बुत सम्मलेन में एक सवाल-लघु कथा


वह विशेष बुत अपना भाषाण दे रहा था। उसका विषय था समाज की समस्यायें और उनका हल। उसने अपना भाषण समाप्त किया। सामने बैठी आम बुतों की भीड़ ने तालियां बजाईं। उसने अपना भाषण समाप्त किया और फिर कहा-‘अगर किसी को मेरी बात पर कोई शक हो तो अपना प्रश्न बेहिचक पूछ सकते हैं।’
भीड में बैठे समान्य बुत खामोश रहे पर एक ने कहा-‘आप यह बतायें कि मेरे घर में पानी की तंगी हमेशा रहती है। आपने कहा था कि पानी का संचय करें और इसके लिये पेड़ पौधे भी लगायें। मेरे घर के बाहर सारी जमीन पक्की है तो बाहर आंगन में खुदाई करवा कर कच्चा करवा दूं तो ठीक रहेगा।’

उस विशेष बुत ने कहा-‘यहां हम समाज की समस्याओं के हल के लिये एकत्रित हुए हैं न कि निजी विषयों पर चर्चा के लिये। फिर भी जवाब देता हूं कि किसी विशेषज्ञ से चर्चा कर फिर ऐसा करें।’
वह विशेष बुत उठकर चला गया। इधर सारे आम बुत उस प्रश्नकर्ता बुत को ऐसे देखा जैसे कि वह कोई अजूबा हो।’
उसका मित्र बुत उसके पास आया और बोला-‘क्या जरूरत थी प्रश्न करने की?’
प्रश्नकर्ता बुत ने कहा-‘पर मेरे प्रश्न पर सभी मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं? क्या प्रश्न करना बुरा है?’
मित्र बुत ने कहा-‘हां, प्रश्न करने का मतलब तुम सोचते हो। इसका मतलब है कि तुम फालतू आदमी हो! आजकल किसे फुरसत है सोचने की जो प्रश्न करे। फिर उनके उत्तर असहज करते हैं क्योंकि उन पर भी सोचना पड़ता है। फिर वह विशेष बुत था और हम उसे सुनने आये थे। उसकी बात सुनना जरूरी था क्योंकि वह विश्ेाष है। प्रश्न करने का अर्थ यह कि तुम आम बुत की बजाय विशेष बनना चाहते हो और भला यह भीड़ कैसे सहन कर सकती है? तुम्हारा प्रश्न ही तुम्हें आम बुतों की भीड़ में विशिष्टता प्रदान कर रहा था और वह उसे नहीं देख सकते। इसलिये तुम्हें हास्याप्रद दृष्टि से देखकर अपनी खिसियाहट निकाल रहे थे।
प्रश्नकर्ता ने कहा-‘पर उस विशेष बुत को इतनी देर सुना! तब तो कुछ नहीं और मैंने प्रश्न किया तो सब दुःखी हो गये।’
मित्र बुत ने कहा-‘हां, यहां बिना सोचे सुनना और सुनाना ही चलता है। प्रश्न करने का मतलब यह है कि तुम सोचते हो। सोचते हुए आदमी को देखकर दूसर चिढ़ जाते हैं क्योंकि वह सोचते नहीं इसलिये प्रश्न करना उन्हें असहज लगता है और गलती से कर भी डालें तो उसके उत्तर से उनको सोचना पड़ता है। यह कठिन प्रक्रिया है और जब हम आराम से हैं तो क्यों उसे अपनायें?’
प्रश्नकर्ता बुत ने पूछा-’पर तुम परेशान क्यों हो?’
मित्र बुत ने कहा-‘इस बात से कि तुम अगर अपने घर के बाहर जमीन कच्ची करवाकर उस पेड़ पौधे लगाओगे तो हो सकता है तुम्हारी लिये अच्छा हो जाये। पानी का संचय भी होगा तो अच्छी वायु भी मिलने लगेगी। तुम्हें देखकर मेरे अंदर भी ऐसा करने का विचार आयेगा तब मुझे खर्च भी करना पड़ेगा और मेहनत भी करना पड़ेगी। अब बताओ, जिंदगी आराम से चल रही है। पानी की कमी है तो कोई बात नहीं! इधर उधर गुस्सा निकालकर व्यक्त तो कर लेते हैं। मगर इतनी सारी मेहनत से तो बचते हैं। सोचने की तकलीफ तो नहीं होती।’
प्रश्नकर्ता बुत ने कहा-‘मगर तुम सोच रहे हो? फिर अच्छा करने की क्यों नहीं सोचते?’
मित्र बुत ने कहा-‘मैं कुछ न करने की सोच रहा हूं, इसमें कोई बुराई नहीं है। इससे दिमाग और शरीर को कोई तकलीफ नहीं होगी, पर तुम्हारा प्रश्न और उसका उत्तर कुछ करने के लिये प्रेरित करता है। बस यही नहीं चाहता! इसलिये कभी ऐसी जगह पर मेरे साथ चलो तो सोचने के लिये प्रेरित करने वाले प्रश्न नहीं उठाया करो क्योंकि फिर उत्तर भी ऐसे ही आयेंगे।’
मित्र बुत चला गया पर प्रश्नकर्ता बुत अभी तक यही सोच रहा था कि‘आखिर उसके एक छोटा प्रश्न करने में बुराई क्या थी?’
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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