कबाड़ियों का चैनल प्रपंच-हिन्दी हास्य व्यंग्य


एक कबाड़ी ने जब सुना कि अमुक चैनल अपना पूरा तामझाम बेचकर दूसरी जगह से चालू होने वाला है तो वह तत्काल अपने साथी दूसरे कबाड़ी के पास पहुंचा।
दूसरे कबाड़ी ने उसे देखते ही कहा-‘आ गये जासूसी करने!’
पहल कबाड़ी बोला-‘‘नहीं यार, आज तो मैं एक साझा काम करने का प्रस्ताव लाया हूं। हम दोनों अमुक टीवी चैनल को खरीद लेते हैं वह बिक रहा है और दूसरी जगह से शुरु होने वाला है। उसके प्रबंधक नाम के अलावा सबकुछ बेचने वाले हैं। वहां के एक चपरासी ने मुझे बताया जो कि वहां से अब निकाले जाने वाला है।’
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘‘ तो हम क्या करेंगे? इतना महंगा सामान होगा, हमारे किस काम का? उसे बेचेंगे कहां?’’
पहले कबाड़ी ने कहा-‘‘बेचना नहीं है। हमें वह चैनल कबाड़ी न्यूज चैनल के नाम से चलाना है। अरे, ठीक है हम कबाड़ी हैं पर हमारे पास पैसा कोई कम नहीं है। फिर अपने बच्चों के नाम से कबाड़ी नाम का संबोधन कितना बुरा लगता हैै।’’
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘मूर्ख कहीं के! कबाड़ी का काम है पुरानी चीजें खरीद कर बेचना न कि घर में रखना।’
पहले कबाड़ी ने कहा-‘‘लगता है कि अपने बच्चों के भविष्य से तुम्हें प्रेम नहीं है। फिर आगे चलकर हम भी नयी जगह पर वह चैनल चलायेंगे तब सारा सामान बेच देंगे।’
दोनों जब बातचीत कर रहे थे तब उनका ध्यान पास बैठे उस आदमी की तरफ नहीं गया जो चुपचाप एक बैंच पर बैठ कर बीड़ी पी रहा था। वह एकदम मैला कुचला सफेद पायजमा कुर्ता पहने हुए था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और बालों से ऐसा लग रहा था कि जैसे बरसों से नहाया न हो। दरअसल वह तीसरा कबाड़ी था जो व्यवसाय से संबंधित गोपनीय सूचनायें एकत्रित करने दूसरे कबाड़ी के पास आकर बैठता था।
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘पर चैनल चलाने का अपने पास तो अनुभव ही नहीं है। हां, यह बात सही है कि मैं समाचारों का शौकीन हूं और अमुक चैनल पहले बहुत देखता था पर अब वह तो बेकार हो गया है।’
पहले ने कहा-‘यार, कैसे कबाड़ी हो, तुम्हें पता है यहां अनुभव वगैरह तो केवल दिखाने के लिये हैं। वरना सच तो यह है कि अधिकतर लोग धूप में बाल सफेद करते हैं। समाचार चैनल चलाना कौन सा मुश्किल काम है।’
दूसरे ने कहा-‘जरा अपनी योजना बताओ तो सही।
पहला कबाड़ी-‘सुनो! समाचार चैनलों में एक घंटे के दौरान केवल दो मिनट के समाचार होते हैं बाकी तो इधर उधर की कबाड़ में मिलने वाली कटिंग से ही काम चलायेंगे। अपना घीसू कबाड़ी है न…………’
दूसरे ने कहा-‘वही न! जो फिल्म लाईन में चला गया है।’
पहले ने कहा-‘काहे की फिल्म लाईन! पुरानी फिल्में कबाड़ में लाकर बेचता है। उससे कहेंगे कि अब वह थोड़ा कम पुरानी फिल्में खरीद कर हमारे अमुक चैनल पर दे। वैसे भी आजकल की फिल्में तीन दिन में ही कबाड़ हो जाती हैं। फिर क्रिकेट के खिलाड़ियों का रैम्प में नाचना, किसी फिल्म अभिनेता द्वारा लोगों से मारपीट की सच्ची घटना तथा लाफ्टर शो जैसे कार्यक्रम दूसरे चैनल आज दिखाते हैं हम तीन दिन बाद कबाड़ में खरीद कर उसे चलायेंगे। वैसे इस देश में गिनती के तीन चार लोग ऐसे भी हैं जो अपने छिछोरेपन की वजह से हमेशा ही न्यूज में बने रहते हैं। उनका भी सभी कुछ मसाला कबाड़ में मिल जायेगा। घीसू कबाड़ी के रिश्ते दूर दूर तक हैं। कोई ना करे यह संभव नहीं है। प्रबंध निदेशक उस चपरासी को बनायेंगे जिसने यह समाचार दिया है। हां, बस दो मिनट के लिये कोई समाचार वाचक रखना पड़ेगा और संपादक भी। ’
दूसरे ने कहा-‘तुम चिंता मत करो। समाचार संपादक तो मैं ही बन जाऊंगा क्योंकि आजकल समाचार न सुन पाने की भड़ास निकालने के लिये मौका मुझे चाहिए। वाचक की चिंता मत करो मेरा भतीजा निकम्मा घूम रहा है। वह इस काम के लिये कई जगह आवेदन भेज चुका है उसको काम पर रख लेंगे। मैंने भाई से कर्जा लेकर यह काम शुरु किया था तो उसका भी बदला चुक जायेगा। हां, एक तो महिला या लड़की भी तो रखनी पड़ेगी।’
पहले ने कहा-‘उसकी चिंता नहीं है। मेरी साली इसके लिये योग्य है।’
दूसरे ने कहा-‘यार, पर मुझे डर लग रहा है। इतना बड़ा काम है!
पहले ने कहा-‘तुमने अगर कबाड़ का काम किया है इसलिये कोई भी काम कर लोगे। इसलिये तो चैनल का ही नाम मैंने कबाड़ी सुझाया है।’
दूसरे ने कहा-फिर देर किस बात की।’
पहले ने कहा-‘ठीक है, तो मेरी मोटर साइकिल पर बैठो और चलो।’
दोनों मोटर साइकिल पर चल पड़े। थोड़ी दूर जाकर वह बंद हो गयी तो दूसरा कबाड़ी बोला-‘यार, कैसी मोटर साइकिल लाये हो।’
पहला कबाड़ी-‘कल ही कबाड़ में खरीदी है कोई पुरानी नहीं लाया।’
थोड़ी देर तक दोनों पैदल ही मोटर साइकिल घसीटते रहे तब कहंी जाकर उसको बनाने वाली दुकान मिली। वहां एक घंटा लग गया। मैकनिक से बहुत चिकचिक होती रही। दोनों बैठकर फिर अपनी राह चले। थोड़ी दूर चले तो पिछला पहिये से हवा निकल गयी। फिर दोनों घसीटते हुए पंचर बनवाने की दुकान पर आये।
पंचर बनाने वाले ने पहिये में से ट्यूब निकाला और उसे बनाने लगा। उसके यहां छोटे टीवी पर अमुक चैनल आ रहा था। दूसरा कबाड़ी उसे देखने लगा तो वहां ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी। दूसरा कबाड़ी एकदम चिल्ला पड़ा-‘अरे यार देख, अमुक चैनल बिक गया है और दूसरी जगह से शुरु होगा। किसी चालू कबाड़ी ने खरीदा है।’
पहले कबाड़ी का मुंह खुला का खुला रह गया-‘बहुत बुरा हुआ। अब समझ में आया। अरे, यही चालू कबाड़ी वही था जो हमारी बातें सुन रहा था। मैं उसे जानता हूं पर वहां वेश बदले बैठा था इसलिये समझ नहीं पाया। वह तुम्हारे यहां तुम्हारी जासूसी करने अक्सर ऐसे ही आता है मुझे उसके एक नौकर ने बताया था।’’
दूसरा कबाड़ी बोला-‘‘उसने चैनल का नाम भी रख दिया है, ‘‘कबाड़ न्यूज चैनल’’, हमारी पूरी योजना चोरी कर गया। चल उससे रॉयल्टी मांगते हैं।’’
पहला बोला-‘‘कोई फायदा नहीं। उसने अपने चैनल का नाम ‘कबाड़ी’ नहीं बल्कि ‘कबाड़’ चैनल रखा है।’
दूसरा कबाड़ी बोला-‘‘तेरे को धंधे  का उसूल नहीं मालुम। अरे, हम पुराने सामान खरीदने और बेचने वाले हैं न कि उनके इस्तेमाल करने वाले। तुझे यह कबाड़ में खरीदी मोटर साइकिल नहीं लानी थी। इस चालू कबाड़ी को देख नयी कार चलाता है और कितनी जल्दी फुर्र से उड़कर वहां पहुंच गया।’
पहले ने कहा-‘‘चिंता मत करो, खरीदा तो है पर चला नहीं पायेगा।’
दूसरे ने कहा-‘‘पर तुमने तो कहा था कि कबाड़ी कुछ भी कर सकता है।’’
पहले ने कहा-‘‘यह मैंने अपने और तुम्हारे लिये कहा था। उसके लिये नहीं। देखना वह जल्दी इसे बेच देगा। तब हम उससे सस्ते में खरीदेंगे।’
दूसरे ने कहा-‘नहीं, कबाड़ी से कोई सामान नहीं खरीदना यह मेरा उसूल है। वह भले ही न्यूज चैनल वाला हो गया है पर मेरी नज़र में रहेगा तो कबाड़ी ही न!’
पहले वाले ने कहा-‘नहीं पर उसकी असलियत बदल गयी है। मैंने तुम्हें बताया था न!’
दूसरे ने कहा-‘अब तुम्हारी नहीं सुनना। मेरी नज़र में उसकी असलियत नहीं बदलेगी।’
पहले ने कहा-‘ठीक है, कोई बात नहीं। यह चालू कबाड़ी तो ऐसा है कि सब जगह कबाड़ कर देता है। इस धंधे  का भी यही करेगा, तब दूसरे चैनल कबाड़ में खरीद कर चलायेंगे।’
दोनों खुश होकर वहां से चले गये। उधर चालू कबाड़ी घीसू कबाड़ी को फोन कर रहा था।
नोट-यह हास्य व्यंग्य किसी घटना या व्यक्ति पर आधारित नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वहीं इसके लिये जिम्मेदार होगा। इसे पाठकों के मनोरंजन के लिये लिखा गया है।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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