अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होने का मतलब-हिन्दी संपादकीय लेख (anna hazare ka anshan samapt hone ka matlab-hindi editorial article or lekh)


                अन्ना हजारे का अनशन समाप्त होने पर पूरे देश में जश्न मनाया जा रहा है। कोई इसे लोकतंत्र की जीत बता रहा है तो किसी का दावा है कि इस लोकचेतना का संचार हुआ है। भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल बनाने को लेकर महाराष्ट्र के समाजसेवी अन्ना हजारे ने 12 दिन तक जमकर अनशन किया। अंततः कुछ आश्वासनों पर हजारे साहब ने बड़े राजनीतिक चातुर्य के साथ आधी जीत बताकर उसे समाप्त कर दिया। संविधान और राजनीतिक विश्लेषकों की बात माने तो आधी जीत तो दूर अभी उनका अभियान अपनी जगह से एक इंच हिला भी नहीं है। इतना ही नहीं अब कथित रूप से गैरराजनीतिक होने का दावा करने वाली उनकी कथित ‘अन्ना टीम’ अंततः परंपरागत राजीनीतिक दलों के शिखर पुरुषों में की दरबार में मदद मांगने भी जा पहंुची। जब देश में कानून बनाने में संसद सर्वोपरि है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि वह दलीय राजनीतिक दलों के आधार पर ही गठित होती है। ऐसे में उनके साथ संवाद करना उस आदमी के लिये भी जरूरी होता है जो स्वयं गैरराजनीतिक है पर किसी जनसमस्या का हल चाहता है। दूसरी बात यह है कि अगर कोई समूह अपने मनपसंद का कानून बनाना चाहता है तो उसके पास चुनाव लड़ना ही एक जरिया है। किसी गैर राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से कानून बनाना एक आत्ममुग्ध प्रक्रिया हो सकती है जिससे परिणाम प्रकट नहीं होता चाहे नारे कितने भी लग जायें। अन्ना की टीम यह जानती है और ऐसा लगता है कि कहंी न कहीं भविष्य के चुनाव उसकी नजर में है।
          अब हम जो देख रहे हैं तो लग रहा है कि अन्ना हजारे और अन्ना टीम दो अलग अलग केंद्र बन गये हैं। अन्ना टीम के सदस्य पेशेवर अभियानकर्ता हैं जबकि अन्ना स्वयं एक फकीर हैं। अलबत्ता राजनीतिक चातुर्य उनमें कूटकूटकर भरा ही यही कारण है कि उन्होंने पेशेवर अभियानकताओं की दाल नहीं गलने दी। इससे हुआ यह कि एक स्वामी नामधारी एक पेशेवर अभियानकर्ता उनसे नाराज हो गया। उसका सीडी जारी हो गया है जिसमें वह अपने किसी मित्र के साथ सहयोगियों की निंदा कर रहा है। सच तो यह है कि उसके शामिल होने की वजह से लोग इस आंदोलन को अनेक बुद्धिजीवी शक की नजर से देख रहे थे। कहने को वह जोगिया वस्त्र पहनता है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की निंदा उसके श्रीमुख से कई बार सुनी गयी है। उस पर यह आरोप लगता है कि वह समाज सेवा की आड़ के केवल दिखावा करता है। हमारा उसके चरित्र से मतलब नहीं है पर इतना जरूर अब लग रहा है कि आने वाले समय में अन्ना टीम को अनेक तरह के सवालों का सामना करना पड़ेगा।
       अन्ना हजारे ने कहा था कि यह आधी जीत है। लोग फूल रहे हैं। जश्न बनाये जा रहे हैं। विवेकशील लोगों के लिये इतना ही बहुत है कि अन्ना जी ने अनशन तोड़ दिया। दूसरी बात यह भी लग रही है परंपरागत समाज सेवी और राजनीतिक संगठन अब चेत गये हैं। अभी तक वह देश के जनमानस में फैले असंतोष का शायद सही अनुमान नहीं कर पाये थे जो अन्ना के अनशन के लिये शक्ति बना और अन्ना टीम उसके आधार पर ऐसा व्यवहार करने लगी कि वह कोई संवैधानिक संगठन है। वैसे हम यहां साफ कर दें कि इस अनशन की समाप्ति से कोई हारा नहीं है कि किसी को विजेता बताया जाये। अलबत्ता प्रचार माध्यमों के लिये यह अनशन महान कमाई का साधन बन गया। पूरे पंद्रह दिन तक उन्होंने इस प्रकरण को जिस तरह चलाया वह आश्चर्यजनक लगता है। अलबत्ता इस चक्कर में उन्होंने देश के संविधानिक संगठनों के महत्व को कम कर दिखाया। आज तो सारे चैनल दूसरी आजादी का जश्न मना रहे हैं। अब इस आजादी का मतलब कौन पूछे?
        भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों के लिये यह एक दो दिन आत्म मंथन का समय है जब उनको प्रचार माध्यम हाशिए पर बैठा दिखा रहे हैं। विवेकवान लोग जानते हैं कि भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान में अनेक बुद्धिमान लोग सक्रिय हैं। शीर्ष पदों पर है और अपनी चतुराई से उन्होंने इस आंदोलन की हवा निकाल दी है। यह अलग बात है कि इस आंदोलन की वजह से उनके मन में अब तेजी से जनकल्याण का भाव आया लगता है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा संविधान हैं तो हम बचे हुए हैं और संसद और सत्ता प्रतिष्ठान कहीं न कहीं हमारे चुने हुए लोगों की सक्रियता के कारण चल रहे हैं।
पिछले 15 दिनों से परंपरागत राजनीतिक संगठन को शीर्ष पुरुषों ने शायद बहुत तनाव झेला होगा पर अब वह यकीनन चेत गये होंगे। अन्ना साहेब भले हैं पर उनकी टीम का का व्यवहार राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अन्ना अकेले अनशन कर रहे थे पर यह अन्ना की टीम केवल राजनीति करती दिखी। ऐसा लगा कि अन्ना का अनशन उनकी निजी जागीर हो। अभी एक स्वामी की हवा निकली है और अब उनका सामना देश के समस्त परंपरागत राजनीतिक संगठनों से होगा तो पता नहीं कितनों की हवा निकल जायेगी।     आखिरी बात यह है कि इस गलत फहमी में किसी को नहीं रहना चाहिए कि अन्ना टीम कोई हाथ पर हाथ धरे बैठेगी। ऐसा लगता है कि अगले चुनाव में इसके लोग मैदान में भी उतर सकते हैं। परंपरागत राजनीतिक दलों को उनकी इस बात पर यकीन नहीं करना चाहिए वह गैरराजनीतिक लोग हैं। दरअसल अन्ना टीम धीरे धीरे परंपरागत राजनीतिक संगठनों को अप्रासंगिक दर्शाते हुए जनता में उनकी छवि खराब करेगी फिर आखिर यही कहेगी कि चुनाव में हमें जितवाने के अलावा जनता के पास कोई चारा नहीं है।
          विवेकशील पुरुष इस बात से खुश हैं कि अन्ना साहेब के अनशन से देश भर में उपजा तनाव खत्म हो गया है पर जिस तरह इसकी कथित विजय पर जश्न मन रहा है वह शक पैदा करता है कि वाकई यह कोई भ्रष्टाचार की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाले हैं। अब तो मामला चुनाव सुधार की तरफ मुड़ गया है। अन्ना साहेब भले हैं पर अपना राजनीतिक इस्तेमाल होने देते हैं। कोई उनको चला नहीं सकता यह सच है पर अपनी राजनीतिक मौज के चलते वह अपने चेलों की सहायता करते हैं। वह कहते हैं कि वह महात्मा गांधी के अनुयायी हैं और यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी छवि राजनीतिक संत की रही है। अन्ना साहब की वाक्पटुता गजब की है और उनका एक एक वाक्य जनमानस में प्रभाव डालता है। जब वह कहते हैं कि अभी अनशन स्थगित किया है खत्म नहीं किया तो समझना चाहिए कि उनकी राजनीतिक मौज का सिलसिला जारी रहेगा। यह स्पष्ट है कि अनशन की समाप्ति पर वह विवेकवान लोगों के नजरिये को समझते हैं पर यह भी जानते हैं कि उनके नाम से जुटी भीड़ नारों पर चलने और वादों में बहने वाली है इसलिये उसे अपने साथ बनाये रखने के लिये यह अहसास दिलाना जरूरी है कि आधी ही सही जीत जरूर हुई है।

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होना स्वागतयोग्य-हिन्दी लेख (end of anna hazare fast and agitation-hindi lekh or article)               
       महाराष्ट्र के समाज सेवी अन्ना हजारे आज पूरे देश के जनमानस में ‘महानायक’ बन गये हैं। वजह साफ है कि देश में जन समस्यायें विकराल रूप ले चुकी हैं और इससे उपजा असंतोष उनके आंदोलन के लिये ऊर्जा का काम कर रहा है। पहले अप्रैल में उन्होंने अनशन किया और फिर अगस्त माह में उन्होंने अपने अनशन की घटना को दोहराया। जब अप्रेल   में उन्होंने अनशन आश्वासन समाप्त किया तब उनका मजाक उड़ाया गया था कि वह तो केवल प्रायोजित आंदोलन चला रहे हैं। अब की बार उन्होंने 12 दिन तक अनशन किया। इस अनशन से भारत ही नहीं बल्कि विश्व जनमानस पर पड़े प्रभावों का अध्ययन अभी किया जाना है क्योंकि इस प्रचार विदेशों तक हुआ है। फिर जिन लक्ष्यों को लेकर यह अनशन किया गया उनके पूरे होने की स्थिति अभी दूर दिखाई देती है मगर देश के चिंतकों के लिये इस समय उनकी उपेक्षा करना ही ठीक है। अन्ना हजारे के अनशन आंदोलित पूरे देश के लोगों ने उसकी समाप्ति पर विजयोन्माद का प्रदर्शन किया पर महानायक ने कहा‘‘यह जीत अभी अधूरी है और अभी मैंने अनशन स्थगित किया है समाप्त नहीं।’ इस बयान से एक बात तो समझ में आती है कि अन्ना साहेब में राजनीतिक चातुर्य कूट कूटकर भरा है।

              अन्ना साहेब के बारह दिनों तक चले अनशन में तमाम उतार चढ़ाव आये और अगर उनका उसे छोड़ना ही सफलता माना जाये तो कोई बुरी बात नहीं है। साथ ही लक्ष्य से संबंधित परिणामों पर दृष्टिपात न करना भी ठीक है। पूरे देश का जनमानस ही नहीं जनप्रतिनिधियों के मन में जो भारी तनाव इस दौरान दिखा वह चौंकाने वाला था। इसका कारण यह था कि हिन्दी प्रचार माध्यम निरंतर इससे जुड़े छोटे से छोटे से घटनाक्रम का प्रचार क्रिकेट मैच की तरह कर रहे थे गोया कि देश में अन्य कोई खबर नहीं हो।
            अगर हम तकनीकी दृष्टि से बात करें तो अन्ना साहेब के प्रस्तावित जनलोकपाल ने अभी एक इंच कदम ही बढ़ाया होगा पर अन्ना साहेब की गिरते स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह भारी सफलता है। हम तत्काल इस आंदोलन के परिणामों पर विचार कर सकते हैं पर ऐसे में हमारा चिंत्तन इसके दूरगामी प्रभावों को देख नहीं पायेगा।  इस आंदोलन के लेकर अनेक विवाद हैं पर यह तो इसके विरोधी भी स्वीकारते हैं कि इसके प्रभावों का अनदेखा करना ठीक नहीं है।
         प्रधानमंत्री श्रीमनमोहन सिंह की चिट्ठी मिलने के बाद श्री अन्ना साहेब न अनशन तोड़ा। अपने पत्र में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने यह अच्छी बात कही है कि ‘संसद ने अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है जो कि देश के लोगों की भी है।’’
           उनकी इस बात में कोई संदेह नहीं है और इस विषय पर संसद के शनिवार को अवकाश के दिन विशेष सत्र में सांसदों ने जिस तरह सोच समझ के साथ ही दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने विचार जिस तरह दिये वह इसका प्रमाण भी है। संभव है विशेषाधिकार के कारण कुछ सांसदों के मन में अहंकार का भाव रहता हो पर कल सभी के चेहरे और वाणी से यही भाव दिखाई देता कि किस भी भी तरह इस 74 वर्षीय व्यक्ति का अनशन टूट जाये जो कि इस देश के जनमानस का ही भाव है। सच बात तो यह है कि इस बहस में आंदोलन से जुड़े संबंधित सभी तत्वों का सार दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रचार माध्यमों के सहारे इस आंदोलन की सफलता की बात कही गयी। अनेक सांसदों ने इस आंदोलन के उन देशी विदेशी पूंजीपतियों से प्रायोजित होने की बात भी कही जो भारत की संसदीय प्रणाली पर नियंत्रण करना चाहते हैं। इसके बावजूद सभी ने श्री अन्ना हजारे के प्रति न केवल सभी ने सहानुभूति दिखाई बल्कि उनके चरित्र की महानता को स्वीकार भी किया। देश के जनमानस का अब ध्यान करना होगा यह बात कमोबेश सभी सांसदों  ने स्वीकार की और इस आंदोलन के अच्छे परिणाम के रूप में इसे माना जा सकता है।
           देश के जिन रणनीतिकारों ने इस विषय पर संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की योजना बनाई हो वह बधाई के पात्र हैं क्योंकि श्री अन्ना साहेब की वजह से देश के युवा वर्ग ने उसे देखा और यकीनन उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रुचि बढ़ेगी। देश के संासदों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इस बात को अनुभव किया कि अन्ना साहेब की देश में एक महानायक की छवि है और उन पर आक्षेप करने का मतलब होगा देश की आंदोलित युवा पीढ़ी के दिमाग में अपने लिये खराब विचार करना इसलिये शब्दों के चयन में सभी ने गंभीरता दिखाई। बहरहाल कुछ सांसदों ने प्रचार माध्यमों पर आंदोलन को अनावश्यक प्रचार का आरोप लगाया पर उन्हें यह भी याद रखना होगा इसी विषय पर हुए विशेष सत्र के बहाने उन्होंने पूरे देश को संबोधित करने का अवसर पाया जिसे इन्हीं प्रचार माध्यमों ने अपने समाचारों में स्थान दिया। यह अलग बात है कि इस दौरान उनके विज्ञापन भी अपना काम करते रहे। वैसे तो संसद की कार्यवाही चलती रहेगी पर इस तरह पूरे राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर सांसदों के पास बहुत समय बाद आया। उनको इस बात पर भी प्रसन्न होने चाहिए कि अभी तक प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र को संबोधित न करने के कारण जनप्रतिनिधियों पर देश के जनमानस की उपेक्षा का आरोप लगता है वह इस अवसर के कारण धुल गया क्योंकि उन्होंने देश की इच्छा को ही व्यक्त किया।
         हम जैसे आम लेखकों के पास इंटरनेट और प्रचार माध्यम ही है जिसके माध्यम से विचारणीय सामग्री मिलती है यह अलग बात है कि उसे छांटना पड़ता है। होता यह है कि समाचार पत्र और टीवी चैनल अपनी रोचकता का स्तर बनाये रखने के लिये किसी एक घटना में बहुत सारे पैंच बना देते हैं और फिर अलग अलग प्रस्तुति करने लगते हैं। सामग्री में दोहराव होता है और जब पाठकों और दर्शकों के अधिक जुड़ने की संभावना होती है तो उनके विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं। समस्त प्रचार माध्यम धनपतियों के हाथ में और यही कारण है कि अन्ना साहेब के आंदोलन के प्रायोजन की शंका अनेक बुद्धिमान लोगों के दिमाग में आती है। इसमें कुछ अंश सच हो सकता है पर एक बात यह है अन्ना साहेब एक सशक्त चरित्र के स्वामी हैं।
             आखिरी बात यह है कि भोगी कितना भी बड़ा पद पा जाये वह बड़ा नहीं कहा जा सकता। बड़ा तो त्यागी ही कहलायेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना साहेब ने अन्न का त्याग किया था। पूरे 12 दिन तक अन्न का त्याग करना आसान काम नहीं है। हम जैसे लोग तो कुछ ही घंटों में वायु विकार का शिकार हो जाते हैं। अन्ना साहेब ने एक ऐसे भारत की कल्पना लोगों के सामने प्रस्तुत की है जो अभी स्वप्न ही लगता है पर सबसे बड़ी बात वह अभी अपने प्रयास जारी रखने की बात भी कह रहे हैं। मुश्किल यह है कि वह अनशन शुरु कर देते हैं तब आदमी का हृदय कांपने लगता है। यही कारण है कि उनका अनशन टूटना भी ही लोगों में विजयोन्माद पैदा कर रहा है। उन्होंने जिस तरह आज की युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से सशक्त बनाया उसकी प्रशंसा तो की ही जाना चाहिए जो कि अंततः हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वाहक हैं।
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

————–

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

टिप्पणियाँ

  • Ketan Chavda  On अगस्त 30, 2011 at 13:07

    ji han sahi bhat hai.

  • Ajay Kumar  On अगस्त 30, 2011 at 21:26

    lokpal vidheyak pahali baar 1966 me lane ka aasafal prayas kiya gaya.tab se abtak kitne hi aasafal prayas huye.is anna andhi ko chalate rahne se safalata ki sambhawana adhik hogi.sachmuch yeh dusari aazadi hogi.is knoon se bhrastachar band nahi hoga kintu nimnatam star tak jaa sakta hai.

  • aajkaagra  On अगस्त 31, 2011 at 16:46

    जो पीते थे खून जनता का अब वो नेता चूस रहे हैं गन्ना
    क्यूंकि उनको मज़ा चखाने अब आ गए हैं हमारे अन्ना

  • Dinesh Gautam  On सितम्बर 13, 2011 at 16:10

    jo bhajan mahatma gandhi ko pasand tha ki sab ko sammati de bhagwan to me bhi yahi kahta hu ki sab ko sammat de bhagwan aur agar man me koi pap na ho aur jankalyan ke liye koi kam kiya jaye to saflata jarur milti he aj nahi to kal

  • Dinesh Gautam  On सितम्बर 13, 2011 at 16:16

    jankalyan ke liye to bhagwan shiv ne jahar bhi pi liya tha bish ko pine se bhagwan shiv jagdiswar ho gaye anna hajare 12 din tak anshan kar ke bhule bhatke lachar logau ko ek rasta diya age bhagwan sab thik karenge

  • ranchi  On जुलाई 30, 2012 at 15:10

    v.good ansan kartey raho rigelt accha milayga
    k.p

  • Ajay Kumar  On अगस्त 2, 2012 at 19:50

    Jis aajadi prapt karne ke liye bahooton ko apne pran se haath dhona para usi aajadi ko banaye rakhne ke liye bhi bahooton ko jaan deni paregi.Anna Jindabaad.Since last 40 years this bill is being postponed.See how much more years will it take.

Trackbacks

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: