अपने ब्लाग पर कुछ न कुछ लिखते रहें। इस बात की परवाह मत करें कि सभी पाठ आपके पाठको अच्छे लगें पर नियमित होने से वह वहां आते हैं और उनकी आमद बनी रहे।
2.ब्लाग पर जमकर टैग लगायें। टैग लगाते समय आपको यह ध्यान रखना चाहिये कि आप अपना ब्लाग कहां और किन पाठकों को पढ़ाना चाहते हैं। उसमें अपने विषय से संबंधित टैग तो लगाना ही चाहिए बल्कि ऐसे लोकप्रिय टैग भी इस तरह लगाना चाहिए कि कोई उन पर आपत्ति न कर सके। याद रहे टैग पाठक को पढ़ाने के लिये नहीं बल्कि अपना ब्लाग वहां तक पहुंचाने के लिये है।
3.अखबारों में आप छपते हैं तो वह अगले दिन ही कबाड़ में चला जाता है। किताबें अल्मारी में बंद हो जाती हैं पर यह आपका ब्लाग अंतर्जाल पर हमेशा ही सक्रिय बना रहेगा।

यह मूलमंत्र मुझे याद है। टैग गलत लगाकर पाठकों को धोखा देना नहीं है-ऐसे तर्क मेरे जैसे लेखक के आगे रखना ही अपनी अज्ञानता का प्रमाण देना है। हम टैग लगा रहे हैं शीर्षक नहीं। कहा यह जाता है कि हमारे पाठ के अनुरूप शीर्षक होना चाहिये। यह टैग वैसी होने की बात किस हिंदी की साहित्य की किताब में कहा गया है। टैग कभी शीर्षक नहीं होते, जैसे पूंछ कभी मूंछ नहीं होती। पैर का इलाज सिर पर नहीं चलता। शीर्षक सिर है और टैग पांव है। आपने देखा होगा पत्र-पत्रिकाओं में होली के अवसर किसी प्रतिष्ठत हस्ती का चेहरा लिया जाता है और किसी दूसरे का निचला हिस्सा लेकर उसका कार्टून बनाया जाता है। मतलब शीर्षक ही पहचान है पाठ की।
टैग तो एक हाकर की तरह है जो उसे लेकर चलता है। अब कहानी है तो वह संस्मरण भी हो सकती है और अभिव्यक्ति या अनुभूति भी। केवल यही नहीं आप ऐसे लोकप्रिय शब्द ले सकते हैं जिनका आम लोग सर्च इंजिन खोलने के लिये उपयोग करते हैं। हां इसमें केवल अमूर्त वस्तुओं, शहरों, या नदियों का नाम लिख सकते हैं जिससे आपको अपना ट्रेफिक बढता हुआ लगे। प्रसिद्ध व्यक्तियों या संस्थाओं का नाम कभी नहीं लिखें क्योंकि इससे आपकी कमजोरी ही जाहिर होगी और उनके प्रशंसकों द्वारा उसका प्रतिवाद भी संभव है। संभव है आम पाठक आप में दिलचस्पी न लें क्यों िउनसे संबंधित सामग्री वैसे ही अंतर्जाल पर होती है।

कुछ शब्द हैं जैसे अल्हड़,मस्तराम,मनमौजी और भोला शब्द अगर वह आपके प्यार का नाम है तो उपयोग कर सकते हैं। जैसे मुझे मेरी नानी कहती थी ‘मस्तराम’। मुझे उनका यह दिया गया नाम बहुत प्यारा है। मैंने पहले इसे अपने नाम के साथ ब्लाग में जोड़ा पर चिट्ठाजगत वालों ने उसे पकड़कर लिंक कर लिया तो मैंने सोचा कि इसका टैग ही बना देते हैं। फिर अब उसे टैग बना लिया। टैगों में संबंद्ध विषय से संबंधित जानकारी होना चाहिए यह बात ठीक है पर हम उसे विस्तार देकर अपने पाठक तक पहुंचने का प्रयास न करें यह कोई नियम नहीं है। इस पर फिर कभी।

कुल मिलाकर टैग वह मार्ग है जो आपको पाठकों तक पहुंचा सकता है। ब्लागस्पाट का मुझे पता नहीं पर वर्डप्रेस में मैंने यही अनुभव किया है। आखिरी बात यह कि मैंने यह आलेख एक प्रयोक्ता की तरह लिखा है और हो सकता है मेरा और आपका अनुभव मेल न खाये। फिर ब्लाग स्पाट के ब्लाग अभी वैसे परिणाम नहीं दे पाये जैसे अपेक्षित थे। कुल मिलाकर यह मेरा अनुभव है जिसे मैंने प्रयोक्ता के रूप में पाया और इससे अधिक तो मुझ कुछ आता भी नहीं। कुछ खोजबीन चल रही है और यही टैग उसके लिये काम कर रहे हैं। शेष फिर कभी।
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यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक बापू कहिन’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका
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