हिन्दी, हिन्दू और हिंदुत्व:नए सन्दर्भों में चर्चा (१)


हिन्दी,हिन्दू और हिंदुत्व शब्दों में जो आकर्षण है उसका कारण कोई उनकी कानों को सुनाई देने वाली ध्वनि नहीं बल्कि वह भाव जो उनके साथ जुड़ा है। यह भाव हिन्दी भाषा के अध्यात्मिक, हिन्दू व्यक्ति के ज्ञानी,और हिंदुत्व के दृढ़ आचरण होने से उत्पन्न होता है। हिन्दी भाषा के विकास, हिन्दू के उद्धार और हिंदुत्व के प्रचार का कीर्तन सुनते हुए बरसों हो गये और इनका प्रभाव बढ़ता भी जा रहा है पर यह उन व्यवसायिक कीर्तनकारों की वजह से नहीं बल्कि हिन्दी भाषा,हिन्दू व्यक्तित्व और हिंदुत्व के आचरण की प्रमाणिकता की वजह से है।

स्वतंत्रता के तत्काल बाद अंग्रेजों के जाते ही उनके द्वारा ही निर्मित शिक्षा पद्धति से शिक्षित महानुभावों को इस देश के लोगों को वैसे ही भेड़ की तरह भीड़ में शामिल करने का भूत सवार हुआ जैसे अंग्रेज करते थे। बस! जिसको जैसा विचार मिला वही उसके नाम पर पत्थर लगाता गया। बाद में उनकी आगे की पीढियों ने उन्हीं पत्थरों को पुजवाते हुए इस समाज पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। पत्थरों से आगे कुछ नहीं हो सकता था। वहां से कोई नए विचार की धारा प्रवाहित होकर नहीं आ सकती थी। नारे और वाद हमेशा लोगों को आकर्षित करने के लिए बनाए जाते हैं। उनमें कोई गहरा विचार या चिंत्तन ढूँढना अपने आप को धोखा देना है। फिर अंग्रेजों द्वारा ही बनायी गयी आदमी को गुलाम बनाने वाली शिक्षा से पढ़े हुए सभी लोगों से यह आशा भी नहीं की जा सकती कि वह अपने अन्दर कोई स्वतन्त्र विचार कर सकें। फिर भी जिन लोगों ने इस शिक्षा पद्धति को अक्षरज्ञान मानते हुए अपने प्राचीन धार्मिक तथा साहित्यक पुस्तकों को भक्ति और ज्ञान की दृष्टि से पढा वह ज्ञानी बने पर उन्होंने उसका व्यापार नहीं किया इसलिए लोगों तक उनकी बात पहुंची नहीं।
कुछ लोग तेजतर्रार थे उन्होंने इस ज्ञान को तोते की तरह रट कर उसे बेचना शुरू कर दिया। वह न तो अर्थ समझे न उनमें वह भाव आया पर चूंकि उन्होंने हिन्दी,हिन्दू और हिंदुत्व को उद्धार और प्रचार को अपना व्यवसाय बनाया तो फिर ऐसी सजावट भी की जिससे भक्त उनके यहाँ ग्राहक बन कर आये। यह हुआ भी! प्रकाशन और संचार माध्यमों में इन व्यापारियों की पकड़ हैं इसलिए वह भी इनके साथ हो जाते हैं। नित नयी परिभाषाएं और शब्द गढ़ जाते हैं।

कई किश्तों में समाप्त होने वाले इस आलेख में हिन्दी भाषा,हिन्दू व्यक्ति और हिंदुत्व के रूप में आचरण पर विचार किया जायेगा। इससे पहले यह तय कर लें कि आखिर उनकी संक्षिप्त परिभाषा या स्वरूप क्या है।

हिन्दी भाषा-संस्कृत के बाद विश्व की एकमात्र ऐसी भाषा है जो आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण है। दिलचस्प बात यह है कि यह एकमात्र ऐसी भाषा है जो आध्यात्म ज्ञान धारण करने में सहज भाव का अनुभव करा सकती है। भले ही संस्कृत से ज्ञान से किसी अन्य भाषा में अनुवाद कर उसे प्रस्तुत किया जाये पर वह प्रभावी नहीं हो सकता जब तक उसे हिन्दी में न पढा जाए। इसलिए जिन लोगों को अध्यात्म ज्ञान के साथ जीवन व्यतीत करना है उनको यह भाषा पढ़नी ही होगी। इसमें जो भाव है वह सहज है और अध्यात्मिक ज्ञान के लिए वह आवश्यक है। जिस तरह विश्व में भौतिकता का प्रभाव बढा है वैसे ही लोगों में मानसिक संताप भी है। वह उससे बचने के लिए अध्यात्म में अपनी शांति ढूंढ रहे है और इसलिए धीरे धीरे हिन्दी का प्रचार स्वत: बढेगा। अंतर्जाल पर भी पूंजीपति प्रभावी हैं पर इसके बावजूद यहाँ स्वतंत्र लेखन की धारा बहती रहेगी। इसलिए स्वतन्त्र सोच वाले उस ज्ञान के साथ आगे बढ़ेंगे जो ज्ञान और कल्याण का व्यापार करने वालों की पास ही नहीं है तो दूसरे को बेचेंगे क्या? अत: कालांतर में अंतर्जाल पर हिन्दी अपने श्रेष्ठतम रूप में आगे आयेगी। हिंदी भाषा के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि यह किसी एक धर्म, प्रदेश या देश की भाषा नहीं है। इसका प्रचार पूरे विश्व में स्वत: हो रहा है। भारत में तो हर धर्म और प्रांत का आदमी इसे अपना चुका है।

हिन्दू व्यक्ति-मानसिक,आध्यात्मिक और आचरण की दृष्टि से परिपूर्ण,दूसरे पर निष्प्रयोजन दया करने वाला,भगवान की निष्काम भक्ति में तल्लीन,विज्ञान के नित नए रूपों में जीवन की सहजता को अनुभव करते हुए उसके साथ जुड़ा हुआ, अपने मन, बुद्धि और विचारों की विकारों को योगासन और ध्यान द्वारा प्रतिदिन बाहर विसर्जित करने में सक्षम,समय समय पर वातावरण और पर्यावरण की शुद्धता के लिए यज्ञ हवन में संलिप्त, त्याग में ही प्रसन्न रहने वाला, लालच और लोभ रहित,तत्व ज्ञान धारी और हर स्थिति में सभी के प्रति समदर्शिता का भाव रखने वाला व्यक्ति सच्चा हिन्दू है। अहिंसा और ज्ञान हिंदू के ऐसे अस्त्र-शस्त्र हैं जिसस वह अपने विरोधियों को परास्त करता है।

हिंदुत्व-हिन्दू व्यक्ति के रूप में किये गए कार्य ही हिंदुत्व की पहचान होते हैं। हिंदुत्व की सबसे बड़ी पहचान यह है कि विरोधी या शत्रु को हिंसा से नहीं बल्कि बुद्धि और ज्ञान की शक्ति से परास्त किया जाए। इसके लिये उसे हिंसा करने की आव्श्यकता ही नहीं होती बल्कि वह हालातों पर बौद्धिक चातुर्य से विजय पा लेता है। देखिए कितने हमले इस देश पर हुए। इसे लूटा गया। यहाँ तमाम तरह के प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराये गए, पर उस ज्ञान को कोई नहीं मिटा पाया जिसके वजह से इस देश को आध्यात्म गुरु कहा जाता है। यही पहचान है हिंदुत्व की शक्ति की। हिंदुत्व का एक अर्थ आध्यात्मिक ज्ञान भी है जो सत्य रूप है। आगे पीछे इसे बढ़ना ही है।

यह कोई अंतिम परिभाषा नहीं। आलेख बढा न हों इसलिए यह तात्कालिक रूप से लिखीं गयीं हैं। आगे हम और भी चर्चा करेंगे। यह जानने का प्रयास करेंगे कि आखिर इसके नाम पर पाखण्ड कैसे बिक रहा है। यह बताने का प्रयास भी करेंगे कि इसे बदनाम करने वाले भी कैसे कैसे स्वांग रचते हैं।ऐसी एक नहीं कई घटनाएँ जब लोगों ने अपने हिसाब से अपने विचार बदले या कहें कि उन्होंने अपने नारे और वाद बदले। कभी धर्म के भले के नाम पर आन्दोलन चलाया तो कभी भाषा की रक्षा का ठेका लिया। कहते हैं अपने को हिंदुत्व का प्रचारक पर उनके आचरण उसके अनुसार बिलकुल नहीं है।
यह आलेख उनकी आलोचना पर नहीं लिखा जा रहा है बल्कि यह बताने के लिये लिखा जा रहा है कि एक हिंदी भाषी हिंदू के रूप में हमारा आचरण ही हिंदुत्व की पहचान होती है और उसे समझ लेना चाहिये। आने वाले समय में कई ऐसी घटनाएँ होनी वाली हैं जिससे सामान्य भक्त को मानसिक कष्ट हो सकता है। इसी कारण उनको अपने अध्यात्म ज्ञान को जाग्रत कर लेना चाहिए। आखिर इसकी आवश्यकता क्यों अनुभव हुई? देखा गया है कि सनातन धर्मी-हिन्दू धर्म-अपने धर्म की प्रशंसा तो करते हैं पर उसके समर्थन में उनके तर्क केवल विश्वास का सम्मान करने के आग्रह तक ही सीमित रहते हैं। उसी तरह जब कोई सनातन धर्म की आलोचना करता है तो लड़ने को दौड़ पड़ते हैं। यह अज्ञानता का परिणाम है।
इसका एक उदाहरण एक अन्य धर्मी चैनल पर देखने को मिला। वहां एक अन्य धर्म के विद्वान वेदों की उन ऋचाओं को वहां बैठे लोगों को सुनाकर सनातन धर्म की आलोचना कर रहे थे तब वहां बैठे कुछ लोग उन पर गुस्सा हो रहे थे। ऋचाएं भी वह जिनकी आलोचना सुनते हुए बरसों हो गये हैं। लोगों का गुस्सा देखकर वह विद्वान मुस्करा रहे थे। अगर वहां कोई ज्ञानी होता तो उनको छठी का दूध याद दिला देता, मगर जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि ज्ञान और कल्याण का व्यापार करने वाले समाज के शिखर पर जाकर बैठे हैं और समाज ने भी एक तरह से मौन स्वीकृति दे दी है। इसका कारण ज्ञान का अभाव है। ऐसे ही लोग अपने अल्पज्ञान को साथ लेकर बहस करने पहुंचते हैं और जब आलोचना होती है तो तर्क देने की बजाय क्रोध का प्रदर्शन कर अपने को धर्म का ठेकेदार साबित करते हैं। ज्ञानी की सबसे बड़ी पहचान है कि वह वाद विवाद में कभी उतेजित नहीं होता। उत्तेजित होना अज्ञानता का प्रमाण है। अपने अध्यात्म ज्ञान के मूल तत्वों के बारे में अधिक जानकारी न होने से वह न तो उसकी प्रशंसा कर पाते न आलोचना का प्रतिवाद कर पाते हैं।

इस आलेख का उद्देश्य किसी धर्म का प्रचार नहीं बल्कि धर्म की नाम फैलाए जा रहे भ्रम का प्रतिकार करने के साथ सत्संग की दृष्टि से सत्य का अन्वेषण करना है, जो लिखते लिखते ही प्राप्त होगा। इन पंक्तियों का लेखक कोई सिद्ध या ज्ञानी नहीं बल्कि एक सामान्य इंसान है जिसे भारतीय अध्यात्म में आस्था है। इसलिए अगर कहीं कोई त्रुटि हो जाए तो उसे अनदेखा करें। यहाँ किसी के विश्वास का खंडन नहीं करना बल्कि अपने विश्वास की चर्चा करना है। बिना किसी योजना के लिखे जा रहे इस लेख के लंबे चलने की संभावना है और यह विवादास्पद टिप्पणियाँ न रखें तो ही अच्छा होगा। ऐसी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है जिससे लेखक और पाठक दोनों को ज्ञान मिले। वह ज्ञान जो हमारे अक्षुणण अध्यात्म की सबसे बड़ी तात्कत है। शेष इसी ब्लॉग/पत्रिका पर जारी रहेगा। इस आलेख को प्रस्तावना ही समझें क्योंकि आगे इस पर व्यापक रूप से लिखना पर पढ़ना है।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दयोग सारथी-पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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लेखक,कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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