हिन्दी भाषा की महिमा-आलेख


हिन्दी भाषा की एक महिमा बड़ी विचित्र है कि उसके अधिकतर लेखक अपनी रचनाओं में यह तो बताते हैं कि कब, कैसे, कहां, क्यों और किसके लिये लिखना चाहिये। वह अपने इस विषय पर इतने शब्द खर्च करते हैं कि उससे एक सही समय पर एक बेहतर गद्य या पद्य रचना कागज या कंप्यूटर पर अपनी साहित्यक अभिव्यक्ति के लिये लिखकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती है। इसे हम कहें तो यह लेखक रचनाधर्मियों के लिये संदेश देते हुए लिखते हैं और पाठकों का इससे कोई मतलब नहीं होता। क्योंकि पाठक हर समय परिस्थतियों के अनुसार शब्द रचनाओं को अखबार या कंप्यूटर पर आत्म संतोष के लिये स्वांत सुखाय पढ़ते हैं। हम सीधी बात करें तो यह कहा जा सकता है कि एक आम पाठक को बेहतर विषय पर एक बेहतर निबंध, कविता, कहानी, और व्यंग्य रचना से ही सरोकार हेाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो लेखकों के लिये ऐसे लिखने वाले बहुत हैं जो उनको पाठक के लिये लिखना सिखा रहे हैें। इसकी वजह से जो लेखक स्वयं भी एक पाठक के रूप में पढ़ते हैं अन्य का लिखा पढ़ा निराश हो जाते हैं।
समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों, सार्वजनिक चर्चाओं और अब अंतर्जाल में हिन्दी भाषा में लेखकों की कमी की शिकायत करने वाले अनेक लेख मिल जायेंगे पर स्वयं पाठक के लिये लिखने वाले कम ही हैं। इसका कारण यह है कि देश के कथित बुद्धिजीवी पाठक के लिये लिखने जैसे श्रमसाध्य काम करने से बचते हुए केवल लेखकों के लिये प्रचार में अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिये ही ऐसी चर्चाये करते हैं। इससे उनको लाभ यह होता है कि वह लेखकों के लेखक बन जाते हैं। कुछ लेखक इस गलतफहमी में रहते हैं कि अगर कोई हमें समझा रहा है तो वह वाकई बड़ा लेखक होगा इसलिये वह उनकी चर्चा अपनी रचनाओं में करते हैं। कुछ उनके चेला होते हैं जो अपने गुरु का उपदेश प्रचार माध्यमों में वितरित करते है। ऐसे में वह आम पाठक के लिये क्यों लिखें? वैसे यह हिन्दी भाषा ही जिसमें ऐसे अनेक लेखक हैं जिन्होंने साहित्य जैसा कुछ न लिखा हो पर साहित्यकार कहलाते हैं। याद रहे एक हिन्दी विद्वान का कहना है कि सामयिक विषयों में लिखना साहित्य नहीं होता पर यह सामयिक विषय पर लिखने वाले ही महान लेखक बन रहे है। फिर अब तो इंटरनेट पर लिखा जा रहा है और उसमें स्वयं टंकित करने जैसा श्रम से भरपूर कार्य करना हरेक के बूते का नहीं है। इसलिये हिन्दी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग अब अखबारों और सेमिनारों में श्रमजीवी ब्लाग लेखकों को यह समझाने में लगेे हैंे कि क्या लिखें। ब्लाग लेखकों के लिये श्रमजीवी शब्द का प्रयोग इसलिये ठीक लगता है क्योंकि उनको यहां लिखने पर कुछ नहीं मिलता। उनकी रोजीरोटी के साधन उनके श्रम साध्य कार्यों से ही चलती है चाहे पूरी देह से या केवल उंगलियों से ही कलम या टाईप कर पूरे किये जाते हैं। ब्लाग लिखने से पैसा नहीं मिलता भले ही बुद्धि लगती हो पर उसे बुद्धिजीवी नही माना जा सकता है।
