प्रतियोगिता से कहीं अधिक वजन जंग में आता है-लघु व्यंग्य


अपने वाद्ययंत्रों के साथ सजधजकर वह घर से बाहर निकला और अपनी मां से बोला-‘‘मां, आशीर्वाद दो जंग पर जा रहा हूं।’
मां घबड़ा गयी और बोली-‘बेटा, मैंने तुम्हें तो बड़ा आदमी बनने का सपना देखा था । भला तुम फौज में कब भर्ती हो गये? मुझे बताया ही नहीं। हाय! यह तूने क्या किया? बेटा जंग में अपना ख्याल रखना!’
बेटे ने कहा-‘तुम क्या बात करती हो? मैं तो सुरों की जंग में जा रहा हूं। अंग्रेजी में उसे कांपटीनशन कहते हैं।’
मां खुश हो गयी और बोली-‘विजयी भव! पर भला सुरों की जंग होती है या प्रतियोगिता?’
बेटे ने कहा-‘मां अपने प्रोग्राम को प्रचार में वजन देने के लिये वह प्रतियोगिता को जंग ही कहते हैं और फिर आपस में लड़ाई झगड़ा भी वहां करना पड़ता है। वहां जाना अब खेल नहीं जंग जैसा हो गया है।’
वह घर से निकला और फिर अपनी माशुका से मिलने गया और उससे बोला-‘मैं जंग पर जा रहा हूं। मेरे लौटने तक मेरा इंतजार करना। किसी और के चक्कर में मत पड़ना! यहां मेरे कई दुश्मन इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कब मैं इस शहर से निकलूं तो मेरे प्रेम पर डाका डालें।’

माशुका घबड़ा गयी और बोली-‘देखो शहीद मत हो जाना। बचते बचाते लड़ना। मेरे को तुम्हारी चिंता लगी रहेगी। अगर तुम शहीद हो गये तो तुम्हारे दुश्मन अपने प्रेम पत्र लेकर हाल ही चले आयेंगे। उनका मुकाबला मुझसे नहीं होगा और मुझे भी यह शहर छोड़कर अपने शहर वापस जाना पड़ेगा। वैसे तुम फौज में भर्ती हो गये यह बात मेरे माता पिता को शायद पसंद नहीं आयेगी। जब उनको पता लगेगा तो मुझे यहां से वापस ले जायेंगे। इसलिये कह नहीं सकती कि तुम्हारे आने पर मैं मिलूंगी नहीं।’
उसने कहा-‘मैं सीमा पर होने वाली जंग में नहीं बल्कि सुरों की जंग मे जा रहा हूं। अगर जीतता रहा तो कुछ दिन लग जायेंगे।’

माशुका खुश हो गयी और बोली-अरे यह कहो न कि सिंगिंग कांपटीशन में जा रहा हूं। अरे, तुुम प्रोगाम का नाम बताना तो अपने परिवार वालों को बताऊंगी तो वह भी देखेंगे। हां, पर किसी प्रसिद्ध चैनल पर आना चाहिये। हल्के फुल्के चैनल पर होगा तो फिर बेकार है। हां, पर देखो यह जंग का नाम मत लिया करो। मुझे डर लगता है।’
उसने कहा-‘अरे, आजकल तो गीत संगीत प्रतियोगिता को जंग कहा जाने लगा है। लोग समझते हैं यही जंग है। अगर किसी से कहूं कि प्रतियोगिता में जा रहा हूंे तो बात में वजन नहीं आता इसलिये ‘जंग’ शब्द लगाता हूं। प्रतियोगिता तो ऐसा लगता है जैसे कि कोई पांच वर्ष का बच्चा चित्रकला प्रतियागिता में जा रहा हो। ‘जंग’ से प्रचार में वजन आता है।’
माशुका ने कहा-‘हां, यह बात ठीक लगती है। तुम यह कांपटीशन से जीतकर लौटोगे तो मैं तुम्हारा स्वागत ऐसा ही करूंगी कि जैसे कि जंग से लौटे बहादूरों का होता है। विजयी भव!
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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