संतों का वैभव देखकर विचलित होना व्यर्थ-हिन्दी लेख


भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अनुसार ‘माया संतों की दासी होती है’, पर  अज्ञानी लोग इस बात को नहीं समझ सकते। इसके अलावा जिनका सोच पश्चिमी विचारधाराओं से प्रभावित है तो उनको समझाना अत्यंत कठिन है।
संत दो प्रकार के होते हैं, एक तो वह जो वनों में रहकर अपना जीवन पूरी तरह से सन्यासी की तरह बिताते हैं दूसरे वह जो समाज के बीच में रहते हैं।  जो संत समाज के बीच में रहते हैं वह तमाम तरह के दायित्व-जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य तथा समाज सुधार-भी अपनी सिर पर लेेते हैं। ऐसे में भक्त लोग उनको गुरु दक्षिणा, दान या उपहार भी प्रदान करते हैं जिसका वह उसी समाज के लिये उपयोग करते हैं।
जैसे जैसे देश में धन का वर्चस्व बढ़ रहा है वैसे ही उसका पैमाना संतों के पास भी बढ़ रहा है।  संतों की जो संपत्ति है वह अंततः सार्वजनिक काम में रहती है।  फिर दूसरी बात यह भी है कि उन संतों को अगर समाज के गरीब वर्ग की सहायता करनी है तो उसके लिये धन का होना आवश्यक है। अनेक संत दवाओं का निर्माण कर लोगों को बेचते हैं और उससे लोगों को लाभ भी होता है-अगर ऐसा न होता तो उनके द्वारा बेची जा रही वस्तुओं की बिक्री दिन-ब-दिन बढ़ती न जाती।  अनेक संत पत्रिकायें निकालते हैं और लोग उनको चाव से पढ़ते हैं।
ऐसे में आधुनिक बाजार और उनका प्रचारतंत्र विरोधी हो गया है।  इसका कारण एक तो यह है कि दवाईयों से जहां अनेक एलौपैथी कंपनियों का काम ठप्प हो रहा है वहीं रद्दी साहित्य प्रकाशित करने वाले प्रकाशनों को पाठक नहीं मिल रहे।  दूसरा यह कि उनके प्रवचनों में ढेर सारे श्रोता और भक्त जाते हैं जिससे आधुनिक बाजार और उसका प्रचार तंत्र अपने शिकारी पंजों से दूर पाता है। उसमें युवा वर्ग देखकर आधुनिक बाजार और उसका प्रचार तंत्र चिढ़ता है तो इसलिये क्योंकि उसे तो वैलंटाईन डे के लिये नये उत्पाद बेचने के लिये युवा वर्ग ही मिलता है। फिल्म देखने के लिये माल की महंगी टिकिटें खरीदने के लिये इसी नवधनाढ्य वर्ग के युवाओं की उसे जरूरत है। इसके अलावा क्रिकेट के खिलाड़ियों को महानायक के रूप में स्थािपत करने  भी यही वर्ग उपलब्ध है जिसे इस खेल पर लगे फिक्सिंग के दाग की जानकारी नहीं है।  ऐसे में प्रचारतंत्र अपने हाथ से एक बहुत बड़ा समाज दूर पाता है।
चिकित्सा और दवाईयों की बात करें तो एलौपेथी पर लोगों का विश्वास नहीं रहा।  ढेर सारे टेस्ट में समय और पैसा बरबाद कर चुके लोगों से उनकी दास्तान सुनी जा सकती है। जबकि इन बाबाओं के द्वारा बनायी गयी दवायें बहुत उपयोगी साबित हो रही हैं।  इसके अलावा ‘ऋषि प्रसाद’, अखंड ज्योति, तथा कल्याण जैसी पत्रिकायें समाज में अध्यात्मिक धारा को प्रवाहित किये हुए हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि ‘हमारे देश की सहज योग परंपरा का विस्तार हो रहा है पर आधुनिक बाजार का सारा काम लोगों में असहजता पैदा करना है। वह ऐसी विलासिता के साधनों को सुख कहकर बेच रहे हैं जिनके खराब होने पर आदमी अपने आपको अपाहिज अनुभव करता है।  वह नकली महानायक गढ़ रहे हैं और हालत यह है कि उनको क्रिकेट मैच और फिल्म देखने के लिये अनेक तरह के तनाव पैदा करने पड़ते हैं।  उसे असहज समाज चाहिये जबकि श्रीमद्भागवत गीता में चारों वेदों के सार तत्व के साथ जो सहज योग सरलता से लिखा गया है उसकी इस देश को सबसे अधिक जरूरत है।  इस प्रयास में सबसे आगे रहने वाले संतों में सर्वश्री आसाराम बापू, बाबा रामदेव तथा सुधांशु महाराज जैसे महापुरुष हैं। इन संतों का मायावी सौंदर्य देखकर अनेक विद्वान विचलित हो जाते हैं पर वह यह नहीं सोचते कि इतनी ऊंचाई पर कोई बिना ज्ञान, तप, तथा योग साधना के नहीं पहुंच सकता।  इन संतों ने असहजता पैदा करने वाले तत्वों से निपटने के लिये प्रयास किये हैं और इसके लिये धन की जरूरत होती है।  इन लोगों के लिये धन ही अस्त्र शस्त्र है, क्योंकि जो तत्व समाज में अस्थिरता, अज्ञान और असहजता फैला रहे हैं वह भी इसी अस्त्र शस्त्र का उपयोग कर रहे हैं। यह विद्वान लोग क्या चाहते हैं कि देश में अज्ञान, असहजता तथा अस्थिरता फैलाने वाले तत्वों से युद्ध बिना हथियार लिये लड़ें या उसे विकास का प्रतीक  मानकर उनकी तरह चुप बैठ कर देखें।
सच तो यह है कि संतों के पास जो धन है उसकी तुलना किसी अन्य धनाढ्य वर्ग से नहीं की जा सकती। 
कुछ अज्ञानी तो इन पर ठगने का आक्षेप भी लगाते हैं? दोष उनका नहीं है क्योंकि उनके संस्कारों में पश्चिमी विचार मौजूद हैं और उनको भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की बात समझ में नहीं आ सकती।  वह उस बाजार को नहीं देखते जिसका प्रचार तंत्र वैलंटाईन डे के नाम पर मनाये जाने वाले प्रेम दिवस पर केवल उभयपक्षी लिंग संबंध और बीयर पीने जैसी बातों को ही प्रोत्साहित करते हैं। फिल्मों के नकली पात्रों का अभिनय करने वाले अभिनेताओं को महानायक बताते हैं। इसके विपरीत संत तो केवल प्राचीन सत्साहित्य का ही प्रचार करते हैं इसमें ठगी कैसी?।  सच तो यह है कि अब इस देश में अगर आशा बची है तो इन्हीं संतों से! बाकी जिसकी जैसी मजी है। कहे या लिखे! हमने तो अपना विचार व्यक्त कर दिया।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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