अब अंधेरों से डरने लगे हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता


रौशनी के आदी हो गये, अब अंधेरों से डरने लगे हैं।
आराम ने कर दिया बेसुध, लोग बीमारियों से ठगे हैं।।
पहले दिखाया सपना विकास का, भलाई के ठेकेदारों ने
अब हर काम और शय की कीमत मांगने लगे हैं।।
खिलाड़ी बिके इस तरह कि अदा में अभिनेता भी न टिके
सौदागर सर्वशक्तिमान को भी सरेराह बेचने लगे हैं।
अपनी हालातों के लिये, एक दूसरे पर लगा रहे इल्ज़ाम,
अपना दामन सभी साफ दिखाने की कोशिश में लगे हैं।।
टुकुर टुकुर आसमान में देखें दीपक बापू, रौशनी के लिए,
खुली आंखें है सभी की, पता नहीं लोग सो रहे कि जगे हैं।।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • Rohit gupta  On सितम्बर 30, 2010 at 10:59

    this is mice site, and it will also help to our national language “Hindi”…………….
    nice step every one should join this kind of sites

    special thanks to
    Deepak babu
    dhnyavaad deepak babu, apka ye prayatn kafi prashasniya hai, me iska hardik abhinadan karta hu, aaj ke is daur me jab log angrejzi bhasha ki or agarsar ho rahe hai, apka hindi prem hindi bhasha k uthan me sahayak hoga. punah dhanyvaad Deepak babu

    apka ek prashansak
    Rohit gupta
    mob:999629910
    Delhi

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