पाठ नंबर 3013-विशेष संपादकीय


अगर चिट्ठाजगत पर दर्ज आंकड़ों को सही मान लिया जाये तो इस लेखक का अंतर्जाल पर यह 3013वां पाठ होना चाहिये। कुछ दिन पहले जब यह पता लगा कि अपने ब्लाग पर लिखे गये पाठों की संख्या पार होने वाली है तब आश्चर्य हुआ था। लिखते लिखते कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कितने पाठ लिख रहा हूं। सच बात तो यह है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति के साधन के रूप में ब्लाग के मिल जाने से निरंतर लिखने की प्रवृत्ति जाग्रत नहीं हुई बल्कि यह पहले से ही थी। अंतर यह था कि पहले एक रजिस्टर पर लिखा करता था अब ब्लागस्पाट के ब्लाग को यही समझकर लिख देता हूं जैसे कि रजिस्टर हो। हां, पहले कहीं से टाईप कर अपनी रचना प्रकाशन के लिये भेजा करता था पर डाक टिकटों पर खर्च किया गया पैसा व्यर्थ जाता रहा। ऐसे में यह सोचा कि शायद ही हम अपना लिखा लोगों तक पहुंचा पायें। पर इंसान जैसा सोचे वैसे ही यह दुनियां नहीं चलती। मेरा अंतर्जाल पर लिखना तो शायद पच्चीस साल पहले ही तय हो गया था जब मैंने फोटो कंपोजिंग पर काम शुरु किया था। उस समय पता नहीं था कि अखबार के दफ्तर में एक प्रशिक्षु के रूप में जो कार्य कर रहा हूं वह कभी अंतर्जाल पर काम आयेगा। यहां आना भी आसान नहंीं था। आने से पहले भी कुछ एक के बाद एक संयोग बने जिसका मार्ग अंतर्जाल पर ले आया। सौ घंटे के फ्री कनेक्शन के साथ कंप्यूटर यह सोचकर खरीदा था कि इससे समाचार पत्र पत्रिकाओं को रचनायें भेजेंगे। इसी दौरान एक पुराने मित्र से परिचय हुआ जिन्होंनें अंतर्जाल पर अपनी रचनायें भेजने के लिये अभिव्यक्ति और अनुभूति पत्रिकाओं के डाक पते की जानकारी मांगी। हमने उसे खोलकर देखा तो पाया कि वह तो केवल ईमेल से ही रचनायें स्वीकार करते हैं। हमने अपने मित्र को बताया पर इसी बीच हमने अपनी रचनायें भेजी। उसी समय हमारी नजर में हिंदी नेस्ट कर एक पत्रिका भी आयी जिसमें हमने अपनी रचनाये भेजीं। अभिव्यक्ति पर नारद फोरम देखकर यह समझ में नहीं आता था कि यह लेखक लोग क्या और किस पर लिख रहे हैं। अक्षरग्राम पर ब्लाग बनाने का प्रयास भी नाकाम रहा। बहुत सारी स्मृतियां दिमाग में है पर यह याद नहीं कि आखिर यह ब्लाग हमारे हाथ आया कैसे?
इतना याद है कि जैसे ही आया था हमने इसे पत्रिका के रूप में उपयोग करने का निर्णय लिया।