यह केवल प्रस्तावना थी। असल बात यह है कि एक अंतर्जाल पर एक विद्वान ब्लाग लेखक ने एक महिला लेखक का लेखक प्रकाशित किया जो शायद उनकी छात्रा है-ऐसा बताया गया है। उसमें हिन्दी बुद्धिजीवियों पर जमकर शब्दिक प्रहार किये गये। उनकी कुछ आलोचनाओं का देखें तो वह इस प्रकार हैं-
1-हिन्दी के बुद्धिजीवी ज्ञान के अभाव के कारण ही वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव नहीं बना सकें, जबकि बंगाली सहित कुछ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के रचनाकारों ने यह सफलता पाई।
2. हिन्दी के बुद्धिजीवी केवल भक्त बनाते हैं पर ज्ञान पूर्वक नहीं लिखते।
3. हिन्दी के बुद्धिजीवी अहंकार से सराबोर हैं।
उसमें तमाम तरह की आलोचना थी। हिन्दी बुद्धिजीवियों पर प्रहार करते हुए उस लेख में कोई आपत्ति नहीं थी। अनेक ब्लाग लेखक ऐसी बातें लिख चुके हैं यह अलग बात है कि उस लेख की भाषा और तथ्य बहुत अच्छे थे। मुश्किल यह हुई कि उस लेख की पैरौडी बनाकर हिन्दी ब्लाग लेखकों की तरफ मोड़ने की कोशिश करते एक ब्लाग लेखक ने उसे अपने पाठ के रूप में प्रकाशित किया। बुद्धिजीवी की जगह हिन्दी चिट्ठाकर कम पैरोडीकार ने हिन्दी के ब्लाग लेखकों को हिला दिया। बात यहीं नहीं रुकी। एक चर्चाकार ने ने ब्लाग लेखक को अपने यहां पाठ के रूप में रखा जबकि उनके ब्लाग पर किसी एक ब्लाग की चर्चा नहीं होती। अपनी आलोचना से आहत अनेक ब्लाग लेखकों ने अपना विवेक खो दिया और बेचारगीपूर्ण टिप्पणियां लिखी। पैरोडीकार और चर्चाकार ब्लागरों पर अपना गुस्सा निकाला तो ठीक उस लेख पर भी उन्होंने प्रहार किये जिसमें बुद्धिजीवियों पर लिखा गया था।
ब्लागरों ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि इस तरह की बातें वह स्वयं ही हिन्दी के बुद्धिजीवियों पर करते हैं पर बड़ी चालाकी से उन्हे पैरोडी बनाकर निशाना बनाया गया।
जिन पैरोडीकार और चर्चाकार ने इस लेख को आगे बढ़ाया वह अभी कुछ ही दिन पहले हिन्दी बुद्धिजीवियों के एक मसीहा के पास हिन्दी ब्लाग जगत के लिए आशीवार्द लेने गये थे। श्रमसाध्य और प्रोत्साहन विहीन हिन्दी ब्लाग लेखकों के लिये वहां भी आलोचना के अलावा क्या हो सकता था! उस पर जमकर हंगामा मचा! भारतीय बुद्धिजीवियों ने तब भी हिन्दी ब्लाग जगत पर कम प्रहार नहीं किए। देखा जाये तो पैरोडीकार और चर्चाकार दोनों ही बुद्धिजीवियों के प्रतिनिधि के तौर पर यहां अपने पाठ लिखे रहे थे। उन्होंने हिन्दी ब्लाग जगत पर तमाम तरह के कटाक्ष भी किये। सीधा कहें तो पैरोडीकार और चर्चाकार परंपरागत बुद्धिजीवियों के पैरोकार दिखते रहे हैं और बुद्धिजीवियों पर कटाक्ष किये लेख को उन्होंने चालाकी से हिन्दी ब्लाग जगत पर रखा। इसे कहते हैं कि ‘मियां की जूती मियां के सिर’।
पैरोडी पाठ पर आक्रमण करने वाले एक ब्लाग लेखक तो स्वयं भी उस आशीर्वाद सम्मेलन में गये थे। जहां रात भर उनको होटल में मच्छरों ने काटा था।
अब ब्लाग लेखक बड़ी बिचारागी से पैरोडी पाठ पर पैरोडी कार और चर्चाकार से पूछ रहे हैं कि‘बताईये हिन्दी ब्लाग जगत पर कौन हिन्दी की सेवा कर रहा है कौन नहीं?
इन ब्लाग लेखकों को यह पता हीं नहीं कि इसका जवाब उन्हें नहीं मिलना। पैरेाडीकार और चर्चाकार खुद अपने को हिन्दी का सेवक तो मानेंगे नहीं। दूसरे को मानकर उसे सम्मानित करने वाला कोई नहंी है। दूसरी बात उन्हें समझ लेना चाहिये कि मूल पाठ लिखने वाली लेखिका ने बुद्धिजीवियों पर निशाना साधा था। अगर अगली बार किसी ब्लाग लेखक को ऐसे ही किसी बुद्धिजीवियों के मसीहा से हिन्दी ब्लाग जगत को आशीर्वाद दिलाने का के लिये होने वाले सम्मेलन में जाने का अवसर मिले तो वह उस पाठ की कापी लेजाकर पढ़ कर देखे। तय बात है उसे किसी होटल में मच्छर काटने का अवसर नहीं मिलेगा क्योंकि आयोजक उसे तत्काल वहां से अपने ही खर्च पर वापस लौटने को कह सकते हैं।
यह सच है कि हिन्दी के बुद्धिजीवी और लेखक वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना सके जैसे कि बंगाली भाषा वालों ने बनाये हैं। इसके अन्य कारण हैं जिस पर यहां लिखना ठीक नहीं है पर हिन्दी ब्लाग जगत पर यह नियम लागू नहीं होता।
हिन्दी ब्लाग लेखक चाहें तो जाकर पैरोडीकार और चर्चाकार से यह पूछें कि क्या किसी अन्य भाषा में केाई ऐसा लेखक है जिसके बीस में से पांच ब्लाग गूगल की पेज रैकिंग में चार का अंाकड़ा छूने के साथ ही अन्य भी 14 भी तीन की रैकिंग से नीचे न हों। जिन पांच ब्लाग की गूगल पेज रैकिंग चार हैं उसके नाम हम यही बतला देते हैं।
1. हिन्दी पत्रिका
2.शब्द पत्रिका
3. ईपत्रिका
4.दीपक बापू कहिन
5.शब्दलेख पत्रिका।
बाकी तीन रैकिंग वाले ब्लाग के विवरण की आवश्यकता नहीं है। हां, इस पर अलेक्सा की रैकिंग की बात न करना क्योंकि हम इस मामले में गूगल विश्लेक्षण पर अधिक भरोसा करते हैं। एक बाद दूसरी भी है कि शिनी वेबसाईट पर ईपत्रिका अनेक बार अंग्रेजी ब्लाग पर बढ़त बनाता हुआ शीर्ष क्रम में चार तक पहुंच चुका है। इसका आशय यह है कि देश के हिन्दी ब्लाग जगत को कमतर मत समझें। कम से कम बुद्धिजीवियों वाले लेख की पैरोडी तो न चलायें तभी अच्छा। वैसे ब्लाग लेखकों को अपनी पढ़ने की क्षमता भी विकसित करना चाहिये ताकि किसी प्रकार की पैरोडी उन पर चिपकाये तो बिचारगी से नहीं बल्कि दृढ़तापूर्वक उसका मुकाबला कर सकें। आने वाले समय में हिन्दी की महिमा बढ़ेगी और ऐसी चालाकियों को समझना जरूरी है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

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