मनुष्य कभी बंदर नहीं रहा होगा-हिन्दी लेख (manushya kabhi bandar nahin tha-hindi lekh)


हमारे ब्लाग लेखक मित्र उन्मुक्त अपने आप में एक रहस्यमय व्यक्त्तिव के स्वामी हैं। उनके निज व्यक्त्तिव को लेकर कयास लगाते हुए अनेक ब्लाग लेखकों ने कुछ पाठ भी लिखें हैं। कुछ ब्लाग लेखक ऐसे हैं जो अब उनके बारे में कोई कयास नहीं लगाते। इसका कारण यह है कि उनके निज रहस्यों पर अनुमान करने की बजाय उनके लेखन के आधार पर बहुत कुछ समझ गये हैं। कोई आदमी अपना नाम गुप्त रखते हुए निवास अदृश्य स्थान पर बना सकता है पर अगर वह अपने हाथों से लिखकर बाहर शब्द भेजेगा तो वह उसकी पूरी कहानी बयान कर देंगे। इसके लिये यह जरूरी है कि उसका लिखा कोई पढ़े और फिर समझे। यकीनन उन्मुक्त अपने नाम के अनुरूप उन्मुक्त भाव से लिखते हैं और सच्चाई यह है कि उन जैसे पचास या सौ लेखक अगर इस इंटरनेट पर हिन्दी लिखने आ जायें तो भले ही हमारी भाषा के पाठों की संख्या कम हो पर उसका प्रभाव बहुत दूर तक रहेगा।
उनका ‘डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत’ की अवधारणाओं को भारत के प्राचीन हिन्दू धर्मग्रथों में ढूंढने का प्रयास एकदम नया है। सृष्टि के संबंध में इस लेखक द्वारा लिखे गये एक पाठ का उन्मुक्त जी ने उल्लेख करते हुए ‘डार्विन के विकासवाद’ के सिद्धांत को पतंजलि योग दर्शन में देखने का आग्रह करने के साथ ही एक पाठ लिख डाला।
यहां उन्मुक्त जी के उस पाठ की एक बात का उल्लेख करना जरूरी लगता है जिसमें उन्होंने भगवान विष्णु के चौदह अवतारों में मानव विकास के सिद्धांत को स्थापित करने का प्रयास किया है। उनके इस प्रयास ने हैरान कर दिया। पतंजलि योग दर्शन में विकास वाद के सिद्धांत को ढूंढने का उनका आग्रह अभी तक इस लेखक को समझ में नहीं आया पर यह अकारण या अतार्किक नहीं हो सकता जिस पर कभी विचार अवश्य करेंगे।
यह लेखक कभी विज्ञान का विधार्थी नहीं रहा पर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के वर्णनों को नये संदर्भों में देखने का प्रयास किया-वह भी इसलिये क्योंकि अंतर्जाल पर उस पर लिखने में मजा आने लगा। उन्मुक्त संभवतः आयु में इस लेखक से छोटे होंगे पर अंतर्जाल पर वरिष्ठ हैं और कहना चाहिए कि उनका विशद अध्ययन पहले ही प्रारंभ हो गया होगा। उन्मुक्त जी के डार्विन के विकासवाद बहुत सारे लेख देखने को मिले। भारत के प्राचीन ग्रंथों को नये संदर्भों में देखने की इच्छा के विषय में इस लेखक और उन्मुक्त जी की दिलचस्पी समान हो सकती है पर जहां पाश्चात्य विज्ञानियों के सिद्धांतों की तुलना की बात आयेगी वहां उन्मुक्त जी की बात का जवाब देना बहुत कठिन है क्योंकि उसके लिये आधुनिक विज्ञान का व्यापक अध्ययन होना आवश्यक है।
इस लेखक ने पश्चिमी वैज्ञानिक के विकासवाद के सिद्धांत के बारे में यह पढ़ा है कि ‘मानव पहले एक बंदर या उस जैसा जीव था। जिसकी पूंछ धीरे धीरे लुप्त होती गयी।’
उनके इसी सिद्धांत के कारण पूरा विश्व मानता है कि मनुष्य के पूर्वज बंदर थे।
यह लेखक उनके सिद्धांतों से असहमत होता है। वैसे इस लेखक ने एक पाश्चात्य विज्ञानी का ही एक लेख पढ़ा था जिसमें सभ्यता के विकास का वर्णन दिलचस्प था। उसमें बताया गया था कि मनुष्य अफ्रीका (शायद दक्षिण अफ्रीका) में प्रकट हुआ पर वहां उसे सभ्यता का ज्ञान नहीं था। वहां से वह भारत गया जहां उसका बौद्धिक परिष्कृतीकरण हुआ। फिर भारत से फिर वह मध्य एशिया गया जहां उसे अधिक ज्ञान मिला-एक तरह से कहें तो इस मायावी संसार की जानकारी। वह फिर भारत लौटा तथा धीमे धीमे बौद्धिक