निगाहों ने खो दी है अच्छे बुरे की पहचान-हिन्दी शायरी (nanigah ne kho di pahchan-hindi shayari)


लोगों की संवेदनाऐं मर गयी हैं
इसलिये किसी को दूसरे का दर्द
तड़पने के लिये मजबूर नहीं कर पाता है।

निगाहों ने खो दी है अच्छे बुरे की पहचान
अपने दुष्कर्म पर भी हर कोई
खुद को साफ सुथरा नज़र आता है।

उदारता हाथ ने खो दी है इसलिये
किसी के पीठ में खंजर घौंपते हुए नहीं कांपता,
ढेर सारे कत्ल करता कोई
पर खुद को कातिल नहीं पाता है।

जीभ ने खो दिया है पवित्र स्वाद,
इसलिये बेईमानी के विषैले स्वाद में भी
लोगों में अमृत का अहसास आता है।

किससे किसकी शिकायत करें
अपने से ही अज़नबी हो गया है आदमी
हाथों से कसूर करते हुए
खुद को ही गैर पाता है।
————

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
—————————
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • pawan dhiman  On अगस्त 25, 2010 at 21:00

    किससे किसकी शिकायत करें
    अपने से ही अज़नबी हो गया है आदमी
    हाथों से कसूर करते हुए
    खुद को ही गैर पाता है।

    बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण रचना…इस प्रकार के आत्मचिंतन से ही, अन्धकार पर उजाले की विजय का मार्ग प्रशस्त होगा.

  • seema gupta  On अगस्त 26, 2010 at 09:46

    उदारता हाथ ने खो दी है इसलिये
    किसी के पीठ में खंजर घौंपते हुए नहीं कांपता,
    ढेर सारे कत्ल करता कोई
    पर खुद को कातिल नहीं पाता है।
    “” यूँ लगता है जेसे आस पास ऐसा ही माहोल है…… कितने यथार्त लगते हैं ये शब्द..”

    regards

  • sandeep  On अगस्त 26, 2010 at 11:32

    accha hai

  • Rohit Jain  On अगस्त 27, 2010 at 14:51

    waah… behtareen

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