छोटी सफलता पर क्या इतराना-संपादकीय एवं कविता


यह ब्लाग 25 हजार की पाठक संख्या पार कर गया। यह कोई बड़ी सफलता नहीं है खासतौर से यह देखते हुए कि मेरे दो अन्य ब्लाग/पत्रिकाऐं यह संख्या पहले ही कर चुके हैं और इसके अलावा हिंदी ब्लाग जगत के अनेक ब्लाग इससे कई गुना अधिक संख्या पहले ही पार कर चुके हैं। फिर भी आजकल के प्रचार के युग में यह जरूरी है कि कभी कभी आत्म प्रचार भी किया जाये खासतौर से जब आप इसके लिये कोई व्यय करने की स्थिति में नहीं है। वैसे आजकल मौसम इतना खराब चल रहा है कि कहीं भी बैठना कठिन है और मेरे हालत ऐसे हैं कि बड़ी मुश्किल से लिख पा रहा हूं। इस अवसर पर एक कविता लिखने का मन है सो प्रस्तुत है।

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पास से गुजरते हुई हवा के झौंके से
गुलाब के पेड़ ने कहा
‘ओ हवा, बड़ी बहुत दूर से बहती हुई आई हो
कुछ देर मेरे पास ठहर जाना
मेरे ऊपर खड़े फूलों की
सुगंध को भी अपने साथ ले जाना
करो इनका स्पर्श
होगा तुम्हें भी बहुत हर्ष
इनका अस्तित्व मेरी है कामयाबी
इनकी कथा सभी जगह सुनाना
जहंा भी हो तुम्हारा जाना’

हवा के झौंके ने हंसते हुए कहा
‘बहुत अच्छे लगते हैं फूल
पर इनके साथ कांटे भी हैं
यह कैसे जायेंगे भूल
अगर फूलों का अस्तित्व तुम्हारी कामयाबी है
तो कांटों का यहां रहना नाकामी के
अलावा और क्या हो सकता है
तुम्हारे इन फूलों को सब तोड़ जाते हैं
पर कांटे चुभने से घबड़ाते हैं
पर यह कांटे ही
फूल का बनते हैं सहारा
वरना बन जाता यह बिचारा
इंसान भी वही जश्न मनाते हैं
जों अपनी नाकामी छिपाते हैं
तुमने भी फलों का किया बखान
पर कांटों का नहीं किया बयान
हम तो ठहरे हवा के झौंके
बहते चले जायेंगे
अच्छे बुरे हल हाल को
स्पर्श करते जायेंगे
पर रुकना नहीं काम हमारा
चलते रहकर इस संसार की नदी में
जीवन की धारा सदैव है बहाना
सुगंध और दुर्गंध
सुख और दुख
इसका मतलब हमने कभी नहीं जाना
तुम भी अपनी कामयाबी पर
इतना न इतराओ
कि नाकामी दिखाकर कोई तुम्हें
नीचा दिखाये
खड़े रहना अपनी ही जमीन पर
जिंदगी है जब तक तुम्हारी
इन कांटों को भी सहलाते रहना
यह भी तुम्हारे पहरेदार है
इनके बिना मुश्किल होगा तुम्हें अपने को बचाना

…………………………………………….
अभी निष्कर्ष और विश्लेषण प्रस्तुत करने का समय नहीं है, पर कुछ लोग हैं जो इनमें रुचि रखते हैं इसलिये ही इस विशेष अवसर पर यह संपादकीय एवं कविता प्रस्तुत है। मैं यह कभी नहीं भूल सकता कि अनेक ब्लाग लेखक मित्रों ने मुझे हमेशा लिखने की प्रेरणा दी है। कई बातें उनसे सीखकर ही आजकल मैं इतना लिख पाता हूं। बस एक ही इच्छा रहती है कि हिंदी अंतर्जाल पर पढ़ी जाये और सभी ब्लाग लेखक एक ऐसा मुकान हासिल करें जिससे उनकी विश्व में प्रतिष्ठा बढ़े।
वैसे यह ब्लाग अपने सहयोगी ब्लाग/पत्रिकाओं से पिछड़ रहा है पर उसका कारण मेरे द्वारा इस पर कम लिखना ही है। हालांकि यह मेरे द्वारा बनाया गया सबसे पहला ब्लाग है और उस समय पता ही नहीं था कि जाना कहां है? अब जो अनुभव और जानकारी प्राप्त हुई है वह सब सहृदय ब्लाग लेखकों के सहयोग से ही संभव है और कम से कम मैं अपने आपको इस दृष्टि से भाग्यशाली समझाता हूं।
ऐसे सफलताओं पर अधिक प्रसन्न होने की जरूरत इसलिये भी नहीं है कि क्योंकि लक्ष्य बहुत लंबा है। सबसे अच्छी बात जो लगती है कि मित्र ब्लाग लेखकों द्वारा निष्काम भाव से सहयोग और आलोचकों द्वारा अपनी आलोचना से अधिक अच्छा लिखने की प्रेरणा देना। इस अवसर अपने परिचित और अपरिचित ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों और आलोचकों का आभार प्रदर्शित करते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है।

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यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक बापू कहिन’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका

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टिप्पणियाँ

  • संगीता पुरी  On सितम्बर 4, 2008 at 22:53

    बहुत बहुत बधाई। आशा ही नहीं , पूर्ण विश्वास है कि आपके विचारों और भावों को इसी तरह आगे भी पढत्रने का मौका मिलता रहेगा।

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