रूप से समृद्ध होकर पूरे विश्व में फैला। हम इन दोनों सिद्धांतों के बीच में खड़े होकर विचार करते हैं। इस लेखक का मानना है कि किसी भी सर्वमान्य सिद्धांत का अगर अवलोकन करना हो तो उसके साथ बहने की बजाय उसे बाहर निकलते हुए दृष्टा की तरह बहते हुए देखना चाहिये। हम किसी वैज्ञानिक के सिद्धांतों के प्रतिपादन के समर्थन में दिये तथ्यों के साथ बहते जायें अच्छी बात है, पर एक बार अपनी जगह पर मस्तिष्क स्थिर कर उसे सामने से आते देखें और फिर निष्कर्ष निकालें। जब डार्विन का सिद्धांत देखते है और आज का मनुष्य पर दृष्टिपात करते हैं तो लगता है कि अगर यह सही है कि मनुष्य कभी बंदर था पर सभी जगह उसका रूप बदल गया यह सही नहीं लगता। आखिर मनुष्य में दैहिक आधार पर अभी भी गोरे, काले, नाटे, लंबे, मोटे और पतले के आधार पर विभाजन दिखाई देता है वह क्यों नहीं समाप्त हुआ। मनुष्य देह तथा पांच तत्वों से बनी है-यह भारतीय अध्यात्म कहता है जबकि पाश्चात्य विज्ञान का यह मानना है कि अनेक प्रकार के छोटे अणु मिलकर इस संसार को बनाते हैं। हम पाश्चात्य ज्ञान को आधुनिक मानते हैं पर कभी पंच तत्वों का अवालोकन किया है! प्रथ्वी, आकाश, अग्नि, वायु तथा जल छोटे अणुओं या बूंदों के समूह से बनते हैं इसके लिये किसी विस्तार की आवश्यकता नहीं है। भारतीय दर्शन में इसका उल्लेख नहीं हुआ तो इसका कारण यह है कि इसकी जरूरत नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा सभ्यता प्रारंभ होते ही निर्मित हो गयी थी। भारत में बौद्धिक रूप से समृद्ध होकर मनुष्य पूरे विश्व में फैला क्योंकि यहां ज्ञान की धारा में वह नहा चुका था। इधर जब पाश्चात्य समाज की शक्ति बढ़ी तो उसने अपने ढंग से सोचना प्रारंभ किया। जब वहां रहे मनुष्यों की स्मृति पीढ़ियों के साथ शनैः शनैः विलुप्त होती गयी तब वहां आधुनिक विज्ञान का प्रारंभ हुआ। उन्होंने खोज शुरु की पर यह सभ्यता प्रारंभ होने तथा आधुनिकता के चरम के बीच की थी। जबकि भारत में वेद जैसे महाग्रंथों की रचना तो मनुष्य जीवन के साथ ही प्रारंभ हो गयी थी। इसलिये ही जब भी कोई पाश्चात्य सिद्धांत सर्वमान्य होता है तो उसके तत्व भारतीय धर्मग्रंथों में मिलते हैं। विश्व सभ्यता के विकास का दूसरा सिद्धांत हम देखें तो इससे इस बात की पुष्टि होती है। भारतीय खोज प्राचीन है जबकि पाश्चात्य खोज नवीनतम है पर इससे मूल तत्व नहीं बदलते। हां, भाषा, भाव तथा संप्र्रेषण के तरीके में थोड़ी भिन्नता हो सकती है। खासतौर से तब जब भारतीय ग्रंथों की रचना के समय उसमें साहित्य का पुट देने का प्रयास किया गया तो उसमें व्यंजना विद्या के साथ अनेक प्रकार के शाब्दिक अलंकरण भी सजायें गये जिसमें चमत्कार होने का आभास भी होता है।
अब आते हैं उक्त पश्चिमी वैज्ञानिक के विकासवाद के सिद्धांत के सिद्धांत पर। उसमें दम नज़र नहीं  आता। मनुष्य यानि कोई एक नहीं बल्कि पुरा समुदाय। यह संभव नहीं है कि पूरे विश्व के मनुष्यों की पूंछ लापता हो जाये। अगर हम उनकी यह बात मान लें तो फिर यह सवाल भी आता है कि पूरे विश्व के मनुष्यों का रंग या कद काठी एक जैसी क्यों नहीं है! एक ही परिवार में रहने वाले व्यक्तियों के रंग, कद तथा चाल में अंतर कैसे होता है? अगर बंदर के रूप से मनुष्य का स्वरूप बदला तो फिर देह के अन्य हिस्सों में समानता क्यों नहीं  आयी?
कहने का अभिप्राय यह है कि यह सिद्धांत कल्पित लगता है। उन्मुक्त जी ने अवतारों की बात मानव विकास के सिद्धांतों से जोड़ने का प्रयास किया है। अच्छा और भावपूर्ण लगा। पर यहां भी याद रखने लायक यह बात है कि मत्स्यावतारहो या नरसिंह अवतार, जिस काल में हुए उस समय वर्तमान काल जैसी ही देहवाले ही मनुष्य थे। इसका आशय यह है कि उस समय तक मनुष्य का विकास हो चुका था। ऐसे में चाहे मत्स्यावतार हो या नरसिंह अवतार वह उस समय के समूचे मनुष्य समुदाय की दैहिक स्थिति का प्रतिबिम्ब नहीं कहे जा सकते।
मनुष्य के पूर्वज अगर बंदर होते तो पूरे विश्व में उनकी पूंछ लुप्त नहीं हो सकती थी। रीढ़ के हड्डी एकदम नीचे बने उभरे ठोस तत्व को देखकर वहां पूंछ होने की बात बेमानी है क्योंकि दरअसल पूरी देह का आधार स्तंभ है और हम यह मानते हैं कि सृष्टि ने हर चीज सोच समझकर बनायी है ताकि जीवन की धारा यहां बह सके। दूसरा यह भी कह सकते हैं कि बनी तो ढेर सारी चीजें होंगी पर जिनका वैज्ञानिक आधार मजबूत रहा वही आगे जीवन यात्रा जारी रख पायीं जैसे कि मनुष्य की रीढ़ की हड्डी का वह मूलाधार चक्र जहां पूंछ होने की कल्पना की जाती है।
आखिरी बात अगर मनुष्य बंदर था तो अभी भी इस धरती पर इतने सारे बंदर क्यों है? एक बदंर ने इस लेखक से हनुमान जी के मंदिर में प्रसाद इस तरह छीन ले गया था कि जैसे कि उसका उस पर अधिकार हो, यह सरासर लूट थी पर बंदर तो कानून के दायरे से बाहर हैं। उस समय यह लेखक सोच रहा था कि क्या पूरी धरती पर जब मनुष्य धीरे धीरे अपनी पूंछ की लंबाई खो रहा था-कहा जाता है कि कुछ बंदर कपड़े पहनने लगे थे और इसके कारण उनकी पीढ़ियों का शनै शनै परिवर्तन हो रहा था-तब क्या बंदरों का एक समुदाय मनुष्य होने से बचने के लिये प्रयास कर रहा था ताकि भविष्य में सभ्य कानून उस पर लागू न हों और वह चाहे जैसी लूट करे कहलायेगा बंदर ही और बच जायेगा। शुरुआती दौर में मनुष्य और बंदरों मे अंतर अधिक नहीं रहा होगा पर धीरे धीरे संवाद की कमी के कारण ऐसा भी हो गया कि दोनों का संपर्क टूट गया। इस सिद्धांत पर यकीन न करने का कारण यह भी है कि इस धरती पर ऐसा कहीं सुनने को नहीं मिलता कि कोई मनुष्य कपड़े सिलवाने के लिये किसी दर्जी के पास गया हो और पूंछ वाली जगह पर छेद रखने का आग्रह करता हो। अगर बंदर से मनुष्य बना है तो एक नहीं ऐसे लाखों उदाहरण होते। जैसे मनुष्य अब काले, गोरे, नाटे, लंबे, मोटे, पतले तथा आदिवासी और आधुनिक वर्ग में बंटा हुआ, वैसे ही यहां पूंछ वाले और बिना पूंछ वाले दोनों प्रकार के मनुष्य होते। इतना ही नहीं विवाहों के अवसर पर यह तो देखा ही जाता कि हर दंपति पुंछ या बिना पूंछ वाला ही होना चाहिये वरना दोनों एक दूसरे की मजाक उड़ायेंगे। पूंछ की लंबाई भी देखी जाती। दूसरी बात यह कि अगर मनुष्य पूंछ वाले होते तो एक दूसरे की पूंछ खींचकर लड़ मर गये होते। उनकी इतनी बड़ी संख्या नहीं होती। चाहे कोई कितना भी कहें मानवीय स्वभाव जैसा आज है वैसा पहले भी था। यह बदल नहीं सकता। कुछ बातें व्यंग्य में लिखी है कुछ गंभीर हैं पर सच यह है कि यह सब इस लेखक के मन में बहुत समय से चलता रहा है। सो लिख दिया। इस विषय पर आगे भी लिखेंगे पर फिलहाल इतना ही।

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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • उन्मुक्त  On अप्रैल 4, 2010 at 19:21

    दीपक जी, मैंने विकासवाद के संदर्भ में पतञ्जलि का योग दर्शन पढ़ने का प्रयत्न किया पर समझ में नहीं आया। यदि आपको उसका ज्ञान हो तो लिखें। मुझे उसे पढ़ कर अच्छा लगेगा।

    मैं इस बात को समझने के लिये उत्सुक हूं कि क्या उनका योग दर्शन डार्विन के विकासवाद का समर्थन करता है?

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