अध्यात्म का विषय तो बचपन से रुचिकर रहा है पर विभिन्न विषयों पर कहानियां, व्यंग्य, कवितायें, और लेख लिखना सबसे अच्छा लगा। अंतर्जाल पर आने से पहले चिंतन लिखने पर लोगों में बहुत लोकप्रियता मिली। इससे एक बार व्यंग्य और कहानियां लिखना बंद हो गया था। अंतर्जाल पर आने के बाद मन में दबी सारी भावनाओं को बाहर निकालने का अवसर मिला जिसे गंवाना न ठीक था न संभव क्योंकि लिखने का इतना सहज अभ्यास है कि कहीं भी बैठ जाऊं लिखने का मन होता है। पहले भी कहींं समय या सुविधा नहीं होती तो अपने विचार क्षणिकाओं के रूप में लिख लेता था अब यही काम ब्लाग पर करने लगता हूं। सच बात तो यह है कि फोरमों पर मेरे पाठों की गिनती होती है इसलिये कम कवितायें लिखता हूं। मैंने कुछ नये ब्लाग इसी उद्देश्य से बनाये थे कि उन पर चुपचाप बैठकर लिखूंगा पर चिट्ठाजगत वाले सारे ब्लाग लिंक कर लेते हैं फिर उन पर लिखो तो मित्र लोग पाठों की संख्या देखकर नजर लगा देते हैं कि इतना सारा कैसे लिखते हो। अब यह उनको कैसे समझायें कि क्षणिकाऐं या छोटी कविताऐं लिखने में मुझे अधिक समय नहीं लगता। अगर कृतिदेव को यूनिकोड मेंं बदलने वाला टूल नहीं होता तो सीधे ही ब्लाग स्पाट पर क्षणिका या छोटी कविताये टाईप कर प्रकाशित करते जाते तब शायद उनकी संख्या अधिक होती। अब अपने ही कंप्यूटर पर टाईप कर बाद में टूल से यूनिकोड में अपना पाठ ले जाते हैं जिसमें समय अधिक लग जाता है और इसी कारण कम ही पाठ रह जाते हैं। क्षणिकाओं और कविताओं के बारे में अगर यह कहें कि समय गुजारने के लिये उनका उपयोग बहुत अच्छा है पर उनसे पाठों की संख्या बढ़ने से लोग बाग टोकाटोकी करते हैं।
चिंतन और हास्य व्यंग्य लिखना पसंद है पर उसके लिये समयाभाव लगता है। इसलिये सुबह महापुरुषों के संदेश लिखना शुरु किया था। उसके पीछे मेरा कोर्ई उद्देश्य नहीं था पर 28 मार्च 2008 को कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिल जाने के बाद उनके साथ अपनी व्याख्या जोड़ने का विचार भी किया। जिस समय सुबह लिखता हूं तब मेरा दिमाग एक निर्लिप्त रहता है। दरअसल अध्यात्म विषयों पर लिखने की इच्छा अवश्य होती है पर उससे प्रशंसा पाने की कोई आकांक्षा मेरे हृदय में नहीं होती। न ही इस बात की परवाह होती है कि उसे कितने लोगों ने पढ़ा। अन्य विषयों पर लिखे गये पाठों में इस बात की दिलचस्पी रहती है कि कि उसे कितने लोगों ने पढ़ा या कौनसे विषय लोगों को पंसद हैं।
अब जब आंकलन करता हूं तो लगता है कि अध्यात्मिक संदेशों की वजह से कुछ अधिक पहचान बन गयी है जिसके बारे में कभी सोचा नहीं था। मैं अन्य विषयों पर प्रशंसा और आलोचना पर विचार करता हूं पर अध्यात्मिक विषय पर आलोचनायें मेरी समझ में नहीं आती। मैने किसी को जबरदस्ती तो कहा नहीं है कि इसे पढ़ो पर यह ताज्जुब का विषय है कि मेरे अध्यात्मिक पाठों पर प्रतिकूल और अपमानजनकर टिप्पणियां अधिक मिली हैं। एक तो ऐसा करने वाले अनाम होते हैं इसलिये उनको समझाना मुश्किल है दूसरे मेरी अध्यात्मिक विषयों पर अधिक बहस में दिलचस्पी बिल्कुल नहीं है । अपने ब्लाग पर महापुरुषों के संदेश वाले दो पाठ और तीन कवितायें लिखने का मतलब तो यही समझना चाहिये कि मैंने उस दिन कुछ नहीं लिखा।

आखिरी बात यह है कि मेरा लक्ष्य अपनी बात लिखना है और पढ़ने वाले की उसमें रुचि है या नहीं इस पर विचार करना दिमाग पर अनावश्यक बोझ उठाना लगता है। मैंने इसलिये अपने वर्डप्रेस के ब्लाग ब्लागवाणी से हटवा लिये कि ब्लाग लेखकों के समक्ष पाठों को दोहराव सामने न आये। ब्लाग स्पाट के ब्लाग डायरी और वर्डप्रेस के पत्रिका की तरह लगते हैं। इसलिये अपने पाठ वहां दोबारा रखता हूं। प्रसंगवश मेरा यह ब्लाग दीपकबापू कहिन जो मेर सबसे पहला ब्लाग है तीस हजार की संख्या पार कर गया है और इस पर यह लिखा गया यह विशेष संपादकीय ब्लागवाणी पर दिखाई नहीं देगा क्योंकि यह ब्लाग वहां नहीं दिखता। हां इधर यह भी सोच रहा हूं कि क्यों न वर्डप्रेस भी अब मूल रचनायें लिखना प्रारंभ की जायें क्योंकि ब्लाग स्पाट से यहां लाने से अच्छा है कि यहीं लिखा जाये क्योंकि जितना समय लिखने में लगता है उतना ही लाने में भी लग जाता है। इस अवसर पर बस इतना ही।

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