संवेदनाओं के मर जाने पर शोक-व्यंग्य


अपने  देश के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग है जो हमेशा हर दुर्घटना के प्रति समाज की संवेदनहीनता को उबार कर सामने ले आता है-देखिये जनाब! यह दुर्घटना हुई पर लोग हैं कि इस तरफ ध्यान नहीं दे रहे, या देखिये सभी लोग स्वार्थी हो गये हैं और देश में कहीं सूखा, अकाल या बीमारी का प्रकोप है तो कहीं बमकांड और अग्निकांड की वजह से लोग मरे पर लोग अपने कामों में वैसे ही व्यस्त थे जैसे पहले थे। 
ऐसे लोगों का उद्देश्य भले ही अपने को संवेदनशील साबित करना हो पर वह होते नहीं बल्कि उनको लिखने या बोलने के लिये कोई विषय नहीं होता तो वह एक चालू विषय उठा लेना होता है। ‘संवेदनायें मर गयी हैं’ इस विषय पर मैं भी तब कोई कविता चिपका देता हूं जब खालीपीली बैठे लिखने का ख्याल आ जाता है क्योंकि आखिर अपने लिखने पढ़ने का शुरुआती दौर इन्हीं लोगों के साथ गुजरा है जो केवल समाज की संवेदनहीनता पर ही विचार करते हैं-यह आदत बहुत प्रयास करने पर भी नहीं जा पाती। हालांकि समाज की संवेदनायें एक विषय है पर धरातल पर इसका क्या स्वरूप है कोई नहीं जानता।

इस प्रसंग पर लिखते हुए एक दिलचस्प फोटो का विचार आया जो एक ब्लागर मित्र ने भेजा था। हमारे यह मित्र ब्लागर उत्साही है और ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब  उनकी तरफ से ऐसे दिलचस्प फोटो न आते हों। बात उस फोटो की करें।  कहीं बाढ़ आयी हुई थी।  एक मकान मेंें परिवार के  सभी सदस्य  अपने कमरे में रखे सोफों पर बैठकर टीवी पर अपने मनोरंजन कार्यक्रम देख रहे थे सिवाय उस गृहस्वामी के जो मकान के बाहर खड़ा अंदर मौजूद पानी को बाहर निकालने की चिंता में मग्न था।  परिवार के अन्य सदस्यों को कहीं दूसरी जगह बाढ़ आने की चिंता क्या होती उनके स्वयं के घटनों तक पानी था।  गृहस्वामी अंदर की तरफ झांक रहा था क्योंकि ऐसा लगता था कि परिवार के अन्य सदस्यों ने यह मान लिया था कि अगर मुखिया कहलाने को गौरव उसके पास  है तो बाहर खड़ा वह  शख्स स्वयं ही इसका बाढ़ के पानी को किसी भी तरह बाहर निकालकर   अपनी  भूमिका निभायेगा।

उस फोटो को देखकर मुझे हंसी आयी।  भला बाढ़ पर कोई हंसने जैसी बात हो सकती है? अरे, उस पर तो दर्द भरे लेख, समाचार और कवितायें ही लिखी जानी चाहिये। मगर फोटो! जब सारे प्रचार माध्यम दर्दनाक फोटो छापते हों तब मित्र ब्लागर  एकदम अलग और असाधारण फोटो भेजकर जो कहना चाहते थे वह तो कोई भी समझ सकता है कि ऊंचाई पर होने के बावजूद जिस मकान में सोफे में बैठने की जगह से एक इंच नीचे पानी भरा हो और लोग बैठकर आराम से टीवी देख रहे हों तब हंसे कि दुःख व्यक्त करें।  हमारे इन मित्र ब्लागर की सक्रियता वाकई बहुत लुभावनी है।  (वैसे जिन लोगों को अलग से कुछ फोटो वगैरह देखने की इच्छा हो तो वहा कमेंट में अपना ईमेल पता छोड़ दें तब मैं उनको भेज दूंगा। हालांकि उनके मुताबिक वह भी इंटरनेट से ही यही कलेक्ट करते हैं पर अगर आसानी से उपलब्ध हो तो बुराई क्या है?)

बहरहाल बात करें  समाज की संवेदनाओं की! लगता है कि अंग्रेज अपना काम कर गये। लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति अब अपना रंग दिखाने लगी है और यही कारण है कि लोग जिस समाज में रह रहे हैं उसके ही मूल स्वभाव को नहीं समझ पाते। लिखते हैं समाज पर उसे परे होकर-तब उन्हें लगता है कि इस समाज से परे दिखना जरूरी है क्योंकि तब उसकी बुराईयों से अपने को परे दिखा पायेंगे।

समाज के संवेदनशील या असंवेदनशील  होने को विषय आज तक विवादास्पद है।  अगर एक तरह से देखें तो समाज की कोई संवेदना हो भी नहीं सकती क्योंकि वह तो प्रत्येक जीव के स्वभाव का भाग है।  समाज कोई पैदा नहीं होता व्यक्ति पैदा होता  और मरता है। फिर संवेदनाओं को प्रकट करने से क्या लाभ? किसी दुर्घटना में अगर किसी की मृत्यु हो जाये तो उससे भला क्या कोई संवेदना जतायेगा क्योंकि समस्या तो उसके आश्रितों के सामने आने वाली होती है। उनका काम केवल संवेदना से नहीं बल्कि सहायता से भी चलता है।  खालीपीली शाब्दिक संवेदना तो दिखावे की होती है।  पीडि़तों के निकट जो लोग होते हैं उनके कुछ दयालू होते हैं।  समाज की संवेदनाओं पर विचार करने  वाले इस बात को याद रखें कि समाज के बुरे लोग रहेंेंगे तो भले भी रहेंगे।  सभी लुटेरे नहीं होंगे वहां कुछ दानी भी होंगें। 
अकाल,बाढ़,अग्निकांड,बमकांड,सांप्रदायिक  या सामूहिक हत्यायें जैसे हादसों को यह देश झेलने का अभ्यस्त हो चुका है। क्या यह आज हो रहा है? क्या यह पहले नहीं हुआ।  इस देश में जब रियासतें थी तब उनकी जंगों के इतिहास को भला कौन भूल सकता है। छोटी छोटी बातों पर युद्ध और खून खराबे होते थे। लोग मरते थे। अकाल और बाढ़ भी बहुत बार आयी होगी तब क्या लोगों ने उसका मुकाबला नहीं किया होगा? अनेक भारत विरोधी विदेशी आज भी कहते हैं कि भारत में अंधविश्वास और रूढि़वादिता अधिक है पर वह अपने देशों में निजी दानदाताओं द्वारा बनायी गयी इमारतें नहंी दिखा सकते। वह दिखा सकते हैं तो बस अपने यहां अपने राजाओं के महल। जहां तक विदेशी ज्ञानी विद्वानों का सवाल है तो वह आज भी मानते हैं कि भारत के लोग संक्रमण काल मेंे एक दूसरे के जितना काम आते हैं उतना अन्य कहीं नहीं। यही कारण है कि यह देश अनेक संकटों से उबर कर आता है-हालांकि इसका कारण यह भी है कि अपने देश पर प्राकृतिक की कृपा कम नहीं रहीं इसका प्रमाण वह  अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट है जिसमें कहा गया है कि जितना भूजल भारत में उपलब्ध है अन्यत्र कहीं नहीं।
फिर भारतीय अध्यात्म कहता है कि मरने वाले की चिंता मत करो जो जीवित है उसकी सहायता के लिये तत्पर रहो और इस देश के लोग तत्पर रहे हैं।  अपने समाज की मूल अवधारणाओं से अलग सोचने वाले बुद्धिजीवी केवल मृतकों के प्रति संवेदनायें जताते है जीवित के लिये उनके मन में क्या स्थान है यह थोड़ा शोध का विषय है। जन्म और मरण दिन मनाने की परंपराओं की चर्चा देश के प्राचीन ग्रंथों में कतई नहीं है। किस्से पर किस्सा निकल आता है।  भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने संपूर्ण देश को नयी दिशायें दीं (हालांकि उसका स्वरूप आज के स्वस्प से बड़ा था) और तमाम तरह के आदर्श स्थापित किये पर कभी उन्होंने अपना जन्म दिन मनाया हो इसकी चर्चा नहीं मिलती पर उनके नाम लेकर भारतीय समाज में कथित धर्मरक्षा में लगे अनेक लोग अपने जन्म दिन अपने जीवित रहते हुए ही मनवाते हैं-हालांकि यह विषय अलग से चर्चा का विषय है। 
सच बात तो यह है कि  इस देश के आम लोग भावुक होते हैं। जानते सभी हैं पर सोचते हैं कि कहंकर भल किसी से बैर क्यों लिया जाये? फिर संतों की आलोचना में वह अपना समय नष्ट करने की बजाय भक्ति में लगाना अच्छा समझते हैं।  किसी पर विपत्ति आ जाये तो जिसके मन में आ जाये और  अगर पहुंच सकता है तो मदद करने चला जाता है पर वह कहीं जाकर गाता नहीं है। उसी तरह  जो नहीं जाता या दूर होने के कारण नहीं पहुंच पाता वह जानता है कि शाब्दिक संवेदनाओं से से किसी का काम नहीं चलने वाला। जो इसमें समाज की संवेदनहीनता ढूंढते हैं तो केवल अज्ञानता ही कहा जा सकता है।

बात उस फोटो की करें। अंदर टीवी देख रहे सभी सदस्यों के चेहरे पर हंसी और प्रसन्नता थी पर अंदर की तरफ ताक रहे उस गृहस्वामी के चेहरे पर चिंता के भाव साफ दिखा रहे थे कि वह तनाव  में था क्योंकि मुखिया होने के कारण बाहर से आये इस संकट को निकालने का जिम्मा उसे लेना ही था और उसके लिये संवेदनाओं के रूप में बस एक ही शब्द सही था ‘‘ एक  बिचारा, जिम्मेदारी का मारा’’। उस फोटो को अन्य लोगों ने भी देखा होगा पर शायद ही उसके बारे में किसी ने ऐसी राय बनायी हो।
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लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
<a href=”http://rajlekh.wordpress.com”>1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a>
<a href=”http://dpkraj.blogspot.com”>2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a>
<a href=”http://teradipak.blogspot.com”>3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a>
<a href=”http://anantraj.blogspot.com”>4.अनंत शब्दयोग</a>
